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स्कूल हो या अस्पताल — गरीब की जेब हमेशा खाली, मजबूरी हमेशा भारी

स्कूल हो या अस्पताल — गरीब की जेब हमेशा खाली, मजबूरी हमेशा भारी

Laxmi Nautiyal, March 24, 2026March 24, 2026

सरकारी में बदहाली, प्राइवेट में लूट — आम आदमी जाए तो जाए कहाँ?

ज़िंदगी में दो जगहें ऐसी हैं जहाँ हर इंसान को — चाहे वो अमीर हो या गरीब — एक न एक बार जाना ही पड़ता है। एक है स्कूल, जो भविष्य की नींव रखता है। और दूसरी है अस्पताल, जो सेहत की डोर थामता है। लेकिन आज के भारत में इन दोनों जगहों पर आम आदमी की हालत देखकर दिल भर आता है।

“सरकारी में सुविधा नहीं, प्राइवेट में पैसा नहीं — मजबूर इंसान दोनों तरफ से पिसता है।”

सरकारी स्कूल और अस्पताल — कागज़ों में अच्छे, हकीकत में खस्ता

हर साल बजट में करोड़ों रुपये सरकारी स्कूलों और अस्पतालों के लिए आवंटित होते हैं। भाषण में “बेहतर शिक्षा” और “मुफ्त इलाज” के वादे होते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी स्कूलों में न पर्याप्त शिक्षक हैं, न साफ शौचालय, न बैठने के लिए ढंग की कुर्सियाँ। बच्चे टूटे बेंचों पर बैठकर पढ़ते हैं, और कई बार एक ही शिक्षक तीन-चार क्लास एक साथ संभालते हैं।

सरकारी अस्पतालों में भी यही हाल है। डॉक्टर की कमी इतनी है कि मरीज़ को घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। दवाइयाँ अक्सर “स्टॉक में नहीं” होतीं। बेड पर दो-दो मरीज़ लेटे मिलते हैं। और ICU जैसी सुविधाएं तो बस कुछ बड़े सरकारी अस्पतालों तक ही सीमित हैं।

हकीकत के आंकड़े

भारत में डॉक्टर और मरीज़ों का अनुपात (WHO मानक 1:1000)1:28
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पद40%+
प्राइवेट अस्पताल में एक सर्जरी का औसत खर्च₹5 लाख+

प्राइवेट में जाओ — तो लूट का बाज़ार

जब सरकारी व्यवस्था से परेशान होकर आम आदमी प्राइवेट स्कूल या अस्पताल का रुख करता है, तो वहाँ एक अलग ही दुनिया उसका इंतज़ार करती है — पैसों की दुनिया। प्राइवेट स्कूलों में एडमिशन फीस, डोनेशन, यूनिफॉर्म, किताबें, स्टेशनरी — हर चीज़ के नाम पर अलग-अलग बिल थमा दिया जाता है। और माँ-बाप के पास “ना” कहने का कोई विकल्प नहीं होता, क्योंकि बच्चे का भविष्य दांव पर है।

प्राइवेट अस्पतालों में तो हालत और भी दर्दनाक है। एक सामान्य बुखार में भी 5-7 टेस्ट लिख दिए जाते हैं। दवाओं की जगह महंगे ब्रांड्स लिखे जाते हैं। बेड चार्ज, डॉक्टर विज़िट फीस, नर्सिंग चार्ज — रोज़ाना का बिल हज़ारों में पहुँच जाता है। और जब अस्पताल से निकलने का वक्त आता है, तो इंसान इलाज से नहीं, बल्कि बिल देखकर बेहोश हो जाता है।

“बीमारी एक बार आती है, लेकिन प्राइवेट अस्पताल का कर्ज़ सालों तक नहीं जाता।”

गरीब की कमर कैसे टूट रही है?

भारत में आज भी करोड़ों परिवार ऐसे हैं जो दिहाड़ी मजदूरी, छोटी दुकान या खेती पर निर्भर हैं। उनकी मासिक आमदनी 8,000 से 15,000 रुपये के बीच है। जब उनके घर में कोई बीमार पड़ता है या बच्चे की फीस भरनी होती है, तो वो पहले अपनी जमा पूंजी लगाते हैं। फिर रिश्तेदारों से उधार माँगते हैं। और आखिर में साहूकार या बैंक से कर्ज़ लेते हैं — जो उनकी ज़िंदगीभर की कमाई खा जाता है।

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह लाखों परिवारों की दास्तान है जो हर रोज़ इस चक्की में पिस रहे हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा — जो हर नागरिक का मौलिक अधिकार हैं — आज बाज़ार की चीज़ बन गई हैं।

समाधान क्या है?

इस समस्या का हल न तो रातोंरात आएगा, और न ही सिर्फ सरकार के भरोसे। जरूरत है कि सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को जवाबदेह बनाया जाए। प्राइवेट संस्थानों पर फीस और इलाज की दरों को लेकर सख्त नियम लागू हों। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का दायरा बढ़े और उनका क्रियान्वयन ईमानदारी से हो। साथ ही, आम नागरिक को अपने अधिकारों की जानकारी हो — कि वो RTI लगा सकता है, शिकायत कर सकता है, आवाज़ उठा सकता है।

जब तक देश का हर बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़ नहीं पाता और हर बीमार इंसान को सस्ता और सम्मानजनक इलाज नहीं मिलता — तब तक “विकसित भारत” का सपना अधूरा ही रहेगा।

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