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गांधी को क्यों नहीं माना जा सकता विभाजन का दोषी: इतिहास की सच्चाई

हिंदू मुस्लिम विभाजन कारण गाँधी को मानना देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य

हिंदू मुस्लिम विभाजन कारण गाँधी को मानना देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य

भारत का विभाजन आधुनिक इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। इस त्रासदी में लाखों लोग मारे गए, करोड़ों को अपने घर छोड़ने पड़े और दो देशों के बीच बंटवारा हो गया। आज भी कई लोग सवाल उठाते हैं कि हिंदू-मुसलमानों में विभाजन का दोष किसका था? अक्सर इस सवाल में गांधी का नाम आ जाता है – मानो उन्हीं की वजह से भारत बंटा हो। लेकिन सच यह है कि गांधी को इस मुद्दे में दोष देना इतिहास और हकीकत—दोनों के साथ नाइंसाफी है।

ब्रिटिश शासन की ‘फूट डालो, राज करो’ नीति

गांधी राजनीति में आए उससे बहुत पहले से ही हिंदू-मुसलमानों के बीच दरारें पैदा की जा रही थीं।
ब्रिटिश शासन की नीति साफ थी—भारत को एकजुट रहने न दो। उन्होंने अलग निर्वाचन क्षेत्र, अलग कानून, और समुदायों के बीच भेदभाव की नीतियाँ लागू करके दोनों समाजों में अविश्वास को बढ़ावा दिया। 1909 के बाद से यह विभाजन और तेज हुआ। इस माहौल में गांधी नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार का हाथ सबसे ज़्यादा था।

गांधी का रुख: हिंदू-मुस्लिम एकता पर अडिग

गांधी की पूरी राजनीति एकता, अहिंसा और सभी समुदायों के बराबर अधिकारों पर आधारित थी।
उन्होंने कभी किसी धर्म को दूसरे धर्म से ऊपर नहीं माना। जब उन्होंने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया, तो उसका एक ही उद्देश्य था—दोनों समुदायों को एक साथ लाना। उनका मानना था कि अगर हिंदू और मुसलमान साथ खड़े होंगे, तो अंग्रेजों की ‘फूट डालो’ की नीति काम नहीं करेगी।

गांधी बार-बार कहते थे:
“भारत हिंदुओं का नहीं, मुसलमानों का नहीं—यह सबका देश है।”

राजनीतिक टकराव: विभाजन की असली वजह

विभाजन धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों से हुआ।
कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच गहरे राजनीतिक मतभेद पैदा हो चुके थे। जहां कांग्रेस पूरे भारत के लिए एक लोकतांत्रिक ढांचा चाहती थी, वहीं मुस्लिम लीग अलग राष्ट्र की मांग पर अड़ी हुई थी। 1946 के बाद लीग का रुख और कठोर हो गया। दंगे भड़कने लगे, हिंसा फैल गई, और हालात ऐसे हो गए कि एक साथ शासन करना लगभग असंभव होता जा रहा था।

इन राजनीतिक तनावों में गांधी की नहीं, बल्कि नेताओं और पार्टियों के बीच बढ़ती खाई की भूमिका थी।

गांधी आखिरी समय तक विभाजन के खिलाफ खड़े रहे

जब अलग राष्ट्र की मांग तेज हो चुकी थी, तब भी गांधी ने इसे मंजूर नहीं किया।
उन्होंने कहा था कि वे “भारत का विभाजन अपने जीवित रहते नहीं होने देंगे।” वे आखिरी समय तक नेताओं को समझाने की कोशिश करते रहे कि बंटवारा समस्या का हल नहीं है, बल्कि और बड़ी समस्याएँ पैदा करेगा।

जब कई नेता विभाजन को ‘मजबूरी’ मानकर स्वीकार करने लगे, तब भी गांधी अकेले थे जो इसके खिलाफ खड़े रहे। उन्होंने दिल्ली, बंगाल और बिहार में अनशन करके दंगों को रोका। उनकी कोशिशों के कारण कई जगह हिंसा थम गई।

अगर गांधी विभाजन चाहते, तो वे दंगों को रोकने के लिए अनशन नहीं करते, लोगों को जोड़ने के लिए अपनी जान जोखिम में नहीं डालते।

विभाजन का निर्णय गांधी का नहीं था

ये भी एक तथ्य है कि भारत के विभाजन का फैसला गांधी ने नहीं लिया था।
यह निर्णय राजनीतिक समझौतों, असहनीय हालात और ब्रिटिश प्रशासन की जल्दबाज़ी का नतीजा था। कांग्रेस के अन्य नेताओं ने इसे “कम नुकसान वाला विकल्प” मानकर स्वीकार किया, क्योंकि लगातार बढ़ती हिंसा में एक संयुक्त भारत चलाना असंभव लग रहा था।

गांधी इस फैसले को कभी स्वीकार नहीं कर पाए। वे हर पल यही कहते रहे कि भारत दो भागों में नहीं बंटना चाहिए।

लोग गांधी को क्यों दोष देते हैं?

आज गांधी को दोष दिया जाता है क्योंकि
– इतिहास को अधूरा पढ़ा जाता है,
– सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाई जाती है,
– और असल जटिलता को सरल जवाबों में बदलने की कोशिश की जाती है।
लेकिन इतिहास का मूल संदेश साफ है—गांधी ने कभी भी हिंदू-मुसलमान को बांटने की कोशिश नहीं की। वे विभाजन के सबसे बड़े विरोधी थे।

भारत का बंटवारा गांधी के कारण नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही नीतियों, राजनीतिक मतभेदों और बढ़ती हिंसा के कारण हुआ था। गांधी ने हमेशा एकता की बात की, शांति की अपील की और आखिरी क्षण तक विभाजन रोकने की कोशिश की। उन्हें विभाजन के लिए दोष देना इतिहास की सबसे बड़ी गलतफ़हमी है।

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