Real Feminism: असली फेमिनिज्म क्या होता है, असली फेमिनिस्ट कौन कहलाता है
असली फेमिनिज्म क्या होता है : असली फेमिनिज्म का मतलब बहुत सीधा है, महिला हो या पुरुष, हर इंसान को बराबर अधिकार, बराबर सम्मान और बराबर मौके मिलें, और किसी के साथ सिर्फ इसलिए भेदभाव न हो कि वह महिला है। जो इंसान इस सोच पर यकीन करता है और इसे अपनी बातों और अपने व्यवहार में उतारता है, उसे ही असली फेमिनिस्ट कहा जा सकता है। चाहे वह महिला हो या पुरुष।
आजकल सोशल मीडिया पर “असली फेमिनिस्ट” शब्द अक्सर ताने की तरह इस्तेमाल होता है। इसलिए इसे थोड़ा आराम से खोलकर समझना ज़रूरी है।
असली फेमिनिज्म क्या होता है
फेमिनिज्म की शुरुआत उस दौर में हुई जब महिलाओं को वोट देने तक का हक नहीं था। धीरे-धीरे लड़ाई पढ़ाई के हक, नौकरी के हक और संपत्ति के हक तक पहुँची। आज यह बात बराबर वेतन, काम की जगह पर सुरक्षा, घर में फैसलों की बराबरी और हिंसा से बचाव तक आ चुकी है।
सीधी भाषा में कहें तो Real Feminism वह सोच है जो कहती है कि एक लड़की को भी वही मौके मिलने चाहिए जो एक लड़के को मिलते हैं। वह क्या पढ़ेगी, कहाँ काम करेगी, कब और किससे शादी करेगी, यह फैसला उसका अपना होना चाहिए।
भारत में असली फेमिनिज्म की शुरुआत कैसे हुई
अगर असली फेमिनिज्म को किताबों से नहीं, ज़मीन से समझना हो, तो सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले की कहानी सबसे अच्छी मिसाल है। जनवरी 1848 में इस जोड़े ने पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों का स्कूल शुरू किया, उस दौर में जब लड़कियों का पढ़ना समाज को मंज़ूर ही नहीं था। ज्योतिबा ने पहले अपनी पत्नी सावित्रीबाई को पढ़ाया, फिर उन्हें टीचर की ट्रेनिंग दिलवाई, और सावित्रीबाई उसी स्कूल की पहली शिक्षिका बनीं। उन्हें आज भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में गिना जाता है।
विरोध भी कम नहीं था। रूढ़िवादी लोगों को लड़कियों की पढ़ाई बिल्कुल पसंद नहीं आई, और इस जोड़े को अपने घर और समाज दोनों की नाराज़गी झेलनी पड़ी। फिर भी 1851 के अंत तक पुणे में उनके तीन स्कूल चलने लगे थे, जिनमें करीब डेढ़ सौ लड़कियाँ पढ़ रही थीं। इस काम में फातिमा शेख़ जैसी साथियों ने भी उनका साथ दिया।
इसी तरह राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाई, जिस पर 1829 में कानूनी रोक लगी। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने विधवाओं की दोबारा शादी के लिए लड़ाई लड़ी, और 1856 में इसका कानून बना। ये सब पुरुष थे। यानी भारत में फेमिनिज्म की शुरुआत में पुरुषों की भी बड़ी भूमिका रही है, और असली फेमिनिस्ट कौन कहलाता है, इसका जवाब इन मिसालों में साफ दिखता है: वह जो बराबरी के लिए अपना आराम और अपनी इज़्ज़त की परवाह छोड़कर खड़ा हो जाए।
फेमिनिज्म पुरुषों के खिलाफ नहीं है
बहुत से लोग मान लेते हैं कि फेमिनिज्म का मतलब पुरुषों से बदला लेना है। यह सबसे बड़ी गलतफहमी है। फेमिनिज्म पुरुषों के खिलाफ नहीं, उस सोच के खिलाफ है जिसमें एक लिंग को दूसरे से ऊपर माना जाता है।
इस सोच का बोझ पुरुषों पर भी पड़ता है। लड़कों को बचपन से सिखाया जाता है कि मर्द रोते नहीं, घर चलाने की सारी कमाई तुम्हारी ज़िम्मेदारी है, और अपनी तकलीफ किसी को मत बताओ। जब समाज बराबरी की तरफ बढ़ता है, तो यह दबाव पुरुषों के लिए भी हल्का होता है।
असली फेमिनिस्ट कौन कहलाता है
असली फेमिनिस्ट की पहचान किसी नारे या किसी पोस्ट से नहीं, उसके व्यवहार से होती है। कुछ बातें जो ऐसे इंसान में आम तौर पर दिखती हैं:
- वह मानता है कि लिंग के आधार पर भेदभाव गलत है, चाहे वह घर में हो, दफ्तर में हो या समाज में।
- वह महिला की पसंद का सम्मान करता है। कोई महिला नौकरी करना चाहे या घर संभालना, फैसला उसका है, और दोनों में से कोई भी चुनाव छोटा नहीं है।
- वह बराबर काम के लिए बराबर मौके और बराबर वेतन की बात करता है।
- वह अपनी बात रखने के लिए किसी को नीचा नहीं दिखाता, चाहे सामने वाला पुरुष हो या महिला।
- वह घर के काम, बच्चों की परवरिश और फैसलों में बराबर हिस्सेदारी को सामान्य मानता है।
इसलिए असली फेमिनिस्ट कौन कहलाता है, इसका जवाब यही है कि जो बराबरी को सिर्फ बोलता नहीं, जीता भी है।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बराबरी कैसी दिखती है
फेमिनिज्म सिर्फ अदालतों और किताबों की चीज़ नहीं है, यह घर की रसोई से शुरू होता है। जिस घर में बेटे और बेटी दोनों को एक जैसी पढ़ाई का मौका मिलता है, वहाँ फेमिनिज्म ज़िंदा है। जिस घर में पति और पत्नी दोनों नौकरी करते हैं और घर का काम भी मिलकर बाँटते हैं, वहाँ भी। और जब दफ्तर में किसी महिला की बात सिर्फ इसलिए नहीं टाली जाती कि वह महिला है, तब भी।
इसका उल्टा भी उतना ही साफ है। अगर बेटे को बाहर पढ़ने भेजा जाए और बेटी से कहा जाए कि “ज़्यादा पढ़कर क्या करेगी”, तो यह भेदभाव है। अगर कोई महिला नौकरी के साथ घर और बच्चों की पूरी ज़िम्मेदारी अकेले उठा रही हो और उससे कहा जाए कि यह तो तुम्हारा ही काम है, तो यह भी बराबरी नहीं है।
यहाँ एक बात समझना ज़रूरी है। बराबरी का मतलब यह नहीं कि सबको एक ही रास्ते पर चलना पड़ेगा। कोई महिला डॉक्टर बनना चाहे, कोई घर संभालना चाहे, कोई दोनों करना चाहे, असली फेमिनिज्म हर फैसले का सम्मान करता है, बशर्ते वह फैसला उसका अपना हो और किसी दबाव में लिया हुआ न हो।
कानून और अदालतों में बराबरी की लड़ाई
फेमिनिज्म सिर्फ सोच नहीं है, यह कानून बदलने की लड़ाई भी है। इसके दो उदाहरण आज भी याद किए जाते हैं।
पहला है विशाखा केस। राजस्थान की भंवरी देवी सरकार के महिला विकास कार्यक्रम में साथिन के तौर पर काम करती थीं। 1992 में एक बाल विवाह रोकने की कोशिश के बाद उनके साथ गैंगरेप हुआ। इस घटना के बाद महिला संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, और 1997 में कोर्ट ने काम की जगह पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए विशाखा गाइडलाइंस जारी कीं। आगे चलकर इन्हीं के आधार पर 2013 में इस मुद्दे पर बाकायदा कानून बना।
दूसरा उदाहरण बेटियों के संपत्ति के हक का है। 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में बदलाव करके बेटियों को पिता की पैतृक संपत्ति में बेटों जैसा बराबर हक दिया गया। लेकिन सालों तक यह उलझन बनी रही कि जिन बेटियों के पिता 9 सितंबर 2005 से पहले गुज़र चुके थे, उनका क्या होगा। 11 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा केस में साफ कर दिया कि बेटी जन्म से ही बराबर की हकदार है, शादी के बाद भी उसका यह हक खत्म नहीं होता, और इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि पिता कब गुज़रे। इस बदलाव का सपना डॉ. आंबेडकर के हिंदू कोड बिल से भी जोड़ा जाता है।
ये दोनों बदलाव किसी नारे से नहीं, किसी महिला के अपने हक के लिए अदालत तक पहुँचने से आए।
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“असली” और “नकली” फेमिनिस्ट का झगड़ा क्यों होता है
फेमिनिज्म एक ही रास्ता नहीं है, इसकी कई धाराएँ हैं और सबका लक्ष्य एक है, बस रास्ते अलग हैं। लिबरल फेमिनिज्म मानता है कि कानून और नीतियाँ बदलकर बराबरी लाई जा सकती है। रैडिकल फेमिनिज्म कहता है कि जब तक समाज का पूरा ढाँचा नहीं बदलेगा, तब तक असली बराबरी नहीं आएगी। इंटरसेक्शनल फेमिनिज्म यह देखता है कि जाति, वर्ग, धर्म और गरीबी जैसी चीज़ें एक महिला की मुश्किलें और बढ़ा देती हैं।
हर धारा दूसरी को कभी-कभी “नकली” कह देती है, और इसी वजह से यह बहस इतनी उलझी दिखती है। कुछ मुद्दों पर तो फेमिनिस्ट खुद भी एकमत नहीं हैं, और इन पर खुली बहस चलती रहती है। पर बराबरी और भेदभाव के खिलाफ खड़े होने वाली बुनियादी बात पर सब सहमत हैं।
फेमिनिज्म को लेकर आम गलतफहमियाँ
- “फेमिनिज्म परिवार तोड़ता है।” ऐसा नहीं है। बराबरी वाला रिश्ता आम तौर पर ज़्यादा मज़बूत होता है, क्योंकि उसमें दोनों की बात सुनी जाती है।
- “घर संभालने वाली महिला फेमिनिस्ट नहीं हो सकती।” यह भी गलत है। फेमिनिज्म का मतलब यह नहीं कि हर महिला बाहर जाकर नौकरी ही करे। उसका मतलब यह है कि चुनने का हक उसके पास हो।
- “फेमिनिज्म का मतलब सिर्फ महिलाओं को ज़्यादा हक देना है।” नहीं, बात ज़्यादा हक की नहीं, बराबर हक की है।
- “सिर्फ महिलाएँ ही फेमिनिस्ट हो सकती हैं।” कोई भी इंसान जो बराबरी में यकीन रखता है और उसके लिए खड़ा होता है, वह फेमिनिस्ट हो सकता है।
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