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पूज्य संत श्री रामचंद्र डोंगरेजी महाराज

पूजनीय संत श्री रामचंद्र डोंगरेजी महाराज कौन थे, और आखिर क्यों इनको कलयुग का कर्ण कहा जाता है।

Laxmi Nautiyal, May 4, 2025May 4, 2025

श्री रामचंद्र डोंगरेजी महाराज : भारत की पुण्यभूमि पर समय-समय पर ऐसे अनेक संतों का जन्म हुआ है, जिन्होंने समाज में आध्यात्मिक चेतना जगाई, नैतिक मूल्यों की स्थापना की और मानव सेवा को ही ईश्वर सेवा का मार्ग बताया। ऐसे ही एक दिव्य संत थे पूजनीय श्री रामचंद्र डोंगरेजी महाराज, जिन्हें श्रद्धा भाव से “कलयुग का कर्ण” कहा जाता है। उनका जीवन करुणा, त्याग, सेवा और ज्ञान की मूर्ति था। उन्होंने न केवल धार्मिक शिक्षा दी, बल्कि अपने कर्मों से यह सिद्ध किया कि सच्चा संत वही है जो समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति तक अपनी करुणा और सेवा पहुँचाए।

प्रारंभिक जीवन

श्री डोंगरेजी महाराज जी का जन्म 15 फरवरी 1926 रोजी इंदौर महाराष्ट्र के एक धार्मिक परिवार में हुआ था। बाल्यकाल से ही वे अत्यंत सरल, शांत और अध्यात्म की ओर झुकाव रखने वाले थे। उनकी माता का नाम सीताबाई और पिता का नाम केशवदास डोंगरे था। उनकी माता-पिता धार्मिक विचारों वाले थे और उनके घर का वातावरण सदैव भजन-पूजन, कथा-वाचन और सत्संग से भरा रहता था। उन्होंने छोटी उम्र में ही वेद, उपनिषद, श्रीमद्भागवत, रामायण आदि ग्रंथों का अध्ययन कर लिया था।

कथा वाचक से संत की यात्रा

डोंगरेजी महाराज प्रारंभ में एक प्रखर भागवत कथा वाचक के रूप में प्रसिद्ध हुए। उनकी वाणी में अद्भुत आकर्षण था। वे जब श्रीमद्भागवत कथा करते, तो लगता जैसे स्वयं श्रीकृष्ण की लीला घटित हो रही हो। उन्होंने न केवल महाराष्ट्र, बल्कि उत्तर भारत, गुजरात, मध्य प्रदेश और अन्य कई राज्यों में भी भागवत कथाओं के माध्यम से हजारों लोगों को आध्यात्मिक जीवन की राह दिखाई।लेकिन डोंगरेजी महाराज केवल एक प्रवचनकर्ता नहीं थे — वे एक जीवंत आदर्श थे। उनका जीवन पूर्णतः निःस्वार्थ सेवा, प्रेम और करुणा से परिपूर्ण था। उन्होंने अपने प्रवचनों से अधिक अपने कर्मों से लोगों का

क्यों कहा गया “कलयुग का कर्ण”?

महाभारत के पात्र कर्ण को दानवीर के रूप में जाना जाता है। वह बिना किसी भेदभाव के, समय-असमय, किसी भी माँगने वाले को दान देने के लिए प्रसिद्ध था। ठीक उसी प्रकार डोंगरेजी महाराज ने भी अपने जीवन में अनेकों जरूरतमंदों की निःस्वार्थ सहायता की। वे गरीबों, असहायों, विधवाओं और रोगियों के लिए एक जीवनदायी शक्ति बन गए थे।उनके कथाओं से प्राप्त धन का एक-एक पैसा समाज सेवा में लग जाता था। उन्होंने कई विद्यालय, गौशालाएँ, धर्मशालाएँ और अस्पतालों की स्थापना की। उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की चिंता नहीं की, बल्कि समाज के कल्याण को ही अपना परम धर्म माना। यही कारण है कि उन्हें “कलियुग का कर्ण” कहा गया।

एक अनोखी घटना

जब महाराज ने एक चप्पल की जोड़ी से दिल जीत लिया कहा जाता है कि एक बार डोंगरेजी महाराज एक गांव में कथा करने पहुँचे। कथा के अंत में जब वे लौट रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा व्यक्ति नंगे पाँव धूप में चल रहा है। उन्होंने तुरंत अपनी चप्पल उतारी और उस वृद्ध को पहना दी। शिष्यों ने विरोध किया कि “महाराज, अब आप नंगे पाँव कैसे चलेंगे?”महाराज मुस्कुराकर बोले, “मैंने तो केवल चप्पल दी है, बदले में उसके चरणों की धूल मिली है — जो मेरे लिए सौभाग्य है।”यह घटना उनके हृदय की विशालता और सेवा भावना को दर्शाती है।

एक और प्रेरणादायक कथा

एक बार कथा के आयोजन से जो धन एकत्र हुआ था, उसे आयोजकों ने सुरक्षित रखने के लिए एक मंदिर निर्माण हेतु अलग कर दिया। जब डोंगरेजी महाराज को इस बात का पता चला, तो उन्होंने कहा, “मंदिर तो ईश्वर के नाम पर बनता है, परंतु भूखा मनुष्य, रोता बालक और विधवा माता — ये साक्षात नारायण हैं। पहले इनके मंदिरों की मरम्मत करो।”उनके आदेश से वह धन अनाथ बच्चों की शिक्षा, गरीबों की दवा और विधवाओं की सहायता में खर्च किया गया। यह उनका दृष्टिकोण था — सेवा को ही सबसे बड़ा धर्म मानना।

भावुक करने वाली कहानी

उनकी पत्नी आबू में रहती थीं। पत्नी की मृत्यु के पांचवें दिन उन्हें खबर लगी । बाद में वे अस्थियां लेकर गोदावरी में विसर्जित करने मुम्बई के सबसे बड़े धनाढ्य व्यक्ति रति भाई पटेल के साथ गये।नासिक में डोंगरेजी ने रतिभाई से कहा कि रति हमारे पास तो कुछ है ही नही, और इनका अस्थि विसर्जन करना है। कुछ तो लगेगा ही क्या करें ?फिर खुद ही बोले – “ऐसा करो कि इसका जो मंगलसूत्र एवं कर्णफूल हैं, इन्हे बेचकर जो रूपये मिले उन्हें अस्थि विसर्जन में लगा देते हैं।”इस बात को अपने लोगों को बताते हुए कई बार रोते – रोते रति भाई ने कहा कि “जिस समय यह सुना हम जीवित कैसे रह गये, बस हमारा हार्ट फैल नही हुआ।”हम आपसे कह नहीं सकते, कि हमारा क्या हाल था।”

विनम्रता की प्रतिमूर्ति

इतनी ख्याति और श्रद्धा के बाद भी डोंगरेजी महाराज अत्यंत विनम्र रहे। वे स्वयं अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगते थे। जब कोई उनकी प्रशंसा करता, तो कहते, “जो कुछ भी है, वह भगवान की कृपा और भक्तों की भावना है। मैं तो केवल एक माध्यम हूँ।”

जीवन का अंतिम चरण

अपने जीवन के अंतिम वर्षों में भी वे लगातार प्रवचन, सेवा और समाज कल्याण में लगे रहे। उन्होंने युवाओं को नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा दी और उन्हें देश और धर्म के प्रति जागरूक किया। उन्होंने आध्यात्मिकता को केवल साधना का विषय न मानकर उसे व्यावहारिक जीवन से जोड़ने पर बल दिया। श्री रामचंद्र डोंगरेजी महाराज की मृत्यु के बाद उन्हें यमुना जी के परवाह में जल समाधि दी गई । उनकी मृत्यु एक महान संत की विदाई थी, लेकिन उनके विचार, शिक्षाएँ और सेवा के कार्य आज भी हजारों लोगों को मार्गदर्शन दे रहे हैं।

श्री रामचंद्र डोंगरेजी महाराज का जीवन यह सिद्ध करता है कि सच्ची साधना केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि सेवा और करुणा में है। उन्होंने जिस प्रकार समाज के अंतिम व्यक्ति तक प्रेम और सहायता पहुँचाई, वह उन्हें “कलयुग का कर्ण” बनने का गौरव दिलाता है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि अगर मन में सच्ची भावना हो, तो हम भी दूसरों के जीवन में आशा और प्रकाश फैला सकते हैं।

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