उत्तर प्रदेश की लखीमपुर सहकारी बैंक (Urban Cooperative Bank) में भर्ती प्रक्रिया को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानों में दावा किया जा रहा है कि बैंक में कुल 27 पदों पर भर्ती हुई, जिनमें से 15 पद ठाकुर समुदाय के लोगों को दिए गए। साथ ही कुछ रिपोर्ट्स कहती हैं कि बाकी में से 4 पद सामान्य वर्ग (General Category) उम्मीदवारों को मिल गए। इस मामले ने राज्य में आरक्षण, योग्यता और पारदर्शिता को लेकर बहस तेज कर दी है।
क्या है पूरा मामला?
लखीमपुर सहकारी बैंक की हालिया भर्ती सूची को लेकर कई राजनैतिक दलों और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने आरोप लगाया है कि चयन प्रक्रिया में एक ही जाति विशेष को बढ़त दी गई।
- कुल पद: 27
- ठाकुर समुदाय को चयन: 15 (दावा)
- सामान्य वर्ग को: 4 (दावा)
- और बाकी की सीट दलित और निचले वर्गों के लिए राखी गयी।
हालाँकि आधिकारिक नोटिस में “ब्राह्मण” शब्द का ज़िक्र स्पष्ट रूप से नहीं मिलता, सिर्फ “General Category” का उल्लेख है। लेकिन इसमें सभी नाम पढ़ने पर मामला की किस प्रकार इस भर्ती में इतने सिंह ( ठाकुरों की कास्ट ) उपनाम के लोगों को नौकरी मिली है।
राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू
इस मुद्दे पर विपक्षी पार्टियों ने BJP सरकार पर निशाना साधा है। उनका आरोप है कि आरक्षण और समान अवसर की नीति को दरकिनार करते हुए जातिगत पक्षपात किया जा रहा है।
विपक्ष ने सवाल खड़े किए:
- क्या यह नियुक्ति योग्यता के आधार पर हुई?
- क्या भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी थी?
- क्या किसी जाति विशेष को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई?
वहीं, सत्ता पक्ष की ओर से इस पर अभी तक कोई स्पष्ट आधिकारिक बयान नहीं आया है।
सेलेक्शन लिस्ट कहाँ है?
जिन स्रोतों ने यह दावा किया है, उनके मुताबिक सूची बैंक स्तर पर थी, लेकिन बैंक की आधिकारिक साइट पर जाति-वार चयन सूची उपलब्ध नहीं मिली।
यानि फिलहाल:
- आरोप मौजूद
- आधिकारिक दस्तावेज़ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं
लोग क्यों सवाल उठा रहे हैं?
- आरक्षण नियमों का पालन हुआ या नहीं?
- भर्ती प्रक्रिया मेरिट-बेस्ड थी या नहीं?
- सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता की कमी क्यों?
यही कारण है कि सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेज़ी से चर्चा में है।
अब आगे क्या?
कई लोग इस मामले में RTI दायर करने की तैयारी कर रहे हैं ताकि पूरी सच्चाई साफ़-साफ़ सामने आ सके।
अगर बैंक या सरकार इसको लेकर विस्तृत चयन सूची जारी कर दे, तो विवाद शांत हो सकता है।
फिलहाल यह मामला आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच फंसा है।
- कुछ तथ्य सामने आए हैं,
- कुछ दावे हैं जिन्हें आधिकारिक प्रमाण की ज़रूरत है।
ऐसे संवेदनशील मामलों में पूरी जानकारी आने के बाद ही राय बनाना बेहतर माना जाता है।
सरकारी स्कूलों की हालत पर रिपोर्ट: सरकार की लापरवाही से बच्चों का भविष्य खतरे में

