CAG Report Rajasthan 2026: सड़क सुरक्षा फंड का आधे से भी कम पैसा हुआ खर्च
CAG Report Rajasthan 2026: सड़क हादसे रोकने के लिए बने फंड में पैसा पड़ा हो और मौतें फिर भी घटने का नाम न लें, तो इसे क्या कहेंगे? लापरवाही, सुस्ती, या सिस्टम की कमज़ोरी? CAG की ताज़ा रिपोर्ट (Report No. 1 of 2026, “Road Safety System in Rajasthan”) ने राजस्थान के सड़क सुरक्षा फंड को लेकर यही सवाल खड़ा कर दिया है। आँकड़े देखिए तो बात और साफ़ हो जाती है।
फंड क्यों बना था
राजस्थान सरकार ने मार्च 2017 में राज्य सड़क सुरक्षा नीति बनाई। इसी नीति के तहत अप्रैल 2017 में एक अलग सड़क सुरक्षा फंड बना। इसमें चालान और कंपाउंडिंग फीस का एक हिस्सा, यानी 25 प्रतिशत तक, जमा किया जाता है।
फंड का मक़सद सीधा था। हादसों, मौतों और घायलों की संख्या घटाने के लिए जो भी काम हों, उनका खर्च इसी फंड से उठे। सड़क परिवहन व्यवस्था को सुरक्षित बनाया जाए और संस्थागत ढाँचा मज़बूत हो। फंड के इस्तेमाल और निगरानी के लिए एक स्टीयरिंग कमेटी भी बनी, जिसकी अध्यक्षता परिवहन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव या सचिव करते हैं।
यानी कागज़ पर इंतज़ाम पूरा था। पैसे का स्रोत तय था, काम तय थे और निगरानी की कमेटी भी बनी हुई थी।
पैसा था, पर खर्च नहीं हुआ
असली गड़बड़ी यहीं दिखती है। 2017-18 से 2024-25 के बीच इस फंड में कुल 716.37 करोड़ रुपये आए। इनमें से खर्च हुए सिर्फ़ 343.36 करोड़ रुपये, यानी 47.93 प्रतिशत। मतलब आधे से भी कम।
सीधा हिसाब लगाइए तो करीब 373 करोड़ रुपये बिना खर्च पड़े रहे। यह पैसा गायब नहीं हुआ, बस काम में नहीं लगा। और सड़क सुरक्षा जैसे मामले में, जहाँ हर साल हज़ारों परिवार अपनों को खोते हैं, पैसे का काम में न लगना भी अपने आप में बड़ा सवाल है।
यह कम खर्च किसी एक विभाग तक सीमित नहीं था। फंड का इस्तेमाल करने वाले कई विभागों में यही हाल रहा।
वजह क्या रही
इस मामले में कारण और असर का रिश्ता समझना ज़रूरी है। ऐसा नहीं है कि फंड कम खर्च हुआ, इसलिए काम रुके। उलटा हुआ। सड़क सुरक्षा कार्ययोजना और रोड मैप में जो काम तय किए गए थे, वे ज़मीन पर पूरे लागू ही नहीं हुए। काम नहीं हुए, तो पैसा खर्च नहीं हुआ।
इसी का नतीजा यह रहा कि इंटीग्रेटेड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम और ट्रॉमा केयर जैसी ज़रूरी पहलें धीमी पड़ीं या अटकी रहीं। और ये वही चीज़ें हैं जो हादसे के वक़्त या उससे पहले सीधे जान बचाने का काम करती हैं।
राज्य सरकार ने ऑडिट में सामने आई बातों को स्वीकार किया है और अप्रैल 2025 में अपना जवाब भी दिया है।
लक्ष्य क्या था, नतीजा क्या रहा
अब सबसे अहम हिस्से पर आते हैं, यानी मौतों पर।
सड़क सुरक्षा कार्ययोजना 2018-2020 का लक्ष्य साफ़ था। 2015 को आधार वर्ष मानकर मौतों में 50 प्रतिशत की कमी लानी थी। 2015 में राजस्थान में सड़क हादसों में 10,510 लोगों की जान गई थी। यानी लक्ष्य था कि यह संख्या घटकर आधी के आसपास आ जाए।
लेकिन 2024 में मौतों का आँकड़ा 11,790 रहा। घटने की जगह यह संख्या और ऊपर चली गई।
हादसों की कुल संख्या कुछ सालों में ऊपर-नीचे ज़रूर होती रही, लेकिन मौतों की तस्वीर लगभग जस की तस रही। इस दौरान सड़क सुरक्षा की पहलों पर 343.36 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे। यानी खर्च भी हुआ, फिर भी नतीजा नहीं दिखा। यह दो तरफ़ा सवाल है: जो पैसा खर्च हुआ उसका असर कहाँ गया, और जो पैसा खर्च नहीं हुआ वह किस काम का इंतज़ार कर रहा है?
अगली योजना भी देर से आई
2018-2020 की कार्ययोजना के बाद अगली योजना का इंतज़ार करना पड़ा। राजस्थान की नई सड़क सुरक्षा कार्ययोजना 2024-2033 चार साल की देरी से, यानी 2024 में आई। बीच के सालों में राज्य के पास कोई नई, तय दिशा वाली योजना नहीं थी।
सोचिए, इन चार सालों में भी सड़कों पर गाड़ियाँ चलती रहीं और हादसे होते रहे। योजना की देरी का मतलब सिर्फ़ फ़ाइल का देर से बनना नहीं होता। उसका मतलब होता है कि जो सुधार समय पर शुरू होने थे, वे टलते चले गए।
सड़कों का सेफ्टी ऑडिट भी अधूरा
ऑडिट में सड़कों की जाँच से जुड़े आँकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। लोक निर्माण विभाग (PWD) की 146 सड़कें, यानी करीब 34.35 प्रतिशत, ऐसी थीं जिनमें से हर एक की लागत 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा थी, फिर भी उनका सुरक्षा ऑडिट किसी भी स्तर पर नहीं हुआ। नियम के हिसाब से सड़क बनने के अलग-अलग चरणों में सेफ्टी ऑडिट होना चाहिए।
इसी तरह PWD और NHAI की बनाई 5 किलोमीटर या उससे लंबी 1,175 सड़कों में से सिर्फ़ 636 सड़कों, यानी लगभग 54 प्रतिशत, का डिज़ाइन स्तर पर ऑडिट हुआ। बाकी की सड़कों में यह जाँच ही नहीं हुई।
सीधी बात यह है कि जब सड़क के डिज़ाइन में ही खामी रह जाए, तो बाद में चालान काटने या जागरूकता अभियान चलाने से हादसों की जड़ नहीं मिटती। पहले सड़क सुरक्षित बननी चाहिए। यही वह जगह है जहाँ फंड का सही इस्तेमाल सबसे ज़्यादा काम आ सकता था।
और भी अधूरे काम
ऑडिट ने कुछ और कमियाँ भी गिनाई हैं। सड़क हादसों पर शोध के लिए प्रस्तावित सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस अब तक बन नहीं पाया, और वजह फंड की दिक्कत बताई गई। यह बात अपने आप में अजीब है। एक तरफ़ करीब 373 करोड़ रुपये बिना खर्च पड़े रहे, दूसरी तरफ़ शोध केंद्र जैसी ज़रूरी चीज़ फंड की वजह से अटकी रही। ट्रैफिक पार्कों के लिए दिए गए पैसे और जागरूकता से जुड़ी गतिविधियों में भी गड़बड़ियाँ सामने आई हैं। कई अनफिट गाड़ियाँ बिना रोक-टोक के चलती रहीं, जिससे जनता की सुरक्षा से समझौता हुआ।
इन सबका नतीजा यही निकलता है कि कमी सिर्फ़ पैसे की नहीं थी। कमी योजना को ज़मीन पर उतारने की थी।
कमज़ोर कड़ी: रोड सेफ्टी सेल
राज्य में सड़क सुरक्षा की मुख्य एजेंसी के तौर पर रोड सेफ्टी सेल बनाया गया था। इसका काम होना था फंड पर नज़र रखना, अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल बनाना और योजनाओं को लागू करवाना।
लेकिन यह सेल खुद संसाधनों की कमी से जूझता रहा। इसके कई पद या तो खाली थे या मंज़ूर ही नहीं हुए थे। जिस संस्था के कंधों पर निगरानी और तालमेल की ज़िम्मेदारी हो, वही अधूरे स्टाफ़ से चल रही हो, तो नतीजा क्या होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है। फंड की निगरानी कमज़ोर हुई, विभाग अपने-अपने स्तर पर चलते रहे और कोई एक जगह नहीं थी जो पूरी तस्वीर पर नज़र रखे।
आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या है
इन आँकड़ों को सिर्फ़ फ़ाइलों की बात मत समझिए। सड़क हादसे में जान जाना किसी परिवार के लिए पूरी ज़िंदगी का नुकसान होता है। कई बार कमाने वाला इकलौता सदस्य चला जाता है। कई बार बच्चे अनाथ हो जाते हैं। और राजस्थान जैसे बड़े राज्य में, जहाँ लंबे हाईवे हैं और ट्रैफिक का दबाव बढ़ता जा रहा है, यह सवाल हर किसी से जुड़ा है।
जब हादसे के बाद घायल को समय पर इलाज न मिले, तो ट्रॉमा केयर की कमी जान ले लेती है। जब सड़क के डिज़ाइन में ख़ामी हो, तो एक ही मोड़ पर बार-बार हादसे होते हैं। और जब निगरानी करने वाली एजेंसी ही कमज़ोर हो, तो किसी की जवाबदेही तय नहीं हो पाती। ये बातें अलग-अलग नहीं हैं, ये सब एक ही कड़ी के हिस्से हैं।
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अब कौन से सवाल पूछे जाने चाहिए
इस रिपोर्ट के बाद कुछ सीधे सवाल बनते हैं, जिनके जवाब जनता को मिलने चाहिए:
- इतना पैसा खर्च क्यों नहीं हुआ, और कार्ययोजना के काम किस रुकावट की वजह से लागू नहीं हो पाए?
- बचा हुआ पैसा अब कहाँ और कब तक लगाया जाएगा? कोई समय-सीमा तय है या नहीं?
- जब मौतें घटने की जगह बढ़ी हैं, तो योजनाओं की निगरानी सही तरीके से हो रही है या नहीं?
- रोड सेफ्टी सेल के खाली पदों को भरने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है?
- जिन बड़ी सड़कों का सेफ्टी ऑडिट नहीं हुआ, उनका ऑडिट कब तक पूरा होगा?
- ट्रॉमा केयर और ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम जैसी जान बचाने वाली चीज़ें कब तक पूरी तरह चालू होंगी?
ये सवाल किसी पर इल्ज़ाम लगाने के लिए नहीं हैं। ये वही सवाल हैं जो हर जागरूक नागरिक को अपनी सरकार से पूछने चाहिए, क्योंकि यह पैसा आख़िर जनता के चालान और जुर्माने से ही जमा होता है।
आगे क्या
ऑडिट ने कई विभागों के बीच बेहतर तालमेल की सिफ़ारिश की है, और कहा है कि इन कमियों को जल्द दूर करना ज़रूरी है। राज्य सरकार ने तथ्यों को माना है, जो अच्छी बात है। लेकिन बात मान लेना काफ़ी नहीं होता। असली परीक्षा यह होगी कि अगले सालों में फंड का कितना हिस्सा सच में खर्च होता है, काम ज़मीन पर कितना दिखता है, और सबसे ज़रूरी, मौतों का आँकड़ा नीचे आता है या नहीं।
सड़क सुरक्षा का फंड तिजोरी में सजाने की चीज़ नहीं है। वह तभी काम का है जब उससे बनी सड़कें सुरक्षित हों, घायल को समय पर इलाज मिले और किसी परिवार को अपनों को खोना न पड़े। जब तक यह नहीं होता, तब तक “सड़क सुरक्षा फंड” सिर्फ़ एक नाम बनकर रह जाएगा।
