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क्या बीजेपी परिवारवाद से सच में दूर है, तो क्यों नेताओं के वारिस बड़े पदों पर दिखते हैं?

भारतीय राजनीति में परिवारवाद (Dynasty Politics) एक पुराना मुद्दा है। दशकों से कांग्रेस पार्टी और कई क्षेत्रीय दलों पर परिवारवाद का आरोप लगता आया है। कांग्रेस को गांधी-नेहरू परिवार की पार्टी कहा गया, समाजवादी पार्टी को मुलायम सिंह यादव का घराना और राष्ट्रीय जनता दल को लालू प्रसाद यादव का परिवार। बीजेपी ने हमेशा इन दलों को “परिवारवाद” के नाम पर घेरा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बीजेपी खुद इससे पूरी तरह मुक्त है, या फिर केवल खुद को “दूध का धुला” दिखाने की कोशिश करती है?

बीजेपी का दावा

बीजेपी यह दावा करती है कि उसकी ताकत पार्टी के संगठन, कार्यकर्ताओं की मेहनत और विचारधारा पर आधारित है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे नेता बार-बार कहते हैं कि उनकी पार्टी अवसरवाद और वंशवाद से दूर है। उनका कहना है कि बीजेपी में कोई भी साधारण कार्यकर्ता मेहनत और संघर्ष से शीर्ष पर पहुँच सकता है।

हकीकत क्या है?

अगर जमीन पर देखें तो यह दावा आधा सच और आधा दिखावा ही लगता है।
बीजेपी में भी कई बड़े नेताओं के बेटे-बेटियां राजनीति और पब्लिक लाइफ में सक्रिय हैं।

  • अमित शाह के बेटे जय शाह, जो भले ही सीधे राजनीति में नहीं हैं, लेकिन बीसीसीआई के सचिव जैसे ऊँचे पद पर हैं। सवाल उठता है कि क्या यह उनकी काबिलियत का नतीजा है या पिता की ताकत का असर?
  • राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े कद के नेता माने जाते हैं।
  • वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह लगातार सांसद रहे हैं।
  • राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी कई नेताओं के परिवार राजनीति में आगे बढ़ते दिखाई देते हैं।

यानी, बीजेपी का दावा कि उसके यहाँ परिवारवाद नहीं है, पूरी तरह सही नहीं है।

बीजेपी का परिवारवाद और विपक्ष का परिवारवाद

यह भी सच है कि बीजेपी का परिवारवाद कांग्रेस या अन्य दलों की तरह खुला और पूरी पार्टी पर हावी नहीं है। कांग्रेस में गांधी परिवार के बिना पार्टी की कल्पना ही नहीं की जा सकती, जबकि बीजेपी में ऐसा कोई “एक ही परिवार” हावी नहीं है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बीजेपी में परिवारवाद नहीं है। फर्क बस इतना है कि बीजेपी इसे छिपाकर, सीमित रूप में पेश करती है और खुद को ज़्यादा “दूध का धुला” बताने की कोशिश करती है।

जनता की नज़र में

जनता जानती है कि राजनीति में पूरी तरह परिवारवाद से मुक्त रहना लगभग नामुमकिन है। हर पार्टी में नेताओं के परिवार का प्रभाव किसी न किसी रूप में दिखाई देता है। फर्क बस पैमाने का है।
बीजेपी अगर यह कहे कि उसके यहाँ बिल्कुल परिवारवाद नहीं है, तो यह जनता को गुमराह करने जैसा होगा।

मीडिया की भूमिका

मीडिया का भी इसमें बड़ा रोल है। कई बार मीडिया यह छवि बनाता है कि बीजेपी अन्य पार्टियों से अलग है और उसमें परिवारवाद जैसी बीमारी नहीं है। लेकिन जब नेताओं के बच्चों और रिश्तेदारों की बढ़ती मौजूदगी पर नज़र डालें, तो यह दावा उतना ठोस नहीं लगता।

बीजेपी ने विपक्षी दलों को परिवारवाद के मुद्दे पर घेरा है और इस मुद्दे पर जनता का समर्थन भी पाया है। लेकिन खुद को पूरी तरह “दूध का धुला” बताना सही नहीं है।
बीजेपी में भी नेताओं के बेटे-बेटियां राजनीति और अहम पदों पर मौजूद हैं। हाँ, यह ज़रूर है कि बीजेपी में यह सिस्टम उतना खुलकर और पूरी पार्टी पर हावी नहीं है जितना कांग्रेस या अन्य दलों में है।
असल सवाल यह है कि क्या राजनीति में कभी परिवारवाद पूरी तरह खत्म हो पाएगा, या यह भारतीय लोकतंत्र की एक स्थायी सच्चाई बन चुका है?

Note : बीजेपी को आधे से ज्यादा वोट जनता से इसीलिए मिलते हैं, कि उनमे परिवारवाद नहीं दिखता। लेकिन सच मानों तो आज तक किसी ने उनका परिवारवाद दिखाया ही नहीं।

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