जब फ़सल हमारे खेत में उगती है, तो फिर रसोई में तेल डालना इतना महंगा क्यों हो गया? एक जागरूक नागरिक, May 20, 2026May 20, 2026 सरसों उगाने वाला भूखा, तेल बेचने वाला मालामाल — आम आदमी की कमर टूटी | भारत की रसोई का सच सरसों उगाने वाला भूखा,तेल बेचने वाला मालामाल —और आम आदमी की कमर टूटी ₹180 प्रति लीटर — सरसों तेल की आज की कीमत। जबकि किसान को उसकी मेहनत का आधा भी नहीं मिलता। “जो उगाता है वह भूखा है, जो पेरता है वह मालामाल है, और जो खाता है वह कर्ज़दार है।” — यही है आज भारत की रसोई का सच। हर सुबह जब देश की करोड़ों घरो में चूल्हा जलता हैं और कड़ाई में तेल पड़ता है, तो यहाँ एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा सामने आता है जो तीन तरफ से लूट रही है — किसान को, उपभोक्ता को, और बीच में पाल रही है एक पूरी मुनाफाखोर मशीन को। सरसों का तेल ₹180 प्रति लीटर तक पहुँच गया है। Soybean oil भी पीछे नहीं। और यह तब है जब ये दोनों फ़सलें हमारे अपने खेतों में उगती हैं — राजस्थान में, मध्य प्रदेश में, हरियाणा में, महाराष्ट्र में। तो सवाल सीधा है: जब माल अपना है, खेत अपना है, फ़सल अपनी है — तो तेल इतना महंगा क्यों है? किसान से थाली तक — कीमत का सफ़र नीचे देखिए, एक किलो सरसों का दाम कैसे तीन गुना हो जाता है खेत से रसोई तक पहुँचते-पहुँचते: 👨🌾 किसान को मिला ~₹45–50/kg → 🧑💼 आढ़तिया / बिचौलिया मुनाफ़ा ₹10–15 → 🏭 तेल मिल / बड़ी कंपनी मुनाफ़ा ₹40–60 → 🏠 आम आदमी देता है ~₹170–180/L जिस किसान ने अपना खून-पसीना बहाकर सरसों उगाई, उसे मिले ₹45। जिसने बस मशीन में पेरा, उसने कमाए ₹100 से ज़्यादा। और जो रोज़ खाना बनाता है — वह आम इंसान — वह चुकाता है ₹180। सरसों तेल इतना महंगा क्यों है? असली कारण 01 बिचौलियों की लंबी कतार किसान से उपभोक्ता तक कम से कम 4–5 हाथ बदलता है माल। हर हाथ अपना मुनाफ़ा काटता है — और यह सारा बोझ गिरता है आम आदमी की जेब पर। 02 MSP मिलती है, लेकिन असर नहीं होता सरकार सरसों का MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) तय करती है — पर खुले बाज़ार में किसान को अक्सर उससे भी कम मिलता है। MSP का फ़ायदा किसान तक नहीं, बिचौलियों तक पहुँचता है। 03 बड़ी कंपनियों की मोनोपॉली खाद्य तेल का बाज़ार कुछ गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों के हाथ में है। ये कंपनियाँ दाम तय करती हैं, packaging में मुनाफ़ा लगाती हैं, और सरकार तमाशा देखती है। 04 Global Market का बहाना Palm oil के अंतरराष्ट्रीय दाम बढ़े? सारे खाद्य तेल महंगे हो गए — यहाँ तक कि सरसों भी, जो भारत में उगती है। यह तर्क हास्यास्पद है, लेकिन कंपनियाँ यही करती हैं। 05 Tax और GST का बोझ खाने के तेल पर भी टैक्स लगता है। यह सीधे उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है — जबकि यह रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ है, विलासिता नहीं। 06 Cold Storage और Supply Chain की कमी किसान के पास फ़सल रोककर रखने की सुविधा नहीं। वह कटाई के बाद तुरंत बेचता है — इसी मजबूरी का फ़ायदा उठाते हैं व्यापारी। Petrol तो समझ में आया — लेकिन सरसों? Petrol और diesel के महंगे होने पर सरकार कहती है — “हम import करते हैं, दुनिया में दाम बढ़े हैं।” ठीक है, इसे एक बार के लिए मान भी लेते हैं। हालाँकि यह भी पूरा सच नहीं है — भारत जिन देशों को तेल निर्यात करता है, वहाँ यह सस्ता है — लेकिन चलिए, वह बहस अलग है। लेकिन सरसों? Soybean? यह तो यहीं उगती है। हमारे किसान उगाते हैं। हमारी मिट्टी, हमारा पानी, हमारी मेहनत। तो फिर सरकार का जवाब क्या है? कोई जवाब नहीं है। क्योंकि जवाब देने की ज़रूरत किसी ने नहीं समझी। जिस देश का किसान दिन-रात खेत में जागता है, उसी देश में उसकी फ़सल का तेल उसकी पहुँच से बाहर हो जाए — यह विकास नहीं, विडंबना है। रसोई की महंगाई — असल में क्या टूट रहा है? सरसों का तेल daily use की चीज़ है। दिन में दो बार खाना बनता है। एक परिवार महीने में कम से कम 3–4 लीटर तेल इस्तेमाल करता है। यानी सिर्फ़ तेल पर ₹600–700 हर महीने। निम्न और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए यह छोटी रकम नहीं है। जब तेल महंगा होता है, तो थाली में सब्ज़ी कम होती है। जब सब्ज़ी कम होती है, तो बच्चों का पोषण कम होता है। महंगाई रसोई में नहीं रुकती — वह पूरे घर को तोड़ती है। ✦ सरकार से हमारे सवाल — और हमारी माँगें सरसों, soybean जैसे घरेलू उत्पादों के तेल पर price cap लागू किया जाए। किसान को directly उचित मूल्य मिले — MSP सिर्फ़ कागज़ पर नहीं, ज़मीन पर भी। बिचौलियों की मनमानी रोकने के लिए सख़्त नीति बने। खाद्य तेल को GST से पूरी तरह मुक्त किया जाए — यह ज़रूरत है, विलासिता नहीं। छोटे और स्थानीय तेल मिलों को बढ़ावा दिया जाए ताकि बड़ी कंपनियों की मोनोपॉली टूटे। Cold storage infrastructure किसानों के लिए सुलभ बनाया जाए। निष्कर्ष: यह आर्थिक सवाल नहीं, नैतिक सवाल है यह बहस सिर्फ़ तेल की कीमत की नहीं है। यह बहस इस बात की है कि एक न्यायपूर्ण समाज में उत्पादन का फल किसे मिलना चाहिए — उसे जिसने मेहनत की, या उसे जिसने बस बीच में खड़े होकर मुनाफ़ा काटा? जिस किसान ने सरसों उगाई — उसकी आँखों में उम्मीद थी कि इस बार दाम मिलेंगे। जिसने बस मशीन चलाई — उसने करोड़ों कमाए। जो रोज़ खाना बनाती है — वह सोच रही है कि इस महीने तेल का खर्च कैसे निकलेगा। यह व्यवस्था बदलनी चाहिए। और बदलाव की शुरुआत होती है — सवाल पूछने से। यह आवाज़ उठाते रहिए। यह सवाल पूछते रहिए। क्योंकि जब जनता चुप होती है, तो व्यवस्था और बेशर्म हो जाती है।