InformationNews Article

RSS Shakhas in Bengal: बंगाल में 10 दिन में RSS की 5,000 नई शाखाओं का दावा, जानिए किसने क्या कहा

RSS Shakhas in Bengal: बंगाल में RSS की शाखाओं को लेकर एक ऐसा आँकड़ा सामने आया है जो पहली नज़र में चौंकाता है: सिर्फ़ 10 दिन में 5,000 से ज़्यादा नई शाखाएँ। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक यह दावा संघ के अपने senior functionaries ने किया है। 1 अक्टूबर से महालया यानी 10 अक्टूबर तक चले special drive में, उनके अनुसार, कई शाखाएँ ऐसे इलाकों में शुरू हुईं जहाँ संघ की पहले कोई presence ही नहीं थी।

सितंबर में PTI से बात करते हुए RSS के प्रदेश प्रचार प्रमुख बिप्लब रॉय ने कहा था कि मई तक राज्य में करीब 5,000 शाखाएँ थीं और 10 अक्टूबर तक संख्या 10,000 करने का target है। अब वही संगठन कह रहा है कि 5,000 से ज़्यादा नई शाखाएँ खुल गईं। यानी target और claim, दोनों एक ही तरफ़ से आए हैं। तो आख़िर किसने क्या कहा, आँकड़े कहाँ से आए, और ज़मीन पर इन शाखाओं का मतलब क्या है? चलिए, एक-एक करके देखते हैं।

TOI की रिपोर्ट में आख़िर क्या कहा गया है

टाइम्स ऑफ इंडिया की कोलकाता डेटलाइन वाली रिपोर्ट की पहली ही लाइन में सबसे बड़ा claim है: बंगाल भर में चले एक special 10-day drive के दौरान 5,000 से ज़्यादा RSS शाखाएँ खोली गईं, और यह drive महालया पर ख़त्म हुई। रिपोर्ट संघ के senior functionaries के हवाले से कहती है कि इनमें से कई शाखाएँ उन इलाकों में आईं जहाँ संघ की पहले मौजूदगी नहीं थी।

दक्षिण बंग प्रांत के प्रचार प्रमुख बिप्लब रॉय ने रिपोर्ट के मुताबिक बताया कि 1 अक्टूबर से 10 अक्टूबर, यानी महालया तक, 10 दिन का special drive चलाया गया और इस दौरान 5,000 से ज़्यादा नई शाखाएँ खोली गईं।

पूर्व क्षेत्र के सह-प्रचार प्रमुख जिष्णु बसु, जो बंगाल, ओडिशा, अंडमान-निकोबार और सिक्किम में संघ के senior functionary हैं, ने कहा कि यह 10 दिन का अभियान संघ के साल भर चलने वाले शताब्दी कार्यक्रम का हिस्सा था। उनके मुताबिक कुछ शाखाएँ 5-6 लोगों से शुरू हुई हैं, कुछ 20-25 लोगों से, और मुर्शिदाबाद व मालदा में कुछ नई शाखाओं में 50-60 लोग हैं। बसु का कहना है कि उन्हें बहुत positive response मिला है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि शाखाओं को ज़्यादा active और नए सदस्यों के लिए आकर्षक बनाने के लिए लक्ष्मी पूजा के बाद सात दिन का training session planned है। और अब हर district में करीब 200 शाखाएँ हैं, कुछ जगह इससे ज़्यादा, जबकि पिछले साल तक हर district में लगभग 100 शाखाएँ थीं।

सितंबर में क्या कहा गया था

यह claim अचानक नहीं आया। 23 सितंबर को PTI से बात करते हुए रॉय ने कहा था कि मई तक राज्य में करीब 5,000 शाखाएँ थीं और अब यह संख्या “काफ़ी ज़्यादा” है। उन्होंने भरोसा जताया था कि 10 अक्टूबर तक राज्य में 10,000 शाखाएँ हो जाएँगी। 1 से 10 अक्टूबर के special outreach programmes की बात भी तभी हुई, और focus युवाओं, ख़ासकर Gen-Z पर बताया गया। द स्टेट्समैन की रिपोर्ट के मुताबिक इसके लिए block level पर youth conferences planned थीं, और जिष्णु बसु ने कहा था कि कई युवाओं में संघ को लेकर दिलचस्पी बढ़ रही है।

PTI ने RSS को भाजपा का वैचारिक संगठन बताते हुए यह भी लिखा कि मई में भाजपा बंगाल की सत्ता में आई थी। टाइमिंग पर नज़र जाना स्वाभाविक है, हालाँकि ये रिपोर्टें दोनों बातों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं बतातीं।

एक और बात ध्यान देने वाली है। अलग-अलग रिपोर्टों में target अलग तरह से लिखा गया। द स्टेट्समैन ने sources के हवाले से लिखा कि संघ ने बंगाल में करीब 10,000 नई शाखाएँ खोलने का लक्ष्य रखा है, जबकि PTI के मुताबिक कुल संख्या 5,000 से बढ़ाकर 10,000 करनी थी। दोनों में बहुत बड़ा फ़र्क है।

कोलकाता के New Town में संघ के नए पाँच मंज़िला दफ़्तर ‘केशव स्मृति’ के उद्घाटन पर भी, मिलेनियम पोस्ट के मुताबिक, संघ करीब 5,000 शाखाओं का दावा कर रहा था और महालया तक इसे दोगुना करना चाहता था। उद्घाटन संघ के राष्ट्रीय महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने किया, और यह भवन मानिकतला के केशव भवन के annex की तरह काम करेगा।

आँकड़ों का सफ़र

अब ज़रा पीछे चलते हैं। संघ के अपने आँकड़ों के मुताबिक 2011 में बंगाल में 580 शाखाएँ थीं, 2014 में 1,280 और दिसंबर 2016 में 1,492। दिप्रिंट के मुताबिक 2020 में 1,600 शाखाएँ चल रही थीं, जो तब तक का सबसे ऊँचा आँकड़ा था। 2022 में डेक्कन हेराल्ड ने लिखा कि संघ के पास करीब 1,900 शाखाएँ हैं और 2024 तक 700 और जोड़ने का target है।

संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र ने 2025 में लिखा कि मध्य बंग प्रांत में शाखाएँ मार्च 2023 के 1,320 से बढ़कर 1,823 हो गईं। उत्तर बंग में आँकड़ा 1,034 से 1,153 हुआ, और दक्षिण बंग में 1,206 से 1,564। यहाँ एक बारीक बात है: उत्तर बंग वाले आँकड़े में शाखा, मिलन और मंडली, तीनों गिने गए थे।

यानी सीढ़ी कुछ ऐसी है: कुछ सौ, फिर हज़ार-डेढ़ हज़ार, फिर 2,000 के आसपास, और संघ के मुताबिक मई 2026 तक 5,000। उसके बाद 10 दिन में 5,000 और। इतनी बड़ी छलाँगों के बाद यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि “शाखा” की गिनती किस तरीके से हुई।

दावा RSS का है, verify कौन करेगा?

अब तक जितनी रिपोर्टें सामने आई हैं, उनमें आँकड़ों का स्रोत संघ के अपने पदाधिकारी हैं। TOI की रिपोर्ट के जितने हिस्से में हमने देखा, उसमें किसी स्वतंत्र पुष्टि का ज़िक्र नहीं दिखता। इसका मतलब यह नहीं कि दावा ग़लत है। बस इतना कि इसे “RSS का दावा” कहना सही है, “पक्का तथ्य” नहीं।

कुछ सवाल हैं जिनके जवाब फ़िलहाल सार्वजनिक नहीं दिखते:

  • “शाखा” की परिभाषा क्या ली गई? रोज़ लगने वाली शाखा, या साप्ताहिक मिलन और मंडली भी?
  • 5-6 लोगों से शुरू हुई शाखाएँ कितनी हैं, और 50-60 लोगों वाली कितनी?
  • नई शाखाएँ किन जिलों और इलाकों में हैं, और इनमें से कितनी नियमित चल रही हैं?

अगर पुरानी 5,000 और नई 5,000 जोड़ें, तो कुल करीब 10,000 बनती हैं। पर यह जोड़ भी संघ के ही दो दावों पर टिका है। संघ की तरफ़ से जिष्णु बसु का कहना है कि response बहुत अच्छा रहा। असली तस्वीर तब साफ़ होगी जब शाखाओं की संख्या, उनकी हाज़िरी और उनके इलाके, ये सब कहीं जाँचे जा सकने वाले रूप में सामने आएँ।

यह भी जानें : Who is Jean Drèze : ज्यां द्रेज़ आखिर कौन हैं? जंतर-मंतर पर एक सवाल और फिर चर्चा में आए NREGA के आर्किटेक्ट

रजिस्ट्रेशन और टैक्स पर भी एक नज़र

RSS किसी कानून के तहत registered संगठन नहीं है, और गुरुदक्षिणा पर आयकर नहीं देता। मोहन भागवत ने नवंबर 2025 में कहा था कि संघ एक मान्य “body of individuals” है। उनके मुताबिक 1925 में बने संगठन से ब्रिटिश सरकार के पास registration की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, और आज़ादी के बाद कानून ने पंजीकरण अनिवार्य नहीं किया। भागवत ने यह भी कहा कि आयकर विभाग से मुकदमेबाज़ी में अदालत ने संघ को body of individuals माना और गुरुदक्षिणा को टैक्स से छूट दी।

रिपोर्टों के अनुसार इस मामले में ITAT की बंबई बेंच (1980) और पटना हाई कोर्ट (1994) के फ़ैसले संघ के पक्ष में रहे, जहाँ “म्यूचुअलिटी” का सिद्धांत लागू हुआ। संघ का कहना है कि उसकी आय का स्रोत सिर्फ़ गुरुदक्षिणा है और वह सरकारी फंड नहीं लेता। दूसरी तरफ़, कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे जैसे आलोचक संघ के फंडिंग स्रोतों पर पारदर्शिता की माँग करते रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *