दिल्ली के दिल में बसा जंतर-मंतर पिछले तीस सालों से देश के आम आदमी की आवाज़ का ठिकाना रहा है। यहां किसान आए, सैनिक आए, छात्र आए और खिलाड़ी भी। अब दिल्ली पुलिस ने इसे धरना-प्रदर्शन के लिए तय जगहों की सूची से बाहर कर दिया है। उसकी जगह रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को प्रदर्शन-स्थल बनाया गया है।
फ़ैसला कब और कैसे आया
पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार ने 11 अक्टूबर 2026 को एक स्थायी आदेश जारी किया। उसकी जानकारी अगले दिन, यानी 12 अक्टूबर को सामने आई। आदेश के अनुसार गृह मंत्रालय ने एक समिति बनाई थी, जिसे प्रदर्शनों के लिए दूसरी जगहें सुझानी थीं। समिति की सलाह के आधार पर ही जंतर-मंतर को सूची से हटाया गया। पुलिस का कहना है कि नए स्थलों पर प्रदर्शन के नियम अलग से जारी किए जाएंगे।
बोट क्लब से जंतर-मंतर तक का सफ़र
जंतर-मंतर की शुरुआत आंदोलनों के लिए हुई ही नहीं थी। इसे 1724 में जयपुर के राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने आसमान के अध्ययन और समय की गणना के लिए बनवाया था।
आज़ादी के बाद लंबे समय तक आंदोलनकारी इंडिया गेट के पास बोट क्लब के लॉन में जुटते थे। अक्टूबर 1988 में भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के बुलावे पर करीब पांच लाख किसान वहां पहुंचे और लगभग हफ़्ते भर डटे रहे। लेकिन अयोध्या विवाद के गरमाने पर 1990 के दशक की शुरुआत में सुरक्षा का हवाला देकर वहां जमावड़ों पर पाबंदी लग गई।
इसके बाद धरने जंतर-मंतर की ओर मुड़ गए। संसद पास थी, जगह छोटी थी और आने-जाने के रास्ते गिने-चुने थे, इसलिए पुलिस को भीड़ पर नज़र रखना आसान लगा। 1993 के आसपास यह बिना किसी लिखित अधिसूचना के प्रदर्शन-स्थल बन गया। इसे सरकारी काग़ज़ों में पहचान अप्रैल 2022 के पुलिस आदेश से मिली। धरने आम तौर पर जंतर-मंतर रोड पर होते थे, स्मारक के भीतर नहीं।
यहां हुए प्रमुख आंदोलन
2011, अन्ना का अनशन: 5 अप्रैल 2011 को अन्ना हज़ारे ने सख़्त जन लोकपाल क़ानून की मांग पर अनशन शुरू किया। देखते-देखते यह पूरे देश में भ्रष्टाचार-विरोधी लहर बन गया। अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण जैसे लोग इसी दौर में उभरे, और आगे चलकर आम आदमी पार्टी बनने की ज़मीन भी यहीं से तैयार हुई।
2012, निर्भया कांड: दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उसकी मौत के बाद लोग महिला सुरक्षा के सवाल पर यहां उमड़ पड़े।
2014, निडो तानिया की मौत: अरुणाचल के छात्र निडो तानिया की मौत के बाद नस्लीय भेदभाव के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए।
2015, वन रैंक वन पेंशन: पूर्व सैनिकों ने पेंशन की बराबरी की मांग पर लंबा धरना दिया।
2017, तमिलनाडु के किसान: सूखे से बेहाल किसानों ने 40 दिन तक यहां डेरा डाला। उनकी मांगें थीं सूखा राहत, कर्ज़माफ़ी और कावेरी प्रबंधन बोर्ड का गठन।
2019, नागरिकता क़ानून का विरोध: लाल क़िले और मंडी हाउस पर निषेधाज्ञा लगी होने से बड़ी संख्या में लोग जंतर-मंतर पहुंचे। भारी बैरिकेडिंग के बीच मेट्रो के कई स्टेशन बंद करने पड़े और शहर में जाम लग गया।
2020, कोरोना काल: महामारी के दौरान यहां जमावड़ों पर रोक रही। आशा कार्यकर्ताओं और ट्रेड यूनियनों के बिना अनुमति धरने पर मुक़दमा दर्ज हुआ। हाथरस कांड के विरोध में जुटे लोगों पर भी निषेधाज्ञा तोड़ने का केस बना।
2023, पहलवानों का धरना: विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया जैसे नामी पहलवान कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न के आरोपों पर कार्रवाई की मांग लेकर बैठे। मामला देश-दुनिया में चर्चा में रहा।
2026, पेपर लीक के ख़िलाफ़ छात्र आंदोलन: इस साल जून से नीट-यूजी पेपर लीक पर कॉकरोच जनता पार्टी की अगुवाई में युवाओं के प्रदर्शन चले। इन्हीं के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा।
यह जगह पहले भी निशाने पर रही
जंतर-मंतर पर रोक की कोशिश नई नहीं है। अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने यहां सभी धरनों पर पाबंदी लगा दी थी और आंदोलनकारियों को रामलीला मैदान जाने को कहा था। उसने शोर, गंदगी और इलाक़े के रिहायशी दर्जे को वजह बताया था।
जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को पलट दिया। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, पर उसे आसपास रहने वालों के हक़ के साथ तौलना होगा। उसने यह भी साफ़ किया कि कोई अपनी पसंद की किसी भी जगह पर धरना देने का असीमित हक़ नहीं रखता। सरकार जगह और शर्तें तय कर सकती है, बशर्ते कानून के दायरे में रहे।
अब यहां प्रदर्शन क्यों नहीं होंगे
आदेश में कारण के रूप में केवल समिति की सिफ़ारिश बताई गई है। विस्तृत वजहें आधिकारिक रूप से नहीं रखी गईं। मौजूदा हालात और पुरानी शिकायतों से तीन बातें उभरती हैं।
पहली बात, वक़्त। यह फ़ैसला उस समय आया जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित गड़बड़ियों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग उठ रही थी। कॉकरोच जनता पार्टी, कांग्रेस, इंडिया गठबंधन के दल और छात्र संगठन जंतर-मंतर की ओर कूच की तैयारी में थे। 10 और 11 अक्टूबर को सैकड़ों लोग सड़कों पर उतरे थे।
दूसरी बात, रोज़मर्रा की परेशानी। बड़े धरने वाले दिन पुलिस पूरी सड़क बंद कर देती है। आसपास के लोगों को अपनी गाड़ियां दूर खड़ी करके पैदल घर पहुंचना पड़ता है। भीड़ संभालना और यातायात चलाना भी बड़ी चुनौती रहता है।
तीसरी बात, राजनीति का आरोप। सत्ताधारी पक्ष के कुछ नेता पहले कह चुके हैं कि कुछ प्रदर्शनों का मक़सद जनता के मुद्दे उठाना नहीं, बल्कि संसद का काम बाधित करना है। विपक्ष इसे असहमति की आवाज़ दबाने की कोशिश बताता है।
विरोध और अदालत की दहलीज़
आंदोलनकारी इस फ़ैसले से नाराज़ हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के सह-संयोजक सौरव दास ने इसे “अस्वीकार्य” और “मनमाना” कहा। उनका सवाल था कि क्या आम लोगों और संगठनों से राय ली गई। दास ने यह भी कहा कि अब पूरा देश ही जंतर-मंतर बन जाएगा।
आलोचक दूरी का मुद्दा भी उठा रहे हैं। सीबीडी ग्राउंड जंतर-मंतर से करीब 12 किलोमीटर और बुराड़ी ग्राउंड करीब 21 किलोमीटर दूर है। संसद के पास होने से जो दबाव बनता था, वह इतनी दूर शायद न बन पाए।
मामला अदालत पहुंच चुका है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर बंद किए जाने के ख़िलाफ़ दायर याचिका सुनने की बात कही। साथ ही यह भी दर्ज किया कि सुप्रीम कोर्ट पहले से इस मुद्दे को देख रहा है और केंद्र से हलफ़नामा मांग चुका है। यूथ कांग्रेस ने भी जंतर-मंतर पर धरने की इजाज़त न मिलने को चुनौती दी है। इन सुनवाइयों में आगे क्या हुआ, यह ताज़ा ख़बरों में देखना बेहतर होगा।
At The End
सरकार का तर्क है कि बड़े मैदान देने से प्रदर्शन ज़्यादा व्यवस्थित होंगे और आम लोगों को कम दिक्कत होगी। विरोधियों का कहना है कि आवाज़ को सत्ता के केंद्र से दूर धकेल दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट की 2018 वाली कसौटी, यानी अधिकार और सुविधा के बीच संतुलन, अब नए इंतज़ाम की भी परीक्षा लेगी। फ़ैसला चाहे जो हो, जंतर-मंतर ने जो दौर देखा, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज रहेगा।

