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दिल्ली देहरादून एक्सप्रेसवे गड्ढे

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे में सिर्फ 79 दिन में गड्ढे — ₹12,000 करोड़ गए कहां?

Laxmi Nautiyal, July 6, 2026July 6, 2026

दिल्ली से देहरादून के सफ़र को महज़ ढाई घंटे में समेटने का वादा करने वाली एक्सप्रेसवे, जिसे “world-class” इंफ्रास्ट्रक्चर कहा जा रहा था, बारिश की पहली ही बौछार में अपनी असलियत दिखा गई। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में शामली (उत्तर प्रदेश) के पास इस एक्सप्रेसवे पर इतने गहरे गड्ढे नज़र आए कि गाड़ियों के टायर और रिम तक डैमेज हो गए। सवाल सीधा है — जिस प्रोजेक्ट पर करीब ₹12,000 करोड़ रुपये खर्च हुए, वो पहली मानसून बारिश भी झेल नहीं पाया, तो आख़िर इतनी बड़ी रकम गई कहाँ?

प्रोजेक्ट का उद्घाटन और फिर 79 दिन में ही पोल खुल गई

इस 210 किलोमीटर लंबी, छह-लेन एक्सप्रेसवे का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल 2026 को किया था। दावा था कि दिल्ली से देहरादून का सफ़र जो पहले करीब छह घंटे का होता था, अब सिर्फ दो-ढाई घंटे में पूरा हो जाएगा। लेकिन उद्घाटन के महज़ 79 दिन बाद, जब इस साल की पहली भारी मानसून बारिश हुई, तो शामली ज़िले के हाथी करोड़ा गांव के पास सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे बन गए और एक हिस्सा धंस भी गया।

ज़रूरी फैक्ट्स:
प्रोजेक्ट लागत: करीब ₹12,000 करोड़
उद्घाटन: 14 अप्रैल 2026
गड्ढे नज़र आए: उद्घाटन के 79 दिन बाद
जगह: हाथी करोड़ा गांव, शामली, उत्तर प्रदेश

NHAI और सरकार का क्या कहना है?

National Highways Authority of India (NHAI) ने इस डैमेज की वजह पानी का जमाव बताया, ना कि सड़क की स्ट्रक्चरल कमज़ोरी। उनका कहना है कि ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह तैयार नहीं था और slope protection का काम भी बाकी था। कुछ रिपोर्ट्स में तो NHAI ने स्थानीय लोगों को भी ज़िम्मेदार ठहराया, हालांकि इस पर लोगों ने काफ़ी नाराज़गी जताई।

NHAI का कहना है — अस्थायी उपाय के तौर पर करीब डेढ़ किलोमीटर लंबी पैरेलल ड्रेन बनाई जा रही है और ड्रेनेज ग्रेडिएंट को फिर से डिज़ाइन किया जा रहा है, ताकि स्थायी सिस्टम बनने तक बारिश का पानी सुरक्षित तरीक़े से निकल सके।

वहीं कांग्रेस पार्टी ने इसे सीधे भ्रष्टाचार और फंड की हेराफेरी बताया, और कहा कि देश भर में पुल, सड़कें, हाईवे और रेलवे स्टेशन तक बार-बार गिर रहे हैं। सोशल मीडिया पर केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को टैग करके जांच की मांग भी की जा रही है।

यह सिर्फ एक एक्सप्रेसवे की बात नहीं है

असली चिंता की बात ये है कि ऐसा सिर्फ दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के साथ नहीं हुआ। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर गुजरात के अंकलेश्वर में आठ फ़ीट चौड़ा गड्ढा दिखा, राजस्थान के सवाई माधोपुर में भी सड़क डैमेज हुई, और 5 जुलाई को उन्नाव ज़िले में कानपुर-लखनऊ हाईवे को गंगा एक्सप्रेसवे से जोड़ने वाली एक लिंक रोड पहली बारिश में ही धंस गई। द्वारका एक्सप्रेसवे पर भी सर्विस रोड बार-बार उखड़ने की शिकायतें आ चुकी हैं।

पैटर्न पर ध्यान दीजिए:
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे — गुजरात व राजस्थान में गड्ढे
गंगा एक्सप्रेसवे से जुड़ी लिंक रोड — उन्नाव में धंसी (5 जुलाई 2026)
द्वारका एक्सप्रेसवे — लिंक रोड में कटाव
सभी घटनाएं — इसी साल की पहली मानसून बारिश में

जब एक के बाद एक, देश की सबसे महंगी और सबसे ज़्यादा प्रचारित एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट्स पहली ही बारिश में दरकने लगें, तो यह सवाल उठना लाज़मी है — क्या क्वालिटी चेक सिर्फ काग़ज़ों पर हो रहे हैं? क्या तय समय में प्रोजेक्ट पूरा दिखाने की जल्दी में टिकाऊपन को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है?

आम आदमी के पैसे का हिसाब कौन देगा?

यह पैसा टैक्सपेयर्स का है — आपका और हमारा। जब सरकार करोड़ों रुपये किसी प्रोजेक्ट पर खर्च करने का दावा करती है और उसे “गेम-चेंजर” बताकर उद्घाटन करती है, तो जवाबदेही भी उसी सरकार की बनती है। सिर्फ मरम्मत करके मामला रफ़ा-दफ़ा कर देना काफ़ी नहीं है। असली सवाल यह है कि निर्माण के दौरान क्वालिटी ऑडिट किसने किया, ठेकेदार की जवाबदेही तय क्यों नहीं हुई, और आगे ऐसी घटनाएं रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।

जागरूक नागरिक के तौर पर हम क्या मांग सकते हैं:
हर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की स्वतंत्र थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट होनी चाहिए।
ठेकेदार और अधिकारियों की ज़िम्मेदारी सार्वजनिक रूप से तय हो।
प्रोजेक्ट पूरा दिखाने की जल्दी के बजाय टिकाऊपन को प्राथमिकता मिले।
जनता को पारदर्शी रिपोर्ट मिले कि पैसा कहां और कैसे खर्च हुआ।

यह कोई विपक्ष बनाम सरकार की बहस भर नहीं है। यह हर उस नागरिक का सवाल है जो टैक्स देता है और उम्मीद करता है कि जो पैसा विकास के नाम पर खर्च हो रहा है, वो सच में टिकाऊ और सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए — ना कि सिर्फ उद्घाटन के फ़ोटो और हेडलाइंस के लिए।

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