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संसद में वंदे मातरम् पर विशेष बहस

संसद में आज फिर गूंजेगा “वंदे मातरम्” — 150वीं वर्षगांठ पर विशेष बहस, पुराने विवाद भी आएंगे सामने

Laxmi Nautiyal, December 8, 2025December 8, 2025

संसद के शीतकालीन सत्र में आज लोकसभा में “वंदे मातरम्” पर विशेष चर्चा होगी। इस बहस के लिए लगभग दस घंटे का समय निर्धारित किया गया है और शुरुआत प्रधानमंत्री द्वारा की जाएगी। चर्चा का उद्देश्य गीत के ऐतिहासिक महत्व, वर्तमान प्रासंगिकता और सार्वजनिक जीवन में इसके उपयोग को नए सिरे से समझना है।

पिछली बार वंदे मातरम् पर क्या विवाद हुआ था

“वंदे मातरम्” की रचना उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में हुई और यह धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख प्रतीक बन गया। हालांकि गीत के कुछ पदों में देवी-देवताओं का उल्लेख होने के कारण 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने यह निर्णय लिया था कि सार्वजनिक सभाओं में केवल पहले दो पद ही गाए जाएँ। बाद के पदों को धार्मिक रूप से विशिष्ट मानते हुए कई मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई थी। इसी वजह से यह गीत लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक बहसों में विवाद का केंद्र बना रहा।

स्वतंत्रता के बाद भी यह विवाद शांत नहीं हुआ। समय-समय पर यह प्रश्न उठता रहा कि क्या यह गीत सभी समुदायों के लिए समान रूप से स्वीकार्य है, या केवल एक सांस्कृतिक प्रतीक भर है। कई बार ऐसी मांग भी उठती रही कि इसे राष्ट्रगीत की तरह अनिवार्य किया जाना चाहिए, जबकि कई समूह इसे ऐच्छिक रखने के पक्ष में रहे।

अभी यह चर्चा का विषय क्यों बना हुआ है

2025 में “वंदे मातरम्” की 150वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। इसी अवसर पर सरकार चाहती है कि इसके इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और संवैधानिक स्थिति पर विस्तृत विमर्श हो। बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आधुनिक भारत में इस गीत की भूमिका क्या होनी चाहिए—क्या इसे राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया जाए या विविधता को ध्यान में रखते हुए इसे ऐच्छिक ही रखा जाए। इसी कारण विपक्ष और सत्ता पक्ष एक बार फिर आमने-सामने हैं और दोनों पक्ष अपनी-अपनी व्याख्याएँ पेश करने की तैयारी में हैं।

आज की बहस क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है

बहस का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि यह केवल एक गीत की समीक्षा भर नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक मूल्यों के संतुलन पर व्यापक राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाती है। संसद में आज यह देखा जाएगा कि क्या यह चर्चा पुराने विवादों को समाप्त करने में सफल होगी, या यह मुद्दा भविष्य में भी राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना रहेगा।

देश में कई बड़े मुद्दे बाकी, फिर भी वंदे मातरम् पर बहस क्यों जरूरी मानी जा रही है?

विपक्ष का मानना है कि संसद के सामने बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की आय, शिक्षा-स्वास्थ्य ढांचा और सीमाई सुरक्षा जैसे कई गंभीर मुद्दे अभी लंबित हैं, जिन पर तुरंत और विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है। इसके बावजूद सरकार ने वंदे मातरम् पर विशेष बहस को सत्र का प्रमुख विषय बनाया है। आलोचकों का तर्क है कि आर्थिक और सामाजिक संकटों के बीच प्रतीकों पर केंद्रित बहसें कभी-कभी असल मुद्दों को पीछे धकेल देती हैं।

वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि राष्ट्रीय प्रतीकों पर विमर्श भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे देश की सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों को और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। इसीलिए संसद में यह बहस इस समय भी उतनी ही प्रासंगिक मानी जा रही है, भले ही देश कई बड़े चुनौतियों से गुज़र रहा हो।

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