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भारत में क्लाइमेट चेंज सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए लेकिन है नहीं

भारत में क्लाइमेट चेंज: यह सबसे बड़ा मुद्दा क्यों होना चाहिए और इस पर चर्चा क्यों कम होती है

Hindi News, November 3, 2025November 3, 2025

भारत आज विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसी सफर के बीच एक ऐसा खतरा खड़ा है जो धीरे-धीरे हमारे भविष्य को कमज़ोर कर सकता है — जलवायु परिवर्तन। बदलते मौसम, तेज़ गर्मी, अनियमित बारिश, बाढ़, सूखा, ग्लेशियर पिघलना, और प्रदूषण जैसी समस्याएं हमारे सामने खड़ी हैं। यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का सवाल है। यही कारण है कि भारत के लिए क्लाइमेट चेंज पर बात करना और इसके समाधान ढूँढना बेहद ज़रूरी है।

भारत में क्लाइमेट चेंज के गंभीर प्रभाव

हमारे देश में जलवायु परिवर्तन का असर सीधा महसूस किया जा सकता है। हर साल तापमान का रिकॉर्ड टूट रहा है और कई राज्यों में गर्मी जानलेवा साबित हो रही है। अनियमित मानसून के कारण कभी भारी बारिश से बाढ़ आती है तो कभी लंबे समय तक सूखे की स्थिति बन जाती है। यह कृषि व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित करता है और किसानों की मेहनत पर पानी फेर देता है। पानी का संकट बढ़ रहा है और शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक साफ पेयजल पाना मुश्किल होता जा रहा है। इसके साथ ही प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, जिससे बच्चों में भी सांस और फेफड़ों की बीमारियाँ आम हो गई हैं।

यह साफ संकेत हैं कि अगर अब भी हम सतर्क नहीं हुए तो आने वाले वर्षों में खाद्य संकट, पानी की कमी और स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियाँ और गंभीर हो सकती हैं।

फिर भारत में इस पर चर्चा इतनी कम क्यों होती है?

भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी रोजमर्रा की समस्याओं से जूझता है। आम लोगों के लिए नौकरी, महंगाई, बिजली-पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी चीजें पहले आती हैं, इसलिए क्लाइमेट चेंज उनकी प्राथमिकता में पीछे चला जाता है। इसके अलावा इस विषय पर जागरूकता अभी भी सीमित है। कई लोग यह नहीं समझते कि जलवायु परिवर्तन उनके जीवन को कैसे प्रभावित कर रहा है।

मीडिया में भी राजनीति, विवाद और रियलिटी शो जैसी चीज़ों को ज्यादा जगह दी जाती है। जलवायु जैसे गंभीर मुद्दों को कम महत्व दिया जाता है क्योंकि उनमें उतनी ‘चर्चा’ या ‘टीआरपी’ नहीं मिलती। लोग यह भी मान लेते हैं कि यह भविष्य की समस्या है, जबकि यह आज की सच्चाई है। एक और बड़ी बात यह है कि अक्सर माना जाता है कि प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के लिए बड़े देश जिम्मेदार हैं, इसलिए वे ही समाधान दें। यह सोच हमें अपनी जिम्मेदारी से दूर कर देती है।

हमें क्या करना चाहिए?

हमें अपनी सोच और नीति दोनों में बदलाव लाने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन को समझना और इस पर बात बढ़ाना सबसे पहला कदम है। स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा को मजबूत करना, मीडिया में इस विषय को जगह देना और सरकारों से स्पष्ट नीतियाँ और कदमों की मांग करना हमारी जिम्मेदारी है।

साथ ही कुछ चीजें हम सभी व्यक्तिगत स्तर पर भी कर सकते हैं:

  • पानी और बिजली की बचत
  • प्लास्टिक का कम उपयोग
  • पेड़ लगाना और पौधों की देखभाल
  • गाड़ियों का सीमित उपयोग और सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा
  • बच्चों और परिवार को प्रकृति का महत्व समझाना

छोटे-छोटे प्रयास ही मिलकर बदलाव की नींव रखते हैं।

आगे का रास्ता

यह समय सोचना, समझना और कदम उठाने का है। भारत युवाओं का देश है और यदि युवा पीढ़ी इस मुद्दे को गंभीरता से ले, तो बदलाव निश्चित है। बात सिर्फ पर्यावरण बचाने की नहीं है, बात जीवन की गुणवत्ता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है। देश तभी आगे बढ़ेगा जब हम ऐसी प्रगति करेंगे जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले।

क्लाइमेट चेंज के विषय पर बातचीत बढ़ाना, समाधान खोजने में भाग लेना और अपनी आदतों में बदलाव लाना—यही असली विकास है। क्योंकि सुरक्षित भविष्य वही है जहाँ प्रकृति और मानव दोनों स्वस्थ हों।

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