भारत में शिक्षा को सबका अधिकार कहा गया है, लेकिन सरकारी स्कूलों की हालत देखकर यह अधिकार केवल कागज़ों तक सीमित लगता है।
हर साल सरकारें शिक्षा सुधार के बड़े-बड़े दावे करती हैं, मगर ज़मीन पर हालात जस के तस हैं।
कई राज्यों में सरकारी स्कूलों की स्थिति इतनी खराब है कि बच्चे टूटे कमरों, बिना शिक्षकों और बिना संसाधनों के पढ़ने को मजबूर हैं।
1. सरकारी स्कूलों की ज़मीनी हकीकत
देश के ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों की स्थिति सबसे दयनीय है।
- कई स्कूलों में इमारतें जर्जर हैं या आधी टूटी पड़ी हैं।
- एक या दो शिक्षक पूरे स्कूल के सैकड़ों बच्चों को पढ़ाते हैं।
- बच्चों के पास न किताबें हैं, न बेंच, न साफ पानी।
ऐसे माहौल में शिक्षा एक औपचारिकता बनकर रह गई है, जहाँ सीखने से ज़्यादा टिके रहने की लड़ाई है।
2. सरकारी दावे बनाम हकीकत
हर साल बजट में शिक्षा को प्राथमिकता देने की बात होती है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कोई असर नहीं दिखता।
ASER रिपोर्ट 2024 के अनुसार:
- सरकारी स्कूलों के लगभग 60 प्रतिशत छात्र पाँचवीं कक्षा में भी तीसरी की किताब नहीं पढ़ सकते।
- 70 प्रतिशत बच्चे बुनियादी गणित नहीं कर पाते।
ये आंकड़े बताते हैं कि सरकारी दावे और हकीकत में ज़मीन-आसमान का फर्क है।
3. शिक्षकों की भारी कमी और जवाबदेही का अभाव
देश के कई राज्यों में शिक्षकों के हजारों पद वर्षों से खाली हैं।
जो शिक्षक कार्यरत हैं, उन्हें अक्सर शिक्षण के बजाय प्रशासनिक कार्यों में लगा दिया जाता है —
जैसे जनगणना, चुनाव ड्यूटी या राशन सर्वेक्षण।
इस वजह से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और सीखने की प्रक्रिया कमजोर हो जाती है।
4. सुविधाओं और संसाधनों की कमी
अधिकांश सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं हैं।
- कई जगह टॉयलेट नहीं हैं,
- साफ़ पानी का इंतज़ाम नहीं,
- बिजली और फर्नीचर की भारी कमी है।
लड़कियों के लिए अलग शौचालय न होना शिक्षा में सबसे बड़ी बाधा है।
मिड डे मील योजना भी कई बार भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ जाती है, जिससे बच्चों का भरोसा तंत्र से उठ रहा है।
5. शिक्षा की गुणवत्ता क्यों गिर रही है?
गुणवत्ता गिरने के कई कारण हैं —
- प्रशिक्षण की कमी,
- शिक्षण में तकनीक का अभाव,
- प्रशासनिक उदासीनता,
- और नीति के स्तर पर दूरदर्शिता की कमी।
नीतियाँ बनती तो हैं, लेकिन उनका सही क्रियान्वयन नहीं हो पाता।
कागज़ों पर सब कुछ सही दिखता है, मगर स्कूल के मैदानों में सन्नाटा फैला रहता है।
6. सरकार की भूमिका और ज़िम्मेदारी
सरकारों ने शिक्षा के नाम पर योजनाएँ तो शुरू की हैं, लेकिन उनका प्रभाव दिख नहीं रहा।
पिछले वर्षों में “स्कूल परिवर्तन योजना”, “स्मार्ट क्लास”, और “ऑनलाइन एजुकेशन” जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू हुए,
मगर इनमें से अधिकांश रिपोर्टिंग तक सीमित रहे।
जमीनी स्तर पर बदलाव लाने के लिए सरकार को चाहिए —
- शिक्षकों की नियमित भर्ती,
- पारदर्शी बजट खर्च,
- और समुदाय आधारित निगरानी।
7. क्या हैं सुधार की असली राह?
- स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात संतुलित करना।
- ग्रामीण स्कूलों के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर विशेष ध्यान देना।
- शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों से मुक्त करना।
- अभिभावकों और पंचायतों को स्कूल निगरानी में शामिल करना।
- शिक्षा बजट के उपयोग की नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग करना।
नोट
भारत का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब हर बच्चे को समान अवसर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी।
आज सरकारी स्कूलों में बच्चे नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम पिछड़ चुका है।
सरकार अगर सच में “नई शिक्षा नीति” को ज़मीन पर उतारना चाहती है, तो उसे सबसे पहले सरकारी स्कूलों की नींव मज़बूत करनी होगी।
वरना आने वाले वर्षों में शिक्षा का अधिकार सिर्फ़ एक सपना बनकर रह जाएगा।
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