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अमेरिका के टैरिफ और भारत की अर्थव्यवस्था

अमेरिका के टैरिफ और भारत की अर्थव्यवस्था: दक्षिण एशिया की वृद्धि पर मंडराता खतरा

Hindi News, October 8, 2025October 8, 2025

वैश्विक व्यापार की दुनिया में टैरिफ और शुल्क केवल आर्थिक हथियार नहीं होते, बल्कि वे देशों के बीच शक्ति संतुलन और भू-राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित करते हैं। हाल ही में विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए नए टैरिफ भारत के निर्यात पर गंभीर असर डाल सकते हैं। इसका सीधा प्रभाव न केवल भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की विकास दर भी इससे धीमी पड़ सकती है।

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और निर्यात उसके विकास इंजन का अहम हिस्सा है। लेकिन यदि निर्यात घटता है तो उत्पादन, रोज़गार और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा। यह चिंता सिर्फ भारत की नहीं है, बल्कि बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की भी है, जिनकी अर्थव्यवस्थाएँ भारत के साथ गहराई से जुड़ी हुई हैं।

अमेरिका के टैरिफ का प्रभाव

अमेरिका भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाएँ और कृषि उत्पाद जैसे क्षेत्रों में भारत को अमेरिकी बाज़ार से बड़ा लाभ मिलता है। लेकिन टैरिफ बढ़ने का मतलब है कि भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाज़ार में महंगे हो जाएंगे। इससे उनकी प्रतिस्पर्धा घटेगी और निर्यातकों की आय पर सीधा असर पड़ेगा।

विश्व बैंक का अनुमान है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो अगले वित्त वर्ष में दक्षिण एशिया की समग्र वृद्धि दर 6% से नीचे जा सकती है। भारत में खासकर छोटे और मध्यम उद्योग (MSME) सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि उनका व्यवसाय अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों पर काफी हद तक निर्भर है।

दक्षिण एशिया की वृद्धि पर असर

भारत दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। यदि भारत की वृद्धि दर धीमी होती है, तो इसका प्रभाव क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं और व्यापारिक साझेदारों पर भी पड़ेगा। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश के वस्त्र उद्योग को भारत से कच्चा माल मिलता है। अगर भारत का निर्यात प्रभावित हुआ, तो बांग्लादेशी उद्योगों पर भी दबाव बढ़ेगा।

श्रीलंका और नेपाल, जो भारत पर आयात और व्यापार के लिए निर्भर हैं, उन्हें भी महंगाई और आपूर्ति संकट का सामना करना पड़ सकता है। इस तरह से एक देश की समस्या पूरे क्षेत्रीय विकास को धीमा कर सकती है।

भारतीय सरकार के विकल्प

भारतीय सरकार के सामने अब चुनौती यह है कि वह इस संकट से निपटने के लिए किस तरह की रणनीति अपनाए। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने निर्यात बाज़ारों को विविध बनाना होगा। यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे नए बाज़ारों पर ध्यान केंद्रित कर निर्यातकों के लिए विकल्प तैयार करना ज़रूरी है।

इसके अलावा घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने, तकनीकी सुधार लाने और व्यापारिक समझौतों को मजबूत करने पर भी काम करना होगा। अगर भारत दीर्घकालिक रणनीति अपनाए, तो वह इस चुनौती को अवसर में बदल सकता है।

Note :

अमेरिका के टैरिफ भले ही भारत के लिए एक झटका हों, लेकिन यह समय भारत और दक्षिण एशिया के लिए अपनी आर्थिक नीतियों की समीक्षा करने का भी है। व्यापारिक विविधता, क्षेत्रीय सहयोग और नवाचार के ज़रिए इस संकट को कम किया जा सकता है। दुनिया की बदलती आर्थिक परिस्थितियाँ हमें यह याद दिलाती हैं कि किसी एक बाज़ार पर अत्यधिक निर्भरता लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।

भारत के लिए यह पल कठिनाई भी है और अवसर भी। यदि सही कदम उठाए गए, तो यह संकट न केवल टल सकता है, बल्कि भारत और दक्षिण एशिया को और मजबूत बना सकता है।

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