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इंदौर पानी संकट पर सवाल पूछे तो नेता बोले – “बेकार के सवाल मत पूछो”, दूषित पानी से मची तबाही

नल से ज़हर, अस्पतालों में भीड़_ इंदौर संकट की तस्वीर

नल से ज़हर, अस्पतालों में भीड़_ इंदौर संकट की तस्वीर

मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में जल आपूर्ति से जुड़ा एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट उभरकर सामने आया है। शहर के भागीरथपुरा इलाक़े में नल के पानी में सीवेज-जैसी गंदगी के मिल जाने से कम-से-कम 6 से 10 लोगों की मौत हुई है, जबकि 200 से ज़्यादा लोग उल्टी-दस्त और बुखार जैसी बीमारियों के साथ अस्पतालों में भर्ती हैं। स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने यह बताया कि कई मरीजों की हालत गंभीर है और उन्हें ICU में रखा गया है।

शहर की प्रतिष्ठा पिछले कई सालों से “भारत के सबसे स्वच्छ शहर” के रूप में रही है। लेकिन इस संकट ने साबित कर दिया है कि स्वच्छता केवल उपस्थिति तक सीमित नहीं रह सकती। ग्रामीण और शहरी जल आपूर्ति पाइपलाइन में कहीं गड़बड़ी से सीवेज वाला पानी पीने के पानी की लाइन में मिल गया, जिससे यह कोरोना-जैसी गंभीर स्थिति बनी। स्थानीय लोगों ने पहले से ही नालों की गंध और पानी के बदसूरत रंग की शिकायतें प्रशासन तक पहुँचाई थीं, लेकिन तुरंत समाधान नहीं दिया गया। जल तथा स्वास्थ्य विभाग की लैब रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि पानी में ऐसे बैक्टीरिया पाए गए हैं जो आम तौर पर मल-जल से आते हैं और अत्यधिक उल्टी, दस्त और डिहाइड्रेशन का कारण बन सकते हैं।

स्थानीय प्रशासन ने आपातकालीन कदम उठाए हैं — नगर निगम के कलेक्टर समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को हटा दिया गया है और पानी आपूर्ति लाइनों की जांच तेज़ कर दी गयी है। मुख्यमंत्री के निर्देशों पर पूरे शहर के जल स्रोतों की सफ़ाई और लीकेज की मरम्मत का काम चल रहा है। प्रशासन का कहना है कि प्रभावित क्षेत्रों को सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने के लिए टैंकर आपूर्ति और पाइपलाइन सर्वे कराया जा रहा है।

राजनीतिक विवाद और बयानबाज़ी

जब इस पर सवाल उठे कि इतने गंभीर स्थिति में क्या प्रशासन समय पर कदम उठा पाया, तो इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव का बयान चर्चा में आया। पत्रकारों के सवालों पर उन्होंने कहा, “बेकार के सवाल मत पूछो।” उनके इस जवाब ने और लोगों में गहरी नाराज़गी जताई क्योंकि कई परिवारों ने अपने परिजनों को खो दिया है या वे अब भी अस्पतालों में हैं। मेयर के इस बयान को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक विरोधी दलों में तीखी आलोचना हो रही है। लोग पूछ रहे हैं कि जब इतनी बड़ी स्वास्थ्य आपदा हो रही है, तो क्या अधिकारी सही मायने में जवाबदेही से काम कर रहे हैं?

इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और जल सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सख़्त निगरानी, त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई और जिम्मेदार अधिकारियों से ज़िम्मेदारी लेना कितना ज़रूरी है। अब चूंकि नेताओं के पर्सनल जीवन में ये समस्या नहीं है तो आम जनता की समस्या उनको बेकार की बातें ही लगती है।

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