RBI की पटना और मुंबई बोर्ड बैठकों में polymer यानी plastic के नोट लाने पर गंभीरता से चर्चा हुई है। कोई official ऐलान अभी नहीं हुआ — लेकिन सूत्रों के मुताबिक pilot project जल्द announce हो सकता है। ₹10 और ₹20 के नोटों से शुरुआत होने की बात है। सुनने में अच्छा लगता है — लेकिन ज़रा रुकिए।

एक तरफ सरकार currency upgrade की बात कर रही है। दूसरी तरफ देश की असली तस्वीर कुछ और ही कह रही है —

~8% बेरोज़गारी दर — करोड़ों युवा काम की तलाश में
↑ तेज़ महंगाई — रसोई का बजट हर महीने बिगड़ रहा है
80 Cr+ लोग मुफ्त राशन पर निर्भर — गरीबी की असल दास्तान

जब देश की इतनी बड़ी आबादी मुफ्त राशन पर जी रही हो, जब युवाओं के हाथ में काम नहीं है, जब आम आदमी महंगाई से कराह रहा हो — तब नोट का कागज़ बदलना सरकार की priority में कैसे आ गया?

FY25 में RBI ने नोट छापने पर ₹6,372 करोड़ खर्च किए — एक साल पहले यह ₹5,101 करोड़ था। अब polymer notes के लिए नया infrastructure, नई मशीनें, नया setup — यह खर्च और बढ़ेगा। पैसा कहाँ से आएगा? जनता की जेब से।

सरकार का तर्क है कि polymer notes 5 से 7 साल तक चलते हैं — जबकि कागज़ी नोट सिर्फ 1-2 साल। यानी long-term में बचत होगी। यह तर्क गलत नहीं है। दुनिया के 60 से ज़्यादा देश polymer notes इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्हें फायदा हुआ है।

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लेकिन long-term बचत का फायदा तब मिलता है जब पहले बड़ा खर्च झेलना पड़े। सवाल यह है — क्या अभी यही वक्त है वो खर्च उठाने का? जब लोगों के सामने रोटी, रोज़गार और इलाज की समस्याएं खड़ी हैं?


⚠️ और एक सवाल

यह polymer substrate — जिससे नए नोट बनेंगे — कौन supply करेगा? ठेका किसे मिलेगा? RBI ने अभी कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन भारत में हर बड़े सरकारी प्रोजेक्ट में सरकार के परम मित्र जरूर होते हैं तो ऐसे में यह सवाल पूछा जाना जरुरी है कहीं किसी एक ही के व्यापर को उन्नति दिलाने के लिए यह प्रोजेक्ट तो नहीं लाया गया। सवाल पूछना जरुरी है क्योंकि जनता का पैसा है, जनता को हिसाब मिलना चाहिए।