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Deval Danda Nagraja Uttarkashi: देवल डांडा नागराजा मंदिर उड़द की दाल से बना देवभूमि का अनोखा धाम, और यहाँ के विशेष मेले

Deval Danda Nagraja Uttarkashi: उत्तरकाशी की ऊँची धारों पर, जहाँ घने जंगल के बीच से गुज़रती पगडंडी आख़िरी मोड़ लेती है, वहाँ अचानक खुले आसमान के नीचे पत्थरों से बना एक शांत और भव्य मंदिर दिखाई देता है। यही है देवल डांडा, जहाँ नागराजा देवता विराजते हैं। गढ़वाली में “डांडा” पहाड़ की ऊँची धार या चोटी को कहते हैं और “देवल” का अर्थ है देवालय। यानी नाम ही बता देता है कि यह देवता का वह घर है, जो पहाड़ की चोटी पर बसा है।

यह मंदिर उत्तरकाशी जनपद के दशगी और भंडारस्यूं पट्टी क्षेत्र में स्थित है। आसपास के कई गांवों की आस्था यहीं आकर ठहरती है। कोई यहाँ श्रद्धा से माथा टेकने आता है, तो कोई मेले के उत्सव में शामिल होने। और आज यह मंदिर एक और वजह से अनूठा है: इसका नया भवन सीमेंट से नहीं, उड़द की दाल से बना है। इस लेख में हम आपको इसी मंदिर तक ले चलेंगे, कुमारकोट की पगडंडी से लेकर देवता की डोली तक, खीर के प्रसाद से लेकर उन दो मेलों (थौळ) तक, जिनका इंतज़ार यहाँ के लोग पूरे साल करते हैं।

कुमारकोट से मंदिर तक: मंज़िल सुंदर है, पर रास्ता लाजवाब है

देवल डांडा का सफ़र वहाँ से शुरू होता है जहाँ तक सड़क साथ देती है, यानी कुमारकोट। यहाँ तक आप गाड़ी से आ सकते हैं, पर इसके आगे मंदिर तक का रास्ता पैदल ही तय करना पड़ता है। मंदिर काफ़ी ऊँचाई पर है, इसलिए यह सीधी-सपाट सैर नहीं, पहाड़ी चढ़ाई है। सामान्य चाल से चलने वालों को करीब एक घंटा लग जाता है, और जो लोग धीरे चल पाते हैं उन्हें इससे कुछ ज़्यादा समय भी लग सकता है। पहाड़ में कुछ भी बहुत आसान नहीं होता, और यहाँ की चढ़ाई भी थोड़ी कठिन है। इसलिए आराम से, रुकते-रुकाते चलिए, पानी साथ रखिए और पैरों में मज़बूत जूते पहनिए।

पर यही मेहनत इस सफ़र को यादगार बना देती है। जैसे-जैसे आप ऊपर बढ़ते हैं, गाड़ियों का शोर पीछे छूटता जाता है और चारों ओर से जंगल आपको घेर लेता है। रास्ते के दोनों तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पेड़ हैं, हरी-भरी झाड़ियाँ हैं और तरह-तरह के पेड़-पौधे हैं। बसंत में जब बुरांस खिलते हैं, तो हरे जंगल के बीच जगह-जगह लाल फूल दहकते दिखाई देते हैं। गर्मियों में जाइए तो काफल के पेड़ फलों से लदे मिलते हैं, और पहाड़ का यह मेवा तोड़कर खाने का मज़ा ही अलग है।

कहते हैं कि कभी-कभी मंज़िल से ज़्यादा सुंदर रास्ता होता है। देवल डांडा के लिए यह बात बिल्कुल सही बैठती है: मंज़िल तो खूबसूरत है ही, पर रास्ता लाजवाब है।

नागराजा: कृष्ण का नागस्वरूप और गांव के रक्षक

गढ़वाल में नागराजा को भगवान श्रीकृष्ण का ही एक रूप माना जाता है। मान्यता है कि द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने नाग का रूप धारण किया था। उत्तरकाशी के सेममुखेम को नागराजा का मुख्य धाम माना जाता है, और पूरे गढ़वाल में नागराजा के अनेक मंदिर हैं।

लेकिन नागराजा सिर्फ़ पूजे जाने वाले देवता नहीं हैं, वे गांव के रक्षक भी हैं। लोक परंपरा में उन्हें भूमि का रक्षक यानी “भूम्याल” कहा जाता है, और पशुओं की रखवाली करने वाले देवता के रूप में “रखवाल्या” या “जगवाल्या”। खेत, जंगल, गोशाला और पूरा गांव, सब उनकी छत्रछाया में सुरक्षित माना जाता है। पौड़ी गढ़वाल के प्रसिद्ध डांडा नागराजा मंदिर के बारे में कथा है कि कृष्ण को वह स्थान इतना भाया कि उन्होंने नाग रूप में रेंगकर उसकी परिक्रमा की। देवल डांडा भी नागराजा की उसी विशाल आस्था-परंपरा से जुड़ा हुआ स्थान है, जहाँ देवता पहाड़ की चोटी से अपने पूरे क्षेत्र को निहारते हैं।

देवता के आदेश पर बना मंदिर: उड़द की दाल और पहाड़ के पत्थर

देवल डांडा का नया मंदिर अपने निर्माण के तरीके की वजह से पूरे इलाके में अनूठा माना जाता है। अप्रैल 2023 में अमर उजाला ने निर्माण के दौरान इस पर विस्तार से रिपोर्ट की थी। उसके अनुसार देवता की देवडोली ने आदेश दिया था कि मंदिर बनाने में सीमेंट और रेत-बजरी का प्रयोग न किया जाए, और उनकी जगह उड़द, यानी काली दाल, का उपयोग हो। देवता का आदेश सर्वोपरि था, इसलिए काम इसी के अनुसार शुरू हुआ।

आसपास के गांवों के लोगों ने अपने-अपने घरों में उड़द की दाल पीसी और श्रद्धा से मंदिर समिति को सौंप दी। यही पिसी हुई दाल निर्माण में जोड़ने की सामग्री बनी। मंदिर में लगे सारे पत्थर भी कहीं बाहर से नहीं मँगाए गए, वे इसी क्षेत्र में निकले पत्थर हैं। यानी यह मंदिर सचमुच इसी मिट्टी, इन्हीं पहाड़ों और यहाँ के लोगों की श्रद्धा से खड़ा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल, बगांण और सहारनपुर के कारीगर पत्थरों को तराशने और निर्माण के काम में जुटे थे, सात लोगों की टीम थी, और लक्ष्य था कि एक साल के भीतर पूरा मंदिर तैयार कर दिया जाए।

यह तकनीक नई नहीं, बल्कि बहुत पुरानी है। पहाड़ में भवन निर्माण में उड़द की दाल का प्रयोग टिहरी रियासत के समय किया जाता था। गंगा-यमुना घाटी अपनी भवन शैली के लिए जानी जाती है, खासकर पंचपुरा और ढैपुरा शैली के मकानों के लिए, पर आज की भौतिकवादी दौड़ में यह पारंपरिक शैली और निर्माण सामग्री धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। ऐसे में जुणगा और भंडारस्यूं के ग्रामीणों ने पुरानी विरासत को बचाने की एक नई शुरुआत की।

सबकी श्रद्धा, सबका मंदिर

इस मंदिर में किसी एक गांव की नहीं, कई गांवों की आस्था बसती है। आसपास के अनेक गांवों के लोग यहाँ पूजा करने आते हैं। मंदिर के निर्माण के समय भी करीब दस-ग्यारह गांव एक साथ जुड़े थे। निर्माण के लिए चंदा इकट्ठा किया गया, और लोगों ने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान दिया। कई श्रद्धालुओं ने तो लाखों रुपये तक की सेवा अर्पित की।

इसीलिए यह मंदिर किसी एक व्यक्ति या परिवार की देन नहीं, पूरे क्षेत्र की साझा श्रद्धा का जीवित स्मारक है। यहाँ की हर शिला और हर दीवार में कई गांवों के लोगों का भाव और पसीना शामिल है।

देवताओं की प्रतिमाएँ: पुरानी आस्था, नई भेंट

मंदिर के भीतर देवताओं की वे पुरानी प्रतिमाएँ आज भी स्थापित हैं, जो पीढ़ियों से पूजी जाती आ रही हैं। इनकी जगह कोई नहीं ले सकता, क्योंकि इनसे लोगों का रिश्ता किसी मूर्ति का नहीं, अपने कुल-देवता का है। नया मंदिर बन जाने के बाद श्रद्धालुओं ने इसे और भी सुंदर बना दिया। कई भक्तों ने अपनी ओर से एक से बढ़कर एक सुंदर, मनमोहक मूर्तियाँ मंदिर को भेंट कीं और दान स्वरूप स्थापित करवाईं। आज जब आप मंदिर के भीतर कदम रखते हैं, तो पुरानी आस्था और नई भेंटें एक साथ दिखाई देती हैं, मानो पीढ़ियों की श्रद्धा एक ही छत के नीचे आकर बैठ गई हो। हर मूर्ति के पीछे किसी न किसी परिवार की भावना जुड़ी है।

झामण और देवडोली: जुणगा से देवल डांडा तक

नागराजा देवता की डोली का स्थायी निवास जुणगा गांव में है। वहीं वह स्थापित रहती है और जब मेले (थौळ) का अवसर आता है, तब ऊपर देवल डांडा नागराजा मंदिर की ओर आती है। श्रद्धालुओं के लिए यह क्षण बेहद ख़ास होता है, क्योंकि देवता स्वयं अपने धाम में पधारते हैं। मेले संपन्न हो जाने के बाद डोली वापस जुणगा में स्थापित हो जाती है, और फिर अगले मेले तक वहीं विराजती है। यह वही देवडोली है, जिसके आदेश पर मंदिर का निर्माण उड़द की दाल से हुआ।

डोली में देवता का जो प्रकट स्वरूप होता है, उसे “झामण” कहा जाता है। झामण चाँदी का बना होता है और उसके ऊपर सोने का एक छत्र सजा होता है। चाँदी की चमक के ऊपर सोने का छत्र, यह देवता की गरिमा और भक्तों के मन में उनके स्थान का प्रतीक है।

मंदिर की पूजा-अर्चना की ज़िम्मेदारी नौटियाल परिवारों के पास है। यहाँ के पुजारी नौटियाल माने जाते हैं, और वही देवता की सेवा-पूजा का दायित्व निभाते हैं।

बुधवार और रविवार: पुजाई, शुद्ध दूध और खीर का प्रसाद

हफ़्ते में दो दिन देवल डांडा के लिए सबसे ख़ास होते हैं: बुधवार और रविवार। ये दोनों दिन नागराजा देवता के माने जाते हैं। इन दिनों मंदिर में विशेष पूजा होती है, जिसे यहाँ “पुजाई” कहा जाता है। पुजाई के दिन देवता को दूध चढ़ाया जाता है, और इसका नियम बहुत साफ़ है: दूध बिल्कुल शुद्ध होना चाहिए, उसमें पानी की मिलावट नहीं होनी चाहिए। इसका कारण भी बड़ा सुंदर है। नागराजा को श्रीकृष्ण का रूप माना जाता है, और कृष्ण तो दूध, दही, मक्खन और घी के रसिया हैं। जो चीज़ उन्हें सबसे प्रिय है, वही शुद्ध रूप में उन्हें अर्पित की जाती है।

इन दिनों यहाँ दूध और चावल की खीर का प्रसाद भी बनता है, जो भगवान को अति प्रिय माना जाता है। पहाड़ की ठंडी हवा में, मंदिर के आँगन में, देवता को अर्पित शुद्ध खीर के प्रसाद की बात ही कुछ और है।

जब बलि की प्रथा थम गई

मंदिर के इतिहास में एक बड़ा बदलाव भी जुड़ा है। पहले इस मंदिर में बलि दी जाती थी। लेकिन जब से नया मंदिर बना है, तब से यहाँ के निवासियों और पुजारियों ने, सबने मिलकर आपसी सहमति से इस प्रथा को बंद कर दिया। आज यहाँ बलि नहीं दी जाती। अब देवता को शुद्ध और शाकाहारी प्रसाद अर्पित किया जाता है और शांत, सात्विक ढंग से पूजा होती है। नए मंदिर के साथ आई यह नई सोच इस स्थान की पवित्रता को और गहरा करती है।

दो मेले (थौळ): असूज और बैसाख

देवल डांडा के साल का सबसे बड़ा उत्सव यहाँ के मेले (थौळ) हैं, और यहाँ हर साल दो मेले होते हैं।

पहला मेला (थौळ) असूज माह की 4 गते को लगता है, जो अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से लगभग 19 या 20 सितंबर के आसपास पड़ता है। इस इलाके में इस साल के मेलों की शुरुआत सबसे पहले यहीं से होती है। इसके बाद आसपास के दो-चार चुनिंदा गांवों में भी मेले होते हैं, पर पहली शुरुआत देवल डांडा से ही मानी जाती है। इसी मेले के लिए जुणगा गांव से नागराजा देवता की डोली ऊपर मंदिर तक आती है।

दूसरा मेला (थौळ) बैसाख माह की 3 गते को होता है, जो 16 अप्रैल के आसपास आता है। इस मेले की खासियत यह है कि यह सिर्फ़ और सिर्फ़ देवल डांडा नागराजा में होता है। असूज के मेले के साथ जहाँ आसपास के अन्य गांवों में भी मेले होते हैं, वहीं बैसाख के इस मेले में इधर-उधर कहीं और मेला नहीं होता। उस दिन आसपास की सारी श्रद्धा और सारा उत्सव इसी एक मंदिर में सिमट आता है।

मेले के दिनों में देवल डांडा सिर्फ़ एक मंदिर नहीं रह जाता, वह पूरे इलाके का मिलन-स्थल बन जाता है। कई गांवों के लोग एक साथ जुटते हैं, देवता की डोली के दर्शन करते हैं, और बरसों से चली आ रही परंपराओं में एक बार फिर शामिल होते हैं।

FAQ अक्सर पूछे जानें वाले सवाल

देवल डांडा नागराजा मंदिर कहाँ है?

उत्तरकाशी जनपद के दशगी और भंडारस्यूं पट्टी क्षेत्र में, पहाड़ की ऊँची धार पर। कुमारकोट तक गाड़ी जाती है, वहाँ से करीब एक घंटे की पैदल चढ़ाई है।

देवल डांडा नागराजा मंदिर का मेला कब लगता है?

यहाँ साल में दो मेले (थौळ) लगते हैं। पहला असूज की 4 गते (लगभग 19-20 सितंबर) को और दूसरा बैसाख की 3 गते (लगभग 16 अप्रैल) को। दूसरा मेला सिर्फ़ इसी मंदिर में होता है।

उत्तरकाशी का कौन-सा मंदिर उड़द की दाल से बना है?

देवल डांडा नागराजा मंदिर। देवडोली के आदेश पर इसमें सीमेंट की जगह गांव वालों की दी हुई उड़द की दाल लगी है, और पत्थर भी इसी क्षेत्र के हैं।

कुमारकोट से देवल डांडा कैसे पहुँचे?

कुमारकोट तक गाड़ी से जाइए, फिर करीब एक घंटा पैदल चढ़ना होता है। रास्ता पहाड़ी है, इसलिए पानी और आरामदायक जूते साथ रखें।

नागराजा मंदिर में बुधवार-रविवार को क्या पूजा होती है?

इन दोनों दिन नागराजा देवता की विशेष पूजा (पुजाई) होती है। इसमें शुद्ध दूध चढ़ता है और दूध-चावल की खीर का प्रसाद बनता है।

नागराजा देवता को दूध और खीर क्यों चढ़ाते हैं?

नागराजा को श्रीकृष्ण का रूप माना जाता है, और कृष्ण को दूध, दही, मक्खन, घी और खीर बहुत प्रिय हैं।

How to reach Deval Danda Nagraja temple Uttarkashi?

Drive up to Kumarkot in Uttarkashi district, then walk about one hour uphill through the forest to the temple.

आखिर में

देवल डांडा नागराजा केवल पत्थर और दाल से बना एक मंदिर नहीं है। यह उस सामूहिक श्रद्धा का नाम है जिसने सीमेंट की जगह उड़द की दाल को चुना, जिसने अपने ही पहाड़ों के पत्थरों से अपने देवता का घर खड़ा किया, और जिसने समय के साथ बलि जैसी प्रथा को छोड़कर शुद्ध और सात्विक पूजा को अपनाया। यहाँ चाँदी का झामण है, उस पर सोने का छत्र है, बुधवार-रविवार की पुजाई है, शुद्ध दूध और खीर का प्रसाद है, और साल में दो बार लगने वाले मेले हैं जिनका इंतज़ार पूरा क्षेत्र करता है।

अगर कभी उत्तरकाशी की ओर आना हो, तो कुमारकोट से इस चढ़ाई पर ज़रूर निकलिए। बुरांस और काफल के बीच से होकर, जंगल की शांति ओढ़े जब आप मंदिर के आँगन में पहुँचेंगे, तो थकान अपने-आप उतर जाएगी। और तब आप भी मानेंगे कि मंज़िल तो खूबसूरत है ही, पर रास्ता लाजवाब है।

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