भारत का बड़ा फैसला: काबुल में फिर से खुलेगा भारतीय दूतावास Hindi News, October 11, 2025October 11, 2025 भारत ने एक अहम राजनयिक कदम उठाते हुए घोषणा की है कि वह अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अपना दूतावास दोबारा शुरू करेगा। यह वही दूतावास है जिसे 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद सुरक्षा कारणों से बंद कर दिया गया था। अब भारत ने संकेत दिए हैं कि काबुल में मौजूद तकनीकी मिशन को पूर्ण दूतावास में तब्दील किया जाएगा। तालिबान के साथ बदलते रिश्तों की तस्वीर जब 2021 में तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता संभाली थी, तब भारत ने अपने सभी राजनयिकों को वापस बुला लिया था। लेकिन पिछले दो सालों में हालात धीरे-धीरे बदलते दिखे हैं। भारत ने पहले मानवीय सहायता के नाम पर गेहूं, दवाइयां और अन्य राहत सामग्री अफगानिस्तान भेजी, और अब दूतावास खोलने का निर्णय यह दिखाता है कि भारत तालिबान शासन के साथ सीमित स्तर पर राजनयिक संवाद शुरू करने के लिए तैयार है। भारत का मकसद: सुरक्षा, स्थिरता और रणनीति भारत की इस पहल के पीछे कई उद्देश्य हैं। सबसे पहले, भारत अफगानिस्तान में अपने विकास परियोजनाओं को दोबारा शुरू करना चाहता है, जिन्हें तालिबान शासन के दौरान रोकना पड़ा था। दूसरा, अफगानिस्तान भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है, क्योंकि यह पाकिस्तान और चीन के बीच स्थित है।इसके अलावा, भारत को इस बात की चिंता भी है कि अफगानिस्तान की अस्थिरता कहीं उसके पड़ोसी क्षेत्रों में आतंकवाद को फिर से न बढ़ा दे। इसलिए दूतावास का दोबारा खुलना सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें भारत पर भारत का यह कदम सिर्फ दक्षिण एशिया ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा संकेत है। जहाँ अधिकांश देश अब भी तालिबान को औपचारिक मान्यता देने से हिचकिचा रहे हैं, वहीं भारत का यह निर्णय यह दिखाता है कि नई दिल्ली व्यावहारिक कूटनीति की राह पर चल रही है।कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत का यह फैसला अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों के साथ उसके संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि अफगानिस्तान इन सभी के लिए एक अहम भूराजनीतिक बिंदु है। क्या यह तालिबान को अप्रत्यक्ष मान्यता है? यह सवाल अब हर जगह उठ रहा है — क्या भारत का दूतावास फिर से खोलना तालिबान सरकार को मान्यता देने जैसा कदम है?हालाँकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने अभी तक इसे “राजनयिक सुविधा” बताया है, न कि “राजनीतिक मान्यता।” मंत्रालय का कहना है कि भारत का उद्देश्य केवल अफगान जनता की सहायता करना है, न कि किसी सरकार को वैध ठहराना। आम जनता की राय सोशल मीडिया पर इस खबर को लेकर लोगों की मिश्रित प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं। कुछ का मानना है कि यह भारत की परिपक्व कूटनीति का उदाहरण है, जबकि अन्य इसे तालिबान को अप्रत्यक्ष स्वीकृति देने के रूप में देख रहे हैं।फिलहाल, इस कदम से इतना तो तय है कि भारत एक बार फिर अफगान राजनीति के केंद्र में लौट आया है — और आने वाले दिनों में इसका असर पूरे क्षेत्रीय संतुलन पर दिखेगा। अफ़ग़ान तालिबान के विदेश मंत्री की भारत यात्रा: रिश्तों में नई शुरुआत या रणनीतिक सावधानी News Article