पेट्रोल-डीज़ल की महँगाई और एथेनॉल का खेल: आम जनता की जेब से लेकर नेताओं की फैक्ट्रियों तक Laxmi Nautiyal, September 28, 2025September 28, 2025 भारत में पेट्रोल-डीज़ल की महँगाई हमेशा सुर्ख़ियों में रहती हैं। ज़रा-सी बढ़ोतरी भी हर घर के बजट को हिला देती है। लेकिन यह कहानी सिर्फ़ महँगाई तक सीमित नहीं है। अब इसमें एथेनॉल ब्लेंडिंग का नया अध्याय जुड़ चुका है, जिसे सरकार हरित ऊर्जा और किसानों की मदद बताकर पेश कर रही है। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में आम जनता और किसानों को राहत दे रहा है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक और आर्थिक खेल छिपा है? पेट्रोल-डीज़ल की महँगाई क्यों बढ़ती हैं? भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में से एक है। यहाँ पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें कई कारणों से तय होती हैं: कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें (Crude Oil Prices) – अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बढ़त सीधा असर डालती है।कर और टैक्स (Excise + VAT) – भारत में पेट्रोल की असली कीमत का लगभग आधा हिस्सा टैक्स होता है।रुपया बनाम डॉलर – रुपये की कमजोरी से आयात महँगा हो जाता है।सरकारी नीतियाँ – चुनावों से पहले अक्सर कीमतें स्थिर रखी जाती हैं, जबकि अन्य समय पर इन्हें बाज़ार पर छोड़ दिया जाता है। पेट्रोल-डीज़ल की महँगाई का असर जनता पर पेट्रोल-डीज़ल सिर्फ गाड़ियों का ईंधन नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। परिवहन महँगा होता है, जिससे सब्ज़ी, राशन, दवाइयाँ और ज़रूरी सामान भी महँगा हो जाता है।मध्यमवर्गीय और गरीब तबका सबसे ज़्यादा प्रभावित होता है।किसानों पर भी बड़ा असर पड़ता है, क्योंकि खेती-बाड़ी में डीज़ल की खपत बहुत ज़्यादा होती है। एथेनॉल ब्लेंडिंग: राहत या राजनीति? सरकार ने 2025 तक पेट्रोल में 20% एथेनॉल (E20) मिलाने का लक्ष्य रखा है। अभी ज़्यादातर जगहों पर 10% एथेनॉल (E10) मिश्रण हो रहा है। इसका दावा किया गया फायदा यह है कि: आयात पर निर्भरता कम होगी।प्रदूषण घटेगा।किसानों की आय बढ़ेगी, क्योंकि एथेनॉल गन्ने और मक्के जैसी फ़सलों से बनता है। लेकिन हक़ीक़त में तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। किसको मिल रहा है सबसे बड़ा लाभ? आलोचकों का कहना है कि एथेनॉल योजना का सबसे ज़्यादा फायदा उन औद्योगिक घरानों को हो रहा है, जिनकी चीनी मिलें और एथेनॉल फैक्ट्रियाँ हैं। इनमें कई फैक्ट्रियाँ सीधे नेताओं और उनके परिवारों से जुड़ी हुई हैं। उदाहरण के तौर पर, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बेटे की फैक्ट्री को भी इस नीति से लाभ पहुँचने की चर्चा रहती है।महाराष्ट्र और कर्नाटक की कई चीनी मिलें स्थानीय नेताओं के परिवारों के स्वामित्व में हैं। यानी जनता को राहत देने के नाम पर जो नीति लाई गई है, उसका सबसे बड़ा मुनाफ़ा राजनीतिक परिवारों की जेब में जा रहा है। क्या बीजेपी परिवारवाद से सच में दूर है, तो क्यों नेताओं के वारिस बड़े पदों पर दिखते हैं? क्या यह सिर्फ हरित ऊर्जा का एजेंडा है? नहीं। यह कदम पर्यावरण और ऊर्जा नीति का हिस्सा तो है, लेकिन इसके साथ राजनीतिक कार्ड भी जुड़ा हुआ है। किसानों को साधने का प्रयास।चुनावी समय पर “किसान हितैषी” छवि दिखाना।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को हरित ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ा हुआ साबित करना। समाधान क्या हो सकता है? टैक्स संरचना में पारदर्शिता और संतुलन लाना।एथेनॉल उद्योग में नेताओं और उनके परिवारों की हिस्सेदारी को साफ़ करना।वैकल्पिक ऊर्जा (इलेक्ट्रिक वाहन, हाइड्रोजन, सोलर) पर वास्तविक निवेश।किसानों को सीधे लाभ पहुँचाने के लिए पारदर्शी व्यवस्था। पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतें आम जनता की जेब पर बोझ हैं। एथेनॉल मिश्रण को जनता और किसानों के हित में बताया जा रहा है, लेकिन असली फ़ायदा कई बार नेताओं से जुड़ी फैक्ट्रियों और बड़े उद्योगपतियों को मिल रहा है। महँगाई और राजनीति के बीच फँसी जनता के लिए सवाल वही है—क्या कभी यह नीति सच में उनके लिए राहत बनेगी, या फिर यह हमेशा सत्ता और उद्योगपतियों का खेल ही रहेगा? लेह-लद्दाख में उबाल: राज्य दर्जे और अधिकारों की मांग पर प्रदर्शन हिंसक, कई मौतें और गिरफ्तारियाँ News Article