सुबह का समय है। एक चाय की दुकान पर कुछ लोग खड़े हैं। किसी के हाथ में अख़बार है, किसी के मोबाइल में न्यूज़ चल रही है। एक आदमी कहता है,
“इतिहास की गलती थी, उसी का असर आज तक चल रहा है।”
दूसरा जवाब देता है,
“अरे भाई, मेरा बेटा दो साल से नौकरी ढूंढ रहा है, उसका इतिहास से क्या लेना-देना?”
यही सीन आज भारत के हर मोहल्ले, हर चौराहे पर दिख जाता है।
जब मुद्दे बदल जाते हैं
मान लीजिए किसी शहर में बेरोज़गारी बढ़ रही है। सरकारी दफ़्तरों के बाहर फ़ॉर्म भरते युवाओं की लाइन लगी है। वहीं दूसरी तरफ़ टीवी डिबेट में चर्चा चल रही है—किस शासक ने सैकड़ों साल पहले क्या किया था। सवाल यह नहीं कि इतिहास क्यों पढ़ाया जा रहा है, सवाल यह है कि आज के सवालों से ध्यान क्यों हटाया जा रहा है।
आम आदमी की मजबूरी
एक प्राइवेट स्कूल की टीचर है, महीने की सैलरी 12–15 हज़ार। हर साल फ़ीस बढ़ती है, गैस महंगी होती है, किराया बढ़ता है। जब वह न्यूज़ देखती है और वहाँ इतिहास की बहस चल रही होती है, तो उसके लिए वह बहस बेमतलब लगती है। उसे जानना है—
“मेरी सैलरी क्यों नहीं बढ़ रही?”
“मेरे बच्चों की पढ़ाई इतनी महंगी क्यों है?”
नेताओं के भाषण और ज़मीन की हक़ीक़त
चुनाव के समय बड़े-बड़े मंचों से भाषण होते हैं। इतिहास की बातें जोश पैदा करती हैं, तालियाँ बजती हैं। लेकिन उसी भीड़ में खड़ा एक किसान सोच रहा होता है—
“मेरी फसल का दाम इस बार भी सही नहीं मिला।”
तालियाँ खत्म हो जाती हैं, भाषण खत्म हो जाता है, लेकिन किसान की परेशानी वहीं की वहीं रहती है।
सोशल मीडिया का असर
व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया पर पुराने वीडियो, पुराने किस्से, अधूरे सच तेज़ी से फैलते हैं। लोग आपस में बहस करते हैं, रिश्तों में भी कड़वाहट आ जाती है। लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि
“आज हमारे शहर में अस्पताल की हालत कैसी है?”
“स्कूलों में टीचर पूरे हैं या नहीं?”
असली सवाल क्या होने चाहिए?
इतिहास से सीख ज़रूरी है, लेकिन ज़िंदगी अतीत में नहीं, वर्तमान में जी जाती है। आज का युवा नौकरी चाहता है, आज की माँ सस्ती दवा चाहती है, आज का किसान अपनी मेहनत का सही दाम चाहता है।
जब तक राजनीति इतिहास की आड़ में आज की सच्चाई से बचती रहेगी, तब तक चाय की दुकान से लेकर संसद तक बहसें चलती रहेंगी—
और आम आदमी के सवाल जवाब का इंतज़ार करते रहेंगे।
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