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Election Silence in Andhra: चुनाव से पहले नेताओं की प्रतिमाओं और बैनरों पर क्यों पड़ जाता है पर्दा

Election Silence in Andhra: चुनाव का मौसम आते ही शहरों की शक्ल बदल जाती है। जिन चौराहों पर कल तक नेताओं के विशाल बैनर और कटआउट दिखते थे, वहाँ अचानक कपड़े और प्लास्टिक की चादरें नज़र आने लगती हैं। नेताओं की प्रतिमाएँ भी पर्दे के पीछे चली जाती हैं। आंध्र प्रदेश में यह नज़ारा देखकर बहुत से लोग पूछते हैं कि आख़िर ऐसा क्यों किया जाता है। क्या यह सिर्फ़ यहीं होता है, और इसके पीछे कौन-सा नियम है? इस लेख में हम इन्हीं सवालों के जवाब आसान भाषा में, चुनाव आयोग के निर्देशों और असली उदाहरणों के साथ समझेंगे।

आदर्श आचार संहिता क्या है और कब लागू होती है

प्रतिमाओं और बैनरों पर पर्दा डालने के पीछे सबसे बड़ी वजह आदर्श आचार संहिता है, जिसे अंग्रेज़ी में मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट (MCC) कहा जाता है। यह चुनाव आयोग के उन दिशा-निर्देशों का समूह है, जिनके दायरे में राजनीतिक दल, उम्मीदवार और चुनाव के दौरान काम करने वाली सरकारें आती हैं। इसका सीधा मक़सद है कि चुनाव में सभी दलों को बराबर मौक़ा मिले और सत्ता में बैठी पार्टी सरकारी साधनों का फ़ायदा न उठा सके।

आचार संहिता उसी दिन से लागू मानी जाती है जब चुनाव कार्यक्रम का ऐलान होता है, और नतीजे आने तक चलती है। इसकी शुरुआत 1960 के केरल विधानसभा चुनाव के समय की मानी जाती है। आंध्र प्रदेश का ताज़ा उदाहरण 2024 का है। चुनाव आयोग ने 16 मार्च 2024 को लोकसभा चुनाव और आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा व सिक्किम की विधानसभाओं के कार्यक्रम का ऐलान किया, और उसी क्षण से आचार संहिता लागू हो गई। आंध्र में मतदान 13 मई को हुआ और मतगणना 4 जून को। नतीजे घोषित होने के बाद आयोग ने संहिता के ख़त्म होने की जानकारी दी।

यहाँ एक बात समझना ज़रूरी है। रिपोर्टों के मुताबिक़ प्रतिमाओं और बैनरों को ढकने का काम ज़्यादातर आचार संहिता के दौर में ही होता है, सिर्फ़ मतदान के आख़िरी दिन नहीं। यानी जो पर्दे आपको मतदान के आसपास दिखते हैं, वे कई जगह पहले ही लगाए जा चुके होते हैं।

प्रतिमाओं और बैनरों पर पर्दा क्यों डाला जाता है

चिंता यह है कि सार्वजनिक जगह पर रोज़ दिखने वाला किसी नेता का चेहरा या किसी पार्टी का निशान अपने आप में एक तरह का प्रचार बन जाता है। सड़क पर चलता आम आदमी भले किसी रैली में न गया हो, पर बार-बार दिखने वाली तस्वीर उसके मन पर असर डाल सकती है। इसीलिए चुनाव आयोग ऐसी चीज़ों को हटाने या ढकने को कहता है, ख़ासकर तब जब वे सरकारी पैसे से बनी हों या सरकारी जगह पर लगी हों।

2012 में उत्तर प्रदेश के मामले में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. क़ुरैशी ने कहा था कि ऐसी चीज़ें मतदाताओं के मन में उलझन पैदा करती हैं और सभी दलों को बराबरी का मैदान देने के लिए उन्हें ढकना ज़रूरी है। यही तर्क आज भी इस व्यवस्था की बुनियाद है।

सरकारी इमारतों पर भी यही सोच लागू होती है। मार्च 2024 में आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिव ने अधिकारियों से कहा कि वे आचार संहिता को बिना किसी चूक के लागू करें, और यह भी सुनिश्चित करें कि सरकारी भवनों की दीवारों पर मुख्यमंत्री या किसी दूसरे राजनीतिक नेता की तस्वीर न रहे।

पोस्टर, बैनर और होर्डिंग हटाने की समय-सीमा

पोस्टर और बैनर के लिए चुनाव आयोग ने साफ़ समय-सीमा तय कर रखी है। चुनाव की घोषणा के बाद सरकारी संपत्ति पर लगे दीवार-लेखन, पोस्टर, कटआउट, होर्डिंग और झंडे 24 घंटे के भीतर हटाने होते हैं। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और बिजली-टेलीफ़ोन के खंभों जैसी सार्वजनिक जगहों पर यह काम 48 घंटे में पूरा होना चाहिए। निजी संपत्ति पर बिना अनुमति लगे राजनीतिक विज्ञापनों के लिए 72 घंटे की सीमा है, बशर्ते स्थानीय क़ानून और अदालत के निर्देश इसमें आड़े न आएँ।

यह कार्रवाई सिर्फ़ काग़ज़ पर नहीं होती। दिल्ली नगर निगम ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले 5.20 लाख से ज़्यादा राजनीतिक विज्ञापन हटाए, जिनमें दो लाख 57 हज़ार से अधिक होर्डिंग थे। नोएडा वाले गौतम बुद्ध नगर ज़िले में 72 घंटे के भीतर 11,682 पोस्टर, बैनर और दीवार-लेखन हटाए गए।

इसके पीछे संपत्ति को बदरंग करने से रोकने वाला क़ानून भी काम करता है, जिसे डिफ़ेसमेंट ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट कहा जाता है। चुनाव आयोग इसी के तहत सरकारी परिसरों में दीवार-लेखन, पोस्टर चिपकाने और कटआउट-होर्डिंग लगाने पर रोक लगाता है।

उत्तर प्रदेश 2012: जब हाथी और मूर्तियाँ ढकी गईं

प्रतिमाएँ ढकने का सबसे चर्चित उदाहरण उत्तर प्रदेश का 2012 का विधानसभा चुनाव है। 7 जनवरी 2012 को चुनाव आयोग ने आदेश दिया कि मुख्यमंत्री मायावती की प्रतिमाएँ और उनकी पार्टी बसपा का चुनाव चिह्न हाथी चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक ढके रहें। रिपोर्टों के अनुसार लखनऊ और नोएडा के पार्कों में ऐसी तीन सौ से ज़्यादा प्रतिमाएँ थीं। आयोग का कहना था कि ये प्रतिमाएँ सरकारी पैसे से बनी हैं और इनका खुला रहना आचार संहिता के ख़िलाफ़ है।

उस वक़्त इस फ़ैसले पर ख़ूब बहस हुई। मायावती ने इसे एकतरफ़ा बताया और पूछा कि किसी और दल के नेताओं की मूर्तियाँ क्यों नहीं ढकी गईं। आयोग ने साफ़ किया कि उसका आदेश सिर्फ़ उन जीवित नेताओं की प्रतिमाओं पर है जो अब भी राजनीति में सक्रिय हैं, और आदेश पर दोबारा विचार करने से इनकार कर दिया। कुछ लोगों ने कहा कि ढकी हुई प्रतिमा तो और ज़्यादा ध्यान खींचती है। तब के मुख्य चुनाव आयुक्त का जवाब था कि ख़र्च कोई पैमाना नहीं है, सिद्धांत लागू होना चाहिए।

इससे पता चलता है कि यह नियम न नया है, न किसी एक राज्य का। क़ुरैशी ने उस समय याद दिलाया था कि 2004 के आम चुनाव से पहले स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के होर्डिंगों पर लगी प्रधानमंत्री की तस्वीरें भी ढकी गई थीं।

आंध्र प्रदेश और पड़ोसी तेलंगाना में क्या दिखा

आंध्र प्रदेश में भी वही ढाँचा काम करता है, क्योंकि आचार संहिता चुनाव आयोग की है और पूरे देश के लिए एक है। ज़िला निर्वाचन अधिकारी, नगरपालिकाएँ और पंचायतें अपने-अपने इलाक़े में पोस्टर हटाने और प्रतिमाएँ ढकने का काम संभालती हैं। इस काम का पैमाना कितना बड़ा होता है, इसका अंदाज़ा पड़ोसी तेलंगाना के आँकड़ों से लगता है।

2023 के विधानसभा चुनाव में हैदराबाद के ज़िला निर्वाचन अधिकारी ने सार्वजनिक और निजी जगहों पर लगी लगभग 97,000 राजनीतिक नेताओं की प्रतिमाएँ ढकने का आदेश दिया था। आचार संहिता 9 अक्टूबर से लागू थी, और रिपोर्ट के मुताबिक़ 26 अक्टूबर के आसपास भी एक ही दिन में सार्वजनिक जगहों पर 860 और निजी संपत्तियों पर 143 प्रतिमाएँ ढकी गईं। उसी रिपोर्ट में बताया गया कि अब तक 71,799 दीवार-लेखन मिटाए जा चुके थे और 23,492 बैनर उतारे जा चुके थे। हाल ही में जुबली हिल्स उपचुनाव से पहले भी वहाँ अधिकारियों ने क्षेत्र की प्रमुख राजनीतिक प्रतिमाएँ ढकी थीं।

मतदान से 48 घंटे पहले की “साइलेंस पीरियड”

मतदान ख़त्म होने के निर्धारित समय से पहले के 48 घंटे “साइलेंस पीरियड” कहलाते हैं। यह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 पर आधारित है और राज्य व लोकसभा, दोनों चुनावों पर लागू होता है। इन घंटों में चुनाव से जुड़ी सार्वजनिक सभाएँ, जुलूस और ऐसे कार्यक्रम नहीं हो सकते। टीवी या रेडियो पर चुनाव को प्रभावित करने वाली सामग्री दिखाना मना है, और प्रेस कॉन्फ़्रेंस या इंटरव्यू में भी चुनाव से जुड़ी बातें नहीं की जा सकतीं।

लाउडस्पीकर पर रोक रहती है और शराब की बिक्री बंद रहती है, यानी ड्राई डे। जो पार्टी कार्यकर्ता उस चुनाव क्षेत्र के बाहर के हैं, उन्हें भी क्षेत्र में नहीं रहना चाहिए। उल्लंघन करने पर दो साल तक की जेल या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। मक़सद वही है: मतदाता को आख़िरी दो दिन बिना किसी शोर के सोचने का मौक़ा मिले।

क्या सब कुछ मतदान के आख़िरी दिन ही ढका जाता है

आम धारणा बन जाती है कि आख़िरी दिन ही सब पर पर्दा पड़ता है, पर रिपोर्टें कुछ और बताती हैं। तेलंगाना में प्रतिमाएँ ढकने का काम आचार संहिता लागू होने के कई दिन बाद तक चलता रहा। आख़िरी दो दिनों में असल बदलाव यह होता है कि प्रचार से जुड़ी हर गतिविधि पर क़ानूनी रोक लग जाती है और प्रशासन की निगरानी सबसे सख़्त होती है। इसलिए उस वक़्त आप जो पर्दे और ख़ाली दीवारें देखते हैं, वे पूरे दौर की कार्रवाई का नतीजा हो सकते हैं।

मतदान के आख़िरी दिन के लिए प्रतिमाएँ ढकने का कोई अलग, ख़ास नियम हमें पुष्ट स्रोतों में नहीं मिला। किसी ख़ास इलाक़े की सटीक स्थिति जाननी हो तो ज़िला निर्वाचन अधिकारी का आदेश देखना सबसे भरोसेमंद रास्ता है।

इस व्यवस्था पर उठते सवाल

इस व्यवस्था पर सवाल भी उठे हैं। पहला सवाल ख़र्च का है, क्योंकि हज़ारों प्रतिमाएँ ढकने में मज़दूरी और सामान लगता है, और 2012 में इसकी लागत करोड़ों रुपये होने का अनुमान लगाया गया था। दूसरा सवाल यह है कि क्या ढकी हुई प्रतिमा उल्टा ज़्यादा ध्यान नहीं खींचती। तीसरा, कुछ दलों का कहना रहा है कि फ़ैसले सबके लिए एक जैसे नहीं होते। 2012 में बसपा ने यही आरोप लगाया था।

दूसरी तरफ़ आयोग का रुख़ यह रहा है कि बराबरी का मैदान बनाए रखना उसकी ज़िम्मेदारी है और ख़र्च उसके आड़े नहीं आ सकता। मतदाता के लिए सीधी बात यह है कि चुनाव के दौरान सड़क पर दिखने वाले पर्दे किसी की नाराज़गी का नहीं, एक तय नियम का नतीजा हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या प्रतिमाएँ ढकने का नियम सिर्फ़ आंध्र प्रदेश में है?

नहीं। आचार संहिता पूरे देश में लागू होती है। उत्तर प्रदेश में 2012 और तेलंगाना में 2023 में बड़े पैमाने पर प्रतिमाएँ ढकी गई थीं।

किन नेताओं की प्रतिमाएँ ढकी जाती हैं?

2012 में आयोग ने स्पष्ट किया था कि उसका आदेश जीवित और राजनीति में सक्रिय नेताओं की प्रतिमाओं पर है। हैदराबाद में राजनीतिक नेताओं की प्रतिमाएँ ढकी गईं। हर ज़िले की सूची अलग हो सकती है, इसलिए पक्का जानने के लिए स्थानीय निर्वाचन अधिकारी से पूछना ठीक रहेगा।

पोस्टर और बैनर हटाने की समय-सीमा क्या है?

चुनाव की घोषणा के बाद सरकारी संपत्ति पर 24 घंटे, सार्वजनिक जगहों पर 48 घंटे और निजी संपत्ति पर बिना अनुमति लगे विज्ञापनों के लिए 72 घंटे।

साइलेंस पीरियड कब शुरू होता है?

मतदान समाप्ति के निर्धारित समय से 48 घंटे पहले, और यह मतदान ख़त्म होने के समय तक चलता है।

साइलेंस पीरियड में प्रचार करने पर क्या सज़ा है?

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 126 के तहत दो साल तक की जेल या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।

ढकी हुई प्रतिमाओं से पर्दा कब हटता है?

2012 के उत्तर प्रदेश मामले में आदेश चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक का था। आम तौर पर आचार संहिता नतीजे आने के बाद हटती है, और उसी के साथ ये पाबंदियाँ भी ख़त्म होती हैं

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