Rajasthan Driving Licence: बिना टेस्ट ट्रैक के 2.36 लाख लाइसेंस जारी, CAG रिपोर्ट 2026
Rajasthan Driving Licence: आपने या आपके घर के किसी सदस्य ने कभी न कभी ड्राइविंग लाइसेंस ज़रूर बनवाया होगा। याद कीजिए, उस दिन आपसे गाड़ी चलवाकर देखी गई थी या नहीं। अब सोचिए कि अगर जिस दफ़्तर से लाइसेंस मिल रहा है, वहाँ टेस्ट लेने के लिए ट्रैक ही न हो, तो टेस्ट कैसे होता होगा?
CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की 2026 की रिपोर्ट में राजस्थान के driving licence सिस्टम पर यही सवाल उठा है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य के 44 दफ़्तरों ने बिना किसी टेस्टिंग ट्रैक के लाखों लाइसेंस जारी कर दिए। यह रिपोर्ट 21 अगस्त 2026 को आई थी, लेकिन इसके कई हिस्से अब भी आम लोगों तक नहीं पहुँचे हैं। इस लेख में हम उसी हिस्से को आसान भाषा में समझेंगे।
CAG रिपोर्ट में असल में क्या मिला?
राजस्थान में CAG ने सड़क सुरक्षा व्यवस्था की परफॉर्मेंस ऑडिट की है। इसी ऑडिट में ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया भी जाँची गई।
रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में कुल 6.84 लाख लाइसेंस जारी किए गए, जिनमें से 2.36 लाख लाइसेंस उन 44 दफ़्तरों से जारी हुए जहाँ कोई टेस्टिंग ट्रैक था ही नहीं। हिसाब लगाएँ तो यह करीब 34 से 35 प्रतिशत है, यानी लगभग हर तीन में से एक लाइसेंस।
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बिना ट्रैक वाले दफ़्तर छोटे या कम काम वाले नहीं थे। रिपोर्ट कहती है कि इन्हीं दफ़्तरों ने सबसे ज़्यादा लाइसेंस जारी किए। यानी जहाँ ट्रैफिक और आवेदन ज़्यादा थे, वहीं ट्रैक की सुविधा सबसे कम थी।
ड्राइविंग टेस्ट क्यों ज़रूरी है?
मोटर वाहन अधिनियम 1988 के तहत लाइसेंस जारी करने के लिए आवेदक की गाड़ी चलाने की क्षमता जाँचना ज़रूरी है। यह जाँच कोई औपचारिकता नहीं है। इसका मकसद यह तय करना है कि जिस इंसान को सड़क पर गाड़ी चलाने की इजाज़त मिल रही है, वह सच में सुरक्षित तरीके से गाड़ी चला सकता है या नहीं।
CAG ने भी अपनी रिपोर्ट में यही बात दोहराई है कि लाइसेंस जारी करने से पहले होने वाले टेस्ट की गुणवत्ता सड़क सुरक्षा के लिए बहुत अहम है, क्योंकि यही अधिनियम की माँग है। अगर टेस्ट ही सही तरीके से न हो, तो लाइसेंस बस एक कागज़ बनकर रह जाता है।
39 करोड़ रुपये, फिर भी अधूरा काम
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल पैसे से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार RTO और DTO दफ़्तरों में ऑटोमेटेड ड्राइविंग ट्रैक बनाने के लिए 39 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।
ऑटोमेटेड ट्रैक आम तौर पर ऐसे ट्रैक होते हैं जहाँ सेंसर और कैमरों की मदद से यह जाँचा जाता है कि उम्मीदवार ने गाड़ी कितनी सही तरह से चलाई। इसमें किसी अधिकारी की मर्ज़ी या पहचान का दख़ल कम होने की उम्मीद रहती है। इसीलिए इसे पारदर्शी टेस्ट की तरफ़ बड़ा कदम माना जाता है।
लेकिन CAG ने पाया कि इन ट्रैकों को बनाने में प्रगति संतोषजनक नहीं रही। पैसा तय हुआ, योजना बनी, पर बड़ी संख्या में दफ़्तरों में ट्रैक तैयार नहीं हो सके।
रिपोर्ट में एक और अहम बात दर्ज है। जिन दफ़्तरों में ऑटोमेटेड ट्रैक है और जिनमें नहीं है, उनमें ड्राइविंग टेस्ट में फेल होने की दर में बड़ा अंतर पाया गया। CAG का कहना है कि यह अंतर इस बात का संकेत है कि ट्रैक जैसी सही सुविधा के बिना टेस्ट की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यानी सवाल सिर्फ़ ट्रैक होने या न होने का नहीं है, यह भी है कि टेस्ट कितना सख़्त और सही हो रहा है।
ड्राइवर की ग़लती और 79 प्रतिशत का आँकड़ा
अब सवाल उठता है कि यह सब आम आदमी के लिए इतना ज़रूरी क्यों है। इसका जवाब रिपोर्ट के एक और आँकड़े में है। CAG के अनुसार सड़क हादसों में होने वाली मौतों में से 79 प्रतिशत के पीछे ड्राइवर की ग़लती होती है।
यानी हादसों की सबसे बड़ी वजह सड़क का गड्ढा या मौसम नहीं, गाड़ी चलाने वाले की चूक है। ऐसे में जिस प्रक्रिया से ड्राइवर तैयार हो रहे हैं, यानी लाइसेंस टेस्ट, वही सबसे पहली सुरक्षा दीवार होनी चाहिए। अगर वह दीवार कमज़ोर है, तो उसका असर पूरे सिस्टम पर पड़ता है।
राजस्थान के संदर्भ में यह बात और गंभीर इसलिए हो जाती है कि रिपोर्ट के आँकड़े बताते हैं कि राज्य में सड़क हादसों में होने वाली मौतें घटने की जगह बढ़ी हैं। 2015 में राज्य में 10,510 लोगों की जान गई थी और 2018-2020 की कार्ययोजना का लक्ष्य इसमें 50 प्रतिशत की कमी लाना था। लेकिन आँकड़ा घटने की जगह 2024 में 11,790 तक पहुँच गया।
ट्रैक ही अकेली कमी नहीं है
रिपोर्ट सिर्फ़ ट्रैक की बात पर नहीं रुकती। इसमें लाइसेंस और ट्रैफिक व्यवस्था से जुड़ी कई और कमज़ोरियाँ दर्ज हैं।
स्टाफ की कमी: परिवहन विभाग में मोटर वाहन निरीक्षकों (MVI) और सहायक निरीक्षकों (MVSI) के पदों में कमी 3.29 प्रतिशत से लेकर 92.62 प्रतिशत तक पाई गई। उड़न दस्तों में भी 8.63 से 21.40 प्रतिशत तक की कमी रही। जिन दफ़्तरों में इंस्पेक्टर ही कम हों, वहाँ टेस्ट और वाहन जाँच दोनों पर असर पड़ना स्वाभाविक है।
निगरानी में कमी: रिपोर्ट कहती है कि खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाने, जैसे गलत दिशा में चलने, पर कार्रवाई बहुत कम हुई। पुलिस विभाग ने 2018 में ANPR (ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रीडिंग) कैमरे लगाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन सितंबर 2025 तक इसमें ख़ास प्रगति नहीं हुई थी।
सड़क सुरक्षा फंड: अप्रैल 2017 में फंड बनने के बाद 2024-25 तक उसमें 716.37 करोड़ रुपये उपलब्ध थे, जिनमें से केवल 343.36 करोड़ रुपये खर्च हुए। यानी पैसा मौजूद था, पर उसका बड़ा हिस्सा काम में नहीं लगा।
इन सबको जोड़कर देखें तो तस्वीर यह बनती है कि लाइसेंस, जाँच और कार्रवाई, तीनों चरणों में कमियाँ दर्ज हुई हैं।
आम आदमी पर इसका क्या असर पड़ता है?
मान लीजिए आप सड़क पर अपनी गाड़ी लेकर निकले हैं। आपके सामने जो गाड़ी चला रहा है, उसके पास लाइसेंस है, लेकिन उसने गाड़ी चलाकर टेस्ट दिया ही नहीं। आपको यह कभी पता नहीं चलेगा, लेकिन उसकी गाड़ी चलाने की क्षमता का असर आपकी सुरक्षा पर पड़ सकता है।
यह बात किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाने की नहीं है। सवाल सिस्टम का है: जब टेस्ट की सुविधा ही नहीं होगी, तो अच्छे और कमज़ोर ड्राइवर में फ़र्क़ कैसे होगा?
साथ ही यह भी सच है कि इसका असर ईमानदारी से टेस्ट देने वालों पर भी पड़ता है। जिनके पास हुनर है, उनके लिए भी लाइसेंस की विश्वसनीयता तब कम हो जाती है, जब यह साफ़ न हो कि टेस्ट कैसे लिया गया।
अब सवाल जो पूछे जाने चाहिए
इस रिपोर्ट के बाद कुछ सीधे सवाल बनते हैं, जिनके जवाब परिवहन विभाग से माँगे जाने चाहिए:
- जिन 44 दफ़्तरों में टेस्टिंग ट्रैक नहीं था, वहाँ उम्मीदवारों का ड्राइविंग टेस्ट किस तरह लिया गया?
- 39 करोड़ रुपये के आवंटन के बाद भी ऑटोमेटेड ट्रैक समय पर क्यों नहीं बन पाए?
- जिन दफ़्तरों में ट्रैक नहीं हैं, वहाँ ट्रैक कब तक चालू होंगे, और इसकी कोई समय-सीमा तय है या नहीं?
- ट्रैक वाले और बिना ट्रैक वाले दफ़्तरों में फेल होने की दर का अंतर विभाग कैसे समझाता है?
- मोटर वाहन निरीक्षकों के खाली पद कब तक भरे जाएँगे?
इस लेख में परिवहन विभाग का पक्ष शामिल नहीं है, क्योंकि रिपोर्ट के आधार पर विभाग का कोई ताज़ा बयान उपलब्ध नहीं है। जैसे ही जवाब सामने आएगा, उसे जोड़ा जाएगा।
CAG ने क्या सुझाया है?
रिपोर्ट सिर्फ़ कमियाँ नहीं गिनाती, सुझाव भी देती है। CAG ने सिफ़ारिश की है कि लाइसेंस जारी करने वाले सभी दफ़्तरों में ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट ट्रैक चालू किए जाएँ, ताकि टेस्ट पारदर्शी बन सके। साथ ही रिपोर्ट ने मोटर वाहन निरीक्षकों और ट्रैफिक पुलिस की कमी दूर करने, ANPR कैमरे और स्पीड डिटेक्शन व्यवस्था लगाने और हादसों के आँकड़ों को सही तरीके से दर्ज करने जैसी बातों पर भी ज़ोर दिया है।
ड्राइविंग लाइसेंस सिर्फ़ एक पहचान पत्र या कार्ड नहीं है। यह इस बात का भरोसा है कि सड़क पर गाड़ी चलाने वाला इंसान बुनियादी तौर पर तैयार है। CAG की रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान में इस भरोसे की नींव में कई दरारें हैं: ट्रैक नहीं हैं, पैसा अटका है, स्टाफ कम है और निगरानी कमज़ोर है।
सवाल अब यह है कि क्या इन सिफ़ारिशों पर तय समय में कदम उठाए जाएँगे। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक यह देखना ज़रूरी है कि हमारे शहर के RTO में टेस्ट कैसे होता है। अगर आप या आपके जानने वाले ने हाल ही में लाइसेंस बनवाया है और आपका अनुभव अलग रहा है, तो अपनी बात ज़रूर साझा करें। आम लोगों का अनुभव इस पूरी बहस को ज़्यादा सच्चा बनाता है।
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