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भारत में Civic Sense बिल्कुल ना के बराबर_ स्कूलों में भी Civic Sense पढ़ाना जरूरी

भारत में Civic Sense बिल्कुल ना के बराबर: स्कूलों में भी Civic Sense पढ़ाना जरूरी

Hindi News, October 6, 2025October 6, 2025

सिविक सेंस (Civic Sense) का मतलब है समाज और सार्वजनिक स्थानों के प्रति जिम्मेदारी निभाना, नियमों का पालन करना और दूसरों की सुविधा का ख्याल रखना। सरल भाषा में कहें तो सिविक सेंस ही हमें एक अच्छे नागरिक के रूप में पहचान दिलाता है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में सिविक सेंस की स्थिति बेहद कमजोर है। ऐसा लगता है मानो हमारे समाज में इसका अस्तित्व ही लगभग ना के बराबर रह गया हो।

देश में एक तरफ जहाँ सरकार ने तो देश का बेडा गर्ग कर ही रखा है, वहीं एक देश के नागरिक यानि हमने भी इसमें कुछ कमी नहीं छोड़ी है। आज हम यहाँ पढ़ेंगे कि देश में सिविक सेंस की कितनी कमी है और इसका क्या असर है।

भारत में सिविक सेंस की कमी क्यों दिखती है?

भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे देश में सिविक सेंस की कमी गहराई से देखने को मिलती है। इसके कई प्रमुख कारण हैं:

  1. शिक्षा और जागरूकता की कमी – स्कूल और कॉलेजों में नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक अनुशासन पर बहुत कम जोर दिया जाता है। बच्चों को गणित और विज्ञान तो पढ़ाया जाता है लेकिन साफ-सफाई, कतार में लगना, ट्रैफिक नियम मानना जैसी बातें अनदेखी कर दी जाती हैं।
  2. अनुशासन का अभाव – लोग अक्सर सोचते हैं कि “सार्वजनिक जगह मेरी नहीं है”, इसलिए वहां गंदगी फैलाना या नियम तोड़ना उनकी नजर में कोई बड़ी बात नहीं होती।
  3. कानून का सख्ती से पालन न होना – कई बार नियम तोड़ने वालों पर जुर्माना नहीं लगता, जिससे वे बार-बार वही गलती दोहराते हैं।
  4. सामाजिक उदासीनता – लोग दूसरों की सुविधा के बारे में कम और अपनी सुविधा के बारे में ज़्यादा सोचते हैं।

सिविक सेंस की कमी से होने वाले नुकसान

सिविक सेंस की कमी सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं बल्कि यह आर्थिक और स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती भी है।

  • सफाई और स्वास्थ्य पर असर – सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलने से डेंगू, मलेरिया और कई बीमारियाँ बढ़ती हैं।
  • ट्रैफिक जाम और हादसे – नियम न मानने के कारण रोज़ाना सड़क हादसे होते हैं और लोगों का समय ट्रैफिक में बर्बाद होता है।
  • देश की छवि खराब होना – विदेशी पर्यटक जब भारत आते हैं और यहां की अव्यवस्था और गंदगी देखते हैं तो उनकी नजर में देश की छवि खराब होती है।
  • आर्थिक नुकसान – सरकार को सफाई और अव्यवस्था सुधारने पर करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जो असल में विकास कार्यों पर लगने चाहिए।
  • समाज में अविश्वास – जब लोग नियम नहीं मानते तो समाज में अव्यवस्था और अविश्वास बढ़ जाता है।

हमारे रोज़मर्रा के जीवन में टूटता Civic Sense

दोस्तों आप देख सकते हैं कि एक दिन की सामान्य दिनचर्या में हमें कितने ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं, जहाँ लोग सिविक सेंस का पालन नहीं करते, जैसे:

  • सड़क पर पान खाकर थूकना।
  • कचरा डस्टबिन की जगह सड़क पर फेंकना।
  • कहीं भी खुले में पेशाब करना।
  • ट्रैफिक सिग्नल तोड़ना।
  • गाड़ी चलाते हुए हॉर्न का अनावश्यक इस्तेमाल।
  • कतार में घुस जाना।
  • सार्वजनिक संपत्ति जैसे दीवारों और बेंच पर लिखना या गंदा करना।

स्कूलों में सिविक सेंस पढ़ाना क्यों जरूरी है?

अगर भारत में सिविक सेंस को मजबूत करना है तो इसकी शुरुआत स्कूलों से करनी होगी। बच्चों को छोटी उम्र से ही यह सिखाना जरूरी है कि:

  • सड़क पर कचरा नहीं फेंकना चाहिए।
  • कतार में लगना और नियम मानना जरूरी है।
  • सार्वजनिक जगहों को अपनी जिम्मेदारी समझना चाहिए।
  • ट्रैफिक सिग्नल और कानून का पालन हर नागरिक का कर्तव्य है।

अगर बच्चों में ये आदतें बचपन से ही डाली जाएँगी, तो वे बड़े होकर जिम्मेदार नागरिक बनेंगे।

समाधान और आगे का रास्ता

  • सिविक एजुकेशन को पाठ्यक्रम में शामिल करना।
  • जागरूकता अभियान चलाना ताकि लोग समझें कि सिविक सेंस क्यों जरूरी है।
  • कड़े कानून और जुर्माना लगाना ताकि लोग नियम तोड़ने से डरें।
  • हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभाए, तभी समाज बदलेगा।

Note –

भारत में सिविक सेंस की कमी एक गंभीर चुनौती है। इसे दूर करने के लिए हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जब तक लोग नियमों और अनुशासन को अपनाकर अपनी आदतें नहीं बदलेंगे, तब तक समाज में गंदगी, अव्यवस्था और ट्रैफिक समस्याएँ बनी रहेंगी। बदलाव की शुरुआत स्कूलों से और छोटे-छोटे कदमों से करनी होगी, तभी देश की छवि और विकास दोनों बेहतर हो पाएँगे।

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