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दिवाली के बाद दिल्ली फिर गैस चेंबर बनी, हवा में जहर का स्तर खतरनाक

दिवाली के बाद दिल्ली की हवा फिर ज़हरीली: सरकार के दिखावे वाले कदमों से नहीं थम रहा प्रदूषण

Hindi News, October 30, 2025October 30, 2025

दिवाली के बाद एक बार फिर दिल्ली की हवा ज़हर बन चुकी है। राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) लगातार “बहुत ख़राब” से “गंभीर” श्रेणी में बना हुआ है। कई इलाकों जैसे आनंद विहार, रोहिणी, नरेला और वज़ीराबाद में AQI 450 से ऊपर दर्ज हुआ है, जो सांस लेने के लिए बेहद खतरनाक स्थिति मानी जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि दिवाली के दौरान और उसके तुरंत बाद दिल्ली की हवा में PM 2.5 और PM 10 जैसे सूक्ष्म कणों की मात्रा सामान्य दिनों से 10 से 15 गुना अधिक हो जाती है। ये छोटे-छोटे कण फेफड़ों में जाकर गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।

प्रदूषण के असली कारण — आतिशबाज़ी ही नहीं, कई और वजहें भी

सरकार हर बार दिवाली की आतिशबाज़ियों को मुख्य कारण बताती है, लेकिन हवा खराब होने के पीछे केवल पटाखे ज़िम्मेदार नहीं हैं।

  • पंजाब और हरियाणा से पराली का धुआँ लगातार दिल्ली की हवा में घुल रहा है।
  • वाहनों से निकलने वाला धुआँ प्रदूषण का स्थायी स्रोत बना हुआ है।
  • निर्माण स्थलों और सड़कों की धूल हवा को और जहरीला बना रही है।
  • ठंडी और स्थिर हवाएँ प्रदूषकों को ऊपर जाने से रोकती हैं, जिससे पूरा शहर धुंध की परत में घिर जाता है।

सरकार के कदम — और दिखावे की राजनीति

दिल्ली सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए कई उपाय शुरू किए हैं।

  • सड़कों पर पानी के टैंकरों से छिड़काव किया जा रहा है।
  • एंटी-स्मॉग गन तैनात की गई हैं।
  • निर्माण स्थलों पर कार्य रोकने के आदेश दिए गए हैं।
  • पराली जलाने वालों पर जुर्माने की चेतावनी जारी की गई है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या ये उपाय सिर्फ दिखावे तक सीमित हैं?

हाल में सामने आए मामलों में पता चला है कि कई प्रदूषण मॉनिटरिंग स्टेशनों के पास जानबूझकर पानी का छिड़काव किया जा रहा है ताकि AQI की रीडिंग “कम” दिखाई दे।


आनंद विहार जैसे इलाकों में पानी छिड़कने के बाद AQI का स्तर कुछ घंटों में ही घट गया, जबकि वास्तविक हवा में कोई सुधार नहीं हुआ। इससे यह साफ़ झलकता है कि सरकारें आंकड़ों की बाजीगरी में लगी हैं, असल सुधार में नहीं।

जनता की सेहत पर गहराता असर

दिल्ली के अस्पतालों में दिवाली के बाद सांस, खांसी और सीने में दर्द से परेशान मरीजों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह “मौसमी” नहीं बल्कि स्थायी स्वास्थ्य संकट बन चुका है।
बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं पर इसका असर सबसे गंभीर पड़ता है।

क्या हैं असली समाधान?

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण से निपटने के लिए केवल तात्कालिक नहीं, बल्कि लंबी अवधि की नीति की जरूरत है —

  • पराली प्रबंधन के लिए किसानों को आधुनिक उपकरण और आर्थिक सहायता देना।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना।
  • निर्माण स्थलों पर सख्त निगरानी और जुर्माना।
  • हर इलाके में पेड़ लगाना और पुराने पेड़ों की रक्षा करना।
  • मॉनिटरिंग सिस्टम को पारदर्शी बनाना ताकि कोई “रीडिंग” के साथ खिलवाड़ न कर सके।

दिवाली के बाद दिल्ली की हवा फिर से दम घोंटने वाली बन चुकी है।
सरकारें आंकड़े सुधारने में लगी हैं, लेकिन ज़मीन पर प्रदूषण बढ़ता जा रहा है।
जब तक पराली, वाहन और निर्माण धूल पर सख्त नियंत्रण नहीं होगा, तब तक दिल्ली की सांसें ऐसे ही भारी रहेंगी।
अब वक्त है दिखावे की राजनीति छोड़कर सच्चे समाधान पर काम करने का।

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