साल 2025 में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के कारण संसद के शीतकालीन सत्र में इस विषय पर विशेष चर्चा रखी गई। लोकसभा में यह चर्चा 8 दिसंबर 2025 को शुरू हुई, इसके बाद 9 दिसंबर को राज्यसभा में भी यह मुद्दा उठाया गया।
किसने क्या कहा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री ने लोकसभा में चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई बार इस गीत के साथ अन्याय हुआ, विशेषकर उस समय जब इसके कई छंद हटाए गए थे। प्रधानमंत्री के अनुसार, यह उपेक्षा राष्ट्रीय भावना को कमजोर करती है और इतिहास को सही रूप में समझने की आवश्यकता है।
प्रियंका गांधी
प्रियंका गांधी ने कहा कि वंदे मातरम् पर चल रही यह बहस पूरी तरह राजनीतिक उद्देश्य से उठाई गई है और सरकार इसका इस्तेमाल चुनावी माहौल बनाने के लिए कर रही है। उनके अनुसार, देश जिन असली समस्याओं से जूझ रहा है—महँगाई, बेरोज़गारी, गिरती अर्थव्यवस्था और किसानों की दिक्कतें—उन पर चर्चा से बचने के लिए सरकार ऐसे मुद्दों को आगे लाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की बहसें जनता के मुद्दों को पीछे धकेलकर माहौल को भावनात्मक दिशा में ले जाती हैं, जबकि ज़रूरत इस बात की है कि संसद में उन मुद्दों पर बात हो जो सीधे लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं।
मल्लिकार्जुन खड़गे (कांग्रेस)
राज्यसभा में खड़गे ने सरकार को जवाब देते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस जेलों में बंद रहते हुए भी वंदे मातरम् का उद्घोष करती थी। उन्होंने कहा कि आज सरकार जिस तरह इस गीत का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है, वह गलत है। खड़गे ने पूछा कि यदि वंदे मातरम् इतना महत्त्वपूर्ण था, तो इतिहास में इसके कई हिस्से हटाए क्यों गए। उन्होंने यह भी कहा कि आज का मुद्दा वर्तमान आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से ध्यान भटकाने जैसा है।
असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम)
ओवैसी ने कहा कि वंदे मातरम् को जबरदस्ती थोपना संविधान के खिलाफ है। उनका कहना था कि देशभक्ति किसी गीत के माध्यम से साबित नहीं होती, बल्कि न्याय, अवसर, और समानता देने से सिद्ध होती है। उन्होंने कहा कि अलग धार्मिक मान्यताओं वाले लोगों को किसी भी प्रतीक या गीत के लिए मजबूर करना ठीक नहीं है।
बंसुरी स्वराज (भाजपा)
बहस के दौरान बंसुरी स्वराज ने कहा कि वंदे मातरम् भारत की पहचान का प्रतीक है और कई राज्यों में इसे राजनीतिक कारणों से दबाया गया है। उन्होंने इसे आगामी चुनावों से भी जोड़ते हुए कहा कि संस्कृति और राष्ट्रभाव के मुद्दों को सही स्थान दिलाना आवश्यक है।
बहस की दिशा
वंदे मातरम् पर हुई यह चर्चा सिर्फ एक सांस्कृतिक समारोह नहीं रही। यह बहस तेजी से राजनीतिक रूप लेती गई। सरकार इसे राष्ट्रीय गर्व और इतिहास सुधार का कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे पहचान की राजनीति, इतिहास के चयनात्मक उद्धरण, और वर्तमान मुद्दों से ध्यान हटाने का प्रयास बता रहा है।
कुछ नेताओं ने इस बहस को धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों का विषय भी बताया। उनका कहना था कि किसी भी राष्ट्रगीत या राष्ट्रीय प्रतीक को थोपना संविधान की भावना के खिलाफ है।
8 और 9 दिसंबर 2025 को संसद में वंदे मातरम् पर व्यापक और भावनात्मक चर्चा हुई।
मुख्य बिंदु रहे:
- सरकार ने वंदे मातरम् को राष्ट्रीय एकता और ऐतिहासिक सम्मान का विषय बताया।
- विपक्ष ने कहा कि यह चर्चा वर्तमान मुद्दों जैसे बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था और सामाजिक तनाव से ध्यान हटाती है।
- कुछ नेताओं ने धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों की चिंता भी जताई।
- बहस ने यह साफ कर दिया कि वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, बल्कि आज की राजनीति में पहचान और राष्ट्रवाद का एक बड़ा मुद्दा बन चुका है।

