Delhi Me Ravan ke Saath Jalega Cockroach: दशहरे पर आज तक हमने रावण जलता देखा, कुंभकर्ण जलता देखा, मेघनाद जलता देखा। इस बार दिल्ली में एक नया “बुरा किरदार” जोड़ा गया है, 30 फीट का कॉकरोच। और जिस दिन यह खबर आई, उसी दिन से सबके मन में एक ही सवाल है: कॉकरोच ही क्यों, और अभी ही क्यों?
क्या है मामला?
दिल्ली के पीतमपुरा में नेताजी सुभाष प्लेस के पास श्री केशव रामलीला कमेटी का आयोजन है। इस बार 20 अक्टूबर को रावण दहन में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के साथ एक विशाल कॉकरोच का पुतला भी फूँका जाएगा।
कमेटी के अध्यक्ष अशोक गोयल हैं, जो भाजपा के विधायक भी हैं। उनका कहना है कि कॉकरोच “गंदगी और कचरे” का प्रतीक है, यह स्वच्छ भारत और स्वच्छ दिल्ली अभियान का हिस्सा है, और इसके पीछे कोई राजनीति नहीं है।
अब ज़रा इस सफाई को ठंडे दिमाग से देखते हैं।
सफाई चाहिए तो पुतला क्यों?
अगर सचमुच मकसद सफाई का संदेश देना है, तो कुछ सीधे सवाल बनते हैं।
कॉकरोच भगाने के लिए आम आदमी क्या करता है? दवा छिड़कता है, नालियाँ साफ कराता है, कचरा समय पर उठवाता है। पुतला बनाकर जलाने से कॉकरोच भागते होते, तो हर घर में दशहरे के बाद एक पुतला खड़ा होता।
दिल्ली में कचरे के पहाड़ों की बात सालों से हो रही है। नालों की सफाई हर बरसात में सुर्खियाँ बनती है। तो क्या उनकी जगह सारा “सफाई का संदेश” एक 30 फीट के कीड़े में समा गया? अगर कमेटी और उसके अध्यक्ष को सफाई की इतनी फिक्र है, तो उन्होंने अपने इलाके में सफाई के लिए अब तक क्या किया? यह सवाल पूछा जाना चाहिए, और जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
आज तक कोई जीव क्यों नहीं जला?
रावण दहन की परंपरा सदियों पुरानी है। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद जलते आए हैं, क्योंकि वे रामायण के पात्र हैं और बुराई के प्रतीक माने गए हैं। हमें ऐसा कोई उदाहरण याद नहीं आता जब किसी कीड़े-मकोड़े को “बुराई” बनाकर इस तरह जलाया गया हो।
तो सवाल सीधा है। अगर गंदगी जलानी ही थी, तो आज तक क्यों नहीं जलाई? देश में स्वच्छ भारत अभियान को शुरू हुए सालों हो गए। हर साल दशहरा आता है, हर साल पुतले बनते हैं। कॉकरोच को यह “प्रमोशन” इसी साल, इसी मौसम में क्यों मिला?
और यही वह मौसम है, जब कॉकरोच जनता पार्टी चर्चा में है
अब वह बात, जो सब सोच रहे हैं पर आयोजक नहीं सुनना चाहते। दिल्ली में इन दिनों कॉकरोच जनता पार्टी, यानी CJP, की चर्चा हर तरफ है। इसके प्रदर्शन राजधानी में चल रहे हैं। इसने एक घरेलू कीड़े को ऐसी राजनीतिक पहचान दे दी है कि अब “कॉकरोच” सुनते ही बहुत लोगों के दिमाग में रसोई नहीं, सड़क आती है, पोस्टर आते हैं, नारे आते हैं।
ऐसे माहौल में एक भाजपा विधायक की कमेटी ठीक उसी समय 30 फीट के कॉकरोच को जलाने का ऐलान करे, और फिर कहे कि “इसका कोई राजनीतिक मतलब नहीं है”, तो जनता से यह उम्मीद करना कि वह इसे सिर्फ संयोग माने, कुछ ज़्यादा ही उम्मीद है।
हम यह नहीं कह रहे कि पुतला CJP के लिए बनाया गया है। हमारे पास इसका कोई सबूत नहीं है, और आयोजक साफ इनकार करते हैं। पर जब टाइमिंग इतनी “सटीक” बैठे, तो सवाल पूछना हमारा हक़ भी है और जिम्मेदारी भी।
क्या सत्ता वाले कॉकरोच से घबरा रहे हैं?
यह हम अगला सवाल पूछ सकते हैं, फैसला नहीं सुना सकते।
जिस दल के पास सत्ता है, संसाधन हैं, मंच हैं, वह एक नए-नवेले आंदोलन के “कॉकरोच” नाम और निशान से इतना बेचैन क्यों दिख रहा है कि उसके विधायक का आयोजन उसी कीड़े को जलाने में लग जाए? अगर CJP कोई मामूली समूह है, जिसकी कोई अहमियत नहीं, तो उस पर इतना ध्यान क्यों? और अगर वह मामूली नहीं है, तो उसकी बात सुनने की जगह उसके प्रतीक को आग लगाना कौन-सा लोकतांत्रिक जवाब है?
एक पुरानी बात याद आती है: जिसे आप नज़रअंदाज़ करना चाहते हैं, उसका पुतला नहीं जलाते। पुतला उसी का जलता है जिसकी मौजूदगी चुभती है।
“संदेश” का दूसरा पहलू
मान लेते हैं कि आयोजकों की नीयत बिल्कुल साफ है। फिर भी एक बात बचती है। कोई भी सार्वजनिक आयोजन, खासकर जिसकी अगुवाई एक चुना हुआ जनप्रतिनिधि करे, यह जानता है कि उसके हर कदम का एक संदेश जाता है। अगर यह संदेश कुछ और जा रहा है, तो कायदे से आयोजकों को खुद आगे आकर यह स्पष्ट करना चाहिए, न कि सिर्फ “राजनीतिक मंशा नहीं है” कहकर आगे बढ़ जाना चाहिए।
और अगर वाकई कोई मंशा नहीं है, तो क्या वे यह वादा करेंगे कि दहन के मंच से किसी भी राजनीतिक दल या आंदोलन पर कोई टिप्पणी, नारा या इशारा नहीं होगा? यह कहना आसान है, निभाना ज़रूरी है।
दिल्ली को कॉकरोच से नहीं, जवाबदेही से साफ करिए
असल मुद्दा कॉकरोच है भी नहीं। असल मुद्दा वह राजनीति है जो हर चीज़ को प्रतीक बनाकर लड़ने में माहिर हो गई है। जनता के असली सवाल, यानी साफ पानी, साफ सड़कें, कचरे का निपटान, परीक्षाओं में पारदर्शिता, रोज़गार, इन सब पर जवाब देने के बजाय कभी पुतलों की बहस छिड़ती है, कभी नारों की।
अगर दिल्ली को साफ करना है, तो पुतले की आग से नहीं होगा। नालों में उतरना पड़ेगा, कचरे के पहाड़ घटाने पड़ेंगे, और जवाबदेही तय करनी पड़ेगी।
जो सवाल जवाब माँगते हैं
लेख खत्म करने से पहले वे सवाल, जिनके जवाब हम सब जानना चाहेंगे:
- कॉकरोच के पुतले का फैसला कब और किसने लिया?
- इससे पहले कमेटी ने सफाई के संदेश के लिए क्या किया?
- अगर संदेश सफाई का है, तो उसे और कैसे जनता तक पहुँचाया जा रहा है, सिर्फ पुतले से या ज़मीन पर भी?
- क्या आयोजक भरोसा दिलाएँगे कि मंच से कोई राजनीतिक इशारा नहीं होगा?
- और सबसे बड़ा सवाल: क्या यह सच में संयोग है?
20 अक्टूबर की शाम जब कॉकरोच का पुतला जलेगा, तब भीड़ ताली बजाएगी, आतिशबाज़ी होगी, और टीवी कैमरे चमकेंगे। पर असली परीक्षा उस शाम के बाद की है: क्या दिल्ली की गंदगी सच में कम होगी, या सिर्फ एक कीड़े का पुतला राख होगा और बहस अगले साल तक ठंडी पड़ जाएगी?
जवाब वक़्त देगा। तब तक हम सवाल पूछते रहेंगे, क्योंकि सवाल पूछना किसी का बहिष्कार नहीं है, यह लोकतंत्र की सफाई है।
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