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भगवान की मूर्ति की आँखें सबसे अंत में क्यों बनाई जाती हैं_

भगवान की मूर्ति की आँखें सबसे अंत में क्यों बनाई जाती हैं?

Laxmi Nautiyal, September 22, 2025September 22, 2025

भारतीय संस्कृति और धर्म में भगवान की मूर्ति निर्माण की परंपरा सदियों से चली आ रही है। मूर्तिकार जब किसी देवता की मूर्ति बनाते हैं तो एक-एक अंग को बड़ी बारीकी से गढ़ते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान की मूर्ति में आँखें सबसे अंत में ही क्यों बनाई जाती हैं? इसके पीछे सिर्फ कलात्मक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और धार्मिक कारण भी छिपे हैं।

मूर्ति निर्माण की परंपरा

मूर्ति निर्माण (शिल्पकला) कोई साधारण कार्य नहीं है। यह शास्त्रों में वर्णित नियमों और विधियों के अनुसार ही किया जाता है। मूर्तिकार भगवान की प्रतिमा बनाते समय एक-एक अंग को जीवंत बनाने का प्रयास करता है। जब तक मूर्ति की आँखें नहीं बन जातीं, तब तक वह अधूरी मानी जाती है।

आँखों का विशेष महत्व

हिंदू धर्म में आँखों को आत्मा का दर्पण माना गया है। जब मूर्तिकार मूर्ति की आँखें बनाता है, तो उसमें प्राण-प्रतिष्ठा का भाव समाहित होता है। ऐसा माना जाता है कि आँखें बनने के बाद मूर्ति सचमुच “जीवंत” हो जाती है और उसमें दिव्यता आ जाती है।

भगवान की मूर्ति की आँखें सबसे अंत में क्यों बनाई जाती हैं?

मूर्ति की आँखें बनाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। इसके पीछे कई धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं:

  1. प्राण-प्रतिष्ठा की शुरुआत – शास्त्रों के अनुसार आँखें बनते ही मूर्ति में जीवन और ऊर्जा का संचार हो जाता है। इसलिए यह सबसे अंतिम चरण में किया जाता है।
  2. मूर्ति को जीवंत बनाना – जब आँखें बन जाती हैं, तो मूर्ति जीवंत प्रतीत होती है। इससे भक्तों को अनुभव होता है कि भगवान उन्हें देख रहे हैं।
  3. भक्ति और एकाग्रता – मूर्तिकार आँखें गढ़ते समय सबसे ज्यादा भक्ति और ध्यान में डूब जाता है। वह चाहता है कि मूर्ति का दिव्य रूप पूर्णता के साथ उभरे।
  4. आस्था और परंपरा – यह परंपरा हमें सिखाती है कि आँखें केवल देखने का साधन नहीं, बल्कि आत्मा और दिव्यता का प्रतीक हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदेश

भगवान की मूर्ति की आँखें सबसे अंत में क्यों बनाई जाती हैं?

यह परंपरा हमें यह भी बताती है कि आँखों से ही जीवन का असली स्वरूप प्रकट होता है। जब मूर्ति की आँखें बनती हैं, तभी मूर्ति पूर्ण और जीवंत मानी जाती है। भक्तों का विश्वास है कि उस समय भगवान उनके सामने प्रकट होकर उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हैं।

भगवान की मूर्ति की आँखें सबसे अंत में बनाने की परंपरा कला, शास्त्र और आस्था तीनों का संगम है। यह प्रक्रिया मूर्ति को जीवंत बनाती है और उसमें दिव्यता का संचार करती है। यही कारण है कि आँखें सबसे अंत में गढ़ी जाती हैं और तभी मूर्ति पूर्ण और पूजनीय होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. भगवान की मूर्ति की आँखें सबसे अंत में क्यों बनाई जाती हैं?

क्योंकि आँखें प्राण और दिव्यता का प्रतीक हैं। उन्हें अंत में बनाना प्राण-प्रतिष्ठा की शुरुआत माना जाता है।

2. अगर आँखें पहले बना दी जाएँ और शरीर बाद में गढ़ा जाए तो क्या होगा?

यह शास्त्रों के नियमों के विपरीत है। इसे अशुभ और अपूर्ण प्राण-प्रतिष्ठा माना जाता है।

3. मूर्ति की आँखें बनाने की प्रक्रिया को क्या कहा जाता है?

इसे नेत्रोन्मीलन संस्कार कहते हैं, जिसका अर्थ है मूर्ति की आँखें खोलना या दिव्यता प्रदान करना।

4. क्या बिना आँखों वाली मूर्ति अधूरी मानी जाती है?

हाँ, जब तक आँखें नहीं बनतीं मूर्ति अधूरी मानी जाती है। आँखें बनने के बाद ही मूर्ति पूर्ण और पूजनीय होती है।

5. मूर्ति की आँखें बनाते समय मूर्तिकार क्या विशेष ध्यान रखता है?

वह भक्ति, एकाग्रता और श्रद्धा के साथ आँखें गढ़ता है ताकि मूर्ति जीवंत और दिव्य प्रतीत हो।

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