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गंगा सफाई से लेकर स्मार्ट सिटी मिशन तक, अरबों खर्च, नतीजे शून्य, आखिर पैसा गया कहाँ_

गंगा सफाई से लेकर स्मार्ट सिटी मिशन तक — अरबों खर्च, नतीजे शून्य, आखिर पैसा गया कहाँ?

Hindi News, October 12, 2025October 12, 2025

देश की सबसे पवित्र मानी जाने वाली गंगा नदी पर सरकार ने अरबों रुपये खर्च किए, लेकिन स्थिति में खास सुधार नहीं दिखा।
‘नमामि गंगे योजना’ 2014 में बड़े वादों के साथ शुरू की गई थी, लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि गंगा का लगभग 80% हिस्सा अब भी प्रदूषित है।
नालों से गंदा पानी अब भी सीधे नदी में गिर रहा है और सफाई का काम अधिकतर कागज़ों में सीमित दिखता है।

नतीजे कम, प्रचार ज़्यादा

हर साल गंगा सफाई के लिए भारी बजट जारी होता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर बदलाव बहुत धीमा है।
लोगों का कहना है कि सरकार सफाई का दिखावा तो करती है, लेकिन गंगा की असली हालत को सुधारने के लिए ईमानदार प्रयास नहीं दिखते।

और भी कई खर्चे हुए, जहाँ पैसा दिखा पर काम नहीं हुआ

गंगा की तरह ही भारत में कई अन्य प्रोजेक्ट ऐसे हैं जहाँ सरकार ने बड़े-बड़े फंड तो जारी किए, लेकिन परिणाम नगण्य रहे।
इन उदाहरणों से साफ है कि समस्या केवल एक योजना की नहीं, बल्कि सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी की है।

1. स्मार्ट सिटी मिशन — अधूरे सपनों का शहर

2015 में शुरू हुआ Smart Cities Mission भारत को आधुनिक बनाने का सपना था।
सरकार ने हजारों करोड़ रुपये का बजट घोषित किया, परंतु आज भी कई प्रोजेक्ट अधूरे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक ₹13,000 करोड़ से अधिक की योजनाएँ अभी तक पूरी नहीं हुईं।
कई जगह तो स्मार्ट सिटी का बोर्ड लगा है, पर असल काम बंद पड़ा है।

2. छत्तीसगढ़ — 900 करोड़ के अधूरे प्रोजेक्ट्स

छत्तीसगढ़ में लगभग ₹900 करोड़ खर्च कर बनाए गए प्रोजेक्ट जैसे स्काईवॉक, मॉल, और अस्पताल, जनता के किसी काम नहीं आ पाए।
अस्पताल बंद हैं, इमारतें जर्जर हो रही हैं, और यह पैसा बर्बादी का उदाहरण बन गया है।

3. राजस्थान — रुके हुए प्रोजेक्ट्स की लंबी लिस्ट

जयपुर में रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट और कई अन्य योजनाएँ जैसे OASES Complex, करोड़ों रुपये खर्च के बावजूद अधूरी हैं।
भूमि विवाद और कानूनी पेचीदगियों ने इन्हें रोक दिया है।
लोगों का कहना है कि “कागज़ पर विकास हो रहा है, ज़मीन पर नहीं।”

4. दिल्ली — हजारों करोड़ का बजट, अधूरे काम

दिल्ली सरकार पर भी आरोप लगे कि उसने 49 बड़े प्रोजेक्ट्स पर ₹17,000 करोड़ का बजट खर्च किया, लेकिन काम अधूरा छोड़ा।
इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, और पर्यावरण से जुड़ी योजनाएँ प्रमुख थीं।
कई स्थानों पर टेंडर पास हुए लेकिन प्रोजेक्ट शुरू तक नहीं हो सके।

5. ग्रेटर नोएडा — अधूरे औद्योगिक प्रोजेक्ट्स

ग्रेटर नोएडा इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (GNIDA) की रिपोर्ट बताती है कि उसके आवंटित औद्योगिक प्लॉट्स में से सिर्फ 52% ही उपयोग में हैं।
बाकी प्लॉट वर्षों से खाली पड़े हैं और निवेशकों ने भुगतान तक नहीं किया।
मनोरंजन और खेल योजनाएँ भी अपने मूल उद्देश्य से भटक गईं।

ईमानदारी ही असली सफाई है

विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या पैसों की नहीं, बल्कि ईमानदारी और निगरानी की कमी की है।
जब तक सरकारी विभाग, स्थानीय निकाय और जनता मिलकर काम नहीं करेंगे, तब तक ये अरबों खर्च केवल आंकड़ों का खेल बने रहेंगे।

नोट:

गंगा से लेकर स्मार्ट सिटी मिशन तक — हर जगह एक ही कहानी दोहराई जा रही है।
पैसा दिखाया गया, प्रचार हुआ, लेकिन असली विकास अब भी गायब है।

भारत के अजीबो-गरीब कानूनों का सच्चा फैक्ट चेक – क्या ये आज भी लागू हैं?

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