भारत में सवाल: अब मीडिया क्या करे पत्रकारिता या चाटुकारिता? Hindi News, September 30, 2025September 30, 2025 भारत में पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती है। लेकिन आज हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि सच बोलने वाले पत्रकारों के सामने खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। धमकियाँ, मुकदमे और संदिग्ध मौतें यह साबित करती हैं कि लोकतंत्र की यह रीढ़ अब दबाव में है। उत्तरकाशी की ताज़ा घटना हाल ही में उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले में एक स्थानीय पत्रकार का शव बरामद हुआ। वे कई दिनों से लापता थे और उनकी गाड़ी नदी किनारे मिली थी। मृत पत्रकार यूट्यूब चैनल के माध्यम से स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते थे। परिजनों का आरोप है कि उन्हें अपनी पत्रकारिता के कारण धमकियाँ मिल रही थीं और उनकी मौत सामान्य हादसा नहीं हो सकती। पुलिस जाँच कर रही है, लेकिन इस घटना ने एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्रकारिता या चाटुकारिता आज का सबसे बड़ा सवाल यही है कि मीडिया सच्चाई दिखाएगा या सत्ता के साथ खड़े होकर सिर्फ चाटुकारिता करेगा। पत्रकारिता का उद्देश्य है जनता के मुद्दे उठाना और सच्चाई उजागर करना।जबकि चाटुकारिता का मतलब है सिर्फ सत्ता या प्रभावशाली लोगों की तारीफ़ करना और उनकी कमियों को छुपाना।जब पत्रकारिता चाटुकारिता में बदलने लगती है, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर हो जाती है और जनता तक सही जानकारी नहीं पहुँच पाती। पहले भी हुए हमले भारत में पत्रकारों पर हमले कोई नई बात नहीं है। 2017 में बेंगलुरु की वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई।2018 में कश्मीर में शुजात बुखारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई।2002 में हरियाणा में रामचंद्र छत्रपति की हत्या हुई, जिन्होंने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख के खिलाफ रिपोर्टिंग की थी। ये घटनाएँ बताती हैं कि सच बोलने वाले पत्रकारों की ज़िंदगी कितनी असुरक्षित है। रिपोर्ट्स और रैंकिंग अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा जारी प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में भारत की स्थिति लगातार गिर रही है। इसका कारण पत्रकारों पर हमले, धमकियाँ और स्वतंत्र रिपोर्टिंग में बाधाएँ बताई गई हैं। समाज और सरकार की जिम्मेदारी अगर पत्रकार सच नहीं बोल पाएंगे तो जनता तक सही सूचना कभी नहीं पहुँच पाएगी। सरकार को चाहिए कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ठोस क़ानून बनाए।प्रशासन और पुलिस को धमकियों और हमलों के मामलों पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।मीडिया संस्थानों को भी चाटुकारिता छोड़कर निष्पक्ष पत्रकारिता का संकल्प लेना होगा। क्या भारत में सचमुच चाटुकारिता हो रही है? हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि कई बड़े मीडिया संस्थान सत्ता और ताक़तवर वर्गों के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। वे सरकार की नीतियों और कामों की आलोचना करने के बजाय उनकी तारीफ़ में ही ख़बरें दिखाते हैं। इससे जनता तक केवल आधी-अधूरी जानकारी पहुँचती है और असल मुद्दे दब जाते हैं। चाटुकारिता तब और खतरनाक हो जाती है जब मीडिया भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी बुनियादी समस्याओं को छोड़कर केवल सत्ता की उपलब्धियों का महिमामंडन करने लगे। नतीजा यह होता है कि आम जनता के सवाल पीछे छूट जाते हैं और लोकतंत्र का असली उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच यह है कि जहाँ पत्रकारिता जनता की आवाज़ होती है, वहीं चाटुकारिता केवल सत्ता की प्रतिध्वनि बनकर रह जाती है। उत्तरकाशी की घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भारत में पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य पर टिकी रहेगी या फिर चाटुकारिता का शिकार हो जाएगी। सच बोलना पत्रकार का कर्तव्य है, लेकिन अगर सच बोलने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हुई तो लोकतंत्र की नींव ही हिल सकती है। Uttarkashi: उत्तरकाशी में पत्रकार राजीव प्रताप का शव मिला: परिवार और पत्रकारिता जगत में शोक Facts Information News Article