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छात्रों की गूंज महारैली कोटा में राहुल गांधी ने NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल

छात्रों की गूंज महारैली: कोटा में राहुल गांधी ने NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल

Laxmi Nautiyal, June 19, 2026June 19, 2026

17 जून 2026 को राजस्थान के कोटा शहर में कुछ अलग ही हुआ। देश की सबसे बड़ी कोचिंग नगरी में लाखों छात्रों की पीड़ा एक मंच पर इकट्ठा हुई — और उस मंच का नाम था “छात्रों की गूंज महारैली।” लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कोटा के दशहरा मैदान, श्रीराम रंगमंच में यह कार्यक्रम किया। यह कोई साधारण रैली नहीं थी — राहुल गांधी ने खुद अपने भाषण की शुरुआत में साफ़ कहा कि यह कोई राजनीतिक सभा नहीं है, यह छात्रों के भविष्य के बारे में बात करने का मौका है।

कोटा को क्यों चुना गया?

कोटा भारत का सबसे बड़ा कोचिंग हब है। यहाँ करीब 1.2 लाख छात्र NEET और JEE की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन यही शहर पिछले कुछ सालों से छात्र आत्महत्याओं, मानसिक तनाव और कोचिंग संस्थानों की मनमानी फीस के लिए भी खबरों में रहता है। कोटा से इस अभियान की शुरुआत करने का सीधा मतलब था — उस दर्द के केंद्र में जाना, जहाँ से असली सवाल जन्म लेते हैं।

📊 एक चौंकाने वाला आँकड़ा — जो सोचने पर मजबूर करे NEET, JEE, SSC, UPSC और RRB — इन सिर्फ 5 परीक्षाओं की तैयारी पर छात्र और उनके परिवार हर साल करीब ₹3.5 लाख करोड़ खर्च करते हैं। यह रकम भारत सरकार के पूरे शिक्षा बजट का लगभग तीन गुना है।

रैली में क्या हुआ?

इस कार्यक्रम में देशभर के छात्र कोटा पहुँचे। मंच पर पाँच छात्रों को बुलाया गया — तीन लड़कियाँ और दो लड़के — जो NEET, JEE और सिविल सेवा की तैयारी कर रहे हैं। राहुल गांधी ने उनसे सीधा संवाद किया और उनकी परेशानियाँ सुनीं। पेपर लीक, परीक्षाओं में धांधली, बढ़ती फीस और सरकारी भर्तियों में देरी — हर मुद्दे पर खुलकर बात हुई।

इसी दौरान राहुल गांधी ने एक छात्रा के सुसाइड नोट का ज़िक्र किया, जिसमें उसने लिखा था कि उसने सब कुछ बर्बाद कर दिया। इस बात को सुनाते हुए राहुल गांधी भावुक हो गए और कहा कि यह किसी एक बच्ची की त्रासदी नहीं, पूरी व्यवस्था की नाकामी है।

“भारत की शिक्षा व्यवस्था एक वसूली तंत्र बन गई है। यह बच्चों पर दबाव डालती है, उन्हें कुचलती है — यह देश के लिए सही नहीं है। हम एक ऐसा सिस्टम चाहते हैं जो आपको बड़े सपने देखने दे।” — राहुल गांधी, कोटा, 17 जून 2026

उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था एक “रिजेक्शन सिस्टम” है, “सेलेक्शन सिस्टम” नहीं। सरकार का पूरा ध्यान यह तय करने पर है कि कितने बच्चों को बाहर किया जाए — न कि यह कि कितने बच्चों को अवसर दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि सिस्टम छात्रों को सिर्फ इंजीनियरिंग, मेडिकल और सिविल सेवा की तरफ धकेलता है, जबकि दूसरे करियर विकल्पों को हतोत्साहित किया जाता है।

अभियान का मकसद क्या है?

“छात्रों की गूंज” कांग्रेस का एक राष्ट्रव्यापी अभियान है, जिसकी शुरुआत कोटा से हुई है। इसमें NSUI और यूथ कांग्रेस जैसे संगठन भी शामिल हैं। कोटा इस अभियान का पहला पड़ाव है — इसके बाद 10 जुलाई को प्रयागराज, 11 जुलाई को पटना और 14 जुलाई को दिल्ली में भी इसी तरह के कार्यक्रम होने हैं।

🎯 “छात्रों की गूंज” अभियान की मुख्य माँगें: १. परीक्षाओं में पारदर्शिता — पेपर लीक और धांधली पर कड़ी कार्रवाई हो
२. शिक्षा को सस्ता बनाना — कोचिंग और कॉलेज फीस पर सरकारी नियंत्रण जरूरी
३. भर्तियाँ पूरी करना — सरकारी नौकरियों की अधूरी भर्तियाँ जल्द से जल्द भरी जाएँ
४. करियर के विकल्प — सिर्फ NEET-JEE नहीं, हर क्षेत्र में युवाओं को अवसर मिले

BJP की प्रतिक्रिया

भाजपा ने इस पूरे आयोजन को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया। भाजपा प्रवक्ता ने सवाल उठाया कि 21 जून को NEET री-परीक्षा होने से ठीक पहले यह कार्यक्रम क्यों? उनका कहना था कि इससे परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों का ध्यान भटकेगा। रैली से पहले कोटा में कांग्रेस के पोस्टर-बैनर भी हटाए गए, जिस पर कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर डर और दबाव बनाने का आरोप लगाया।

लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है — अगर व्यवस्था सच में ठीक होती, तो छात्रों को किसी मंच की ज़रूरत ही क्यों पड़ती? पेपर लीक की घटनाएँ, रद्द होती परीक्षाएँ, बार-बार बदलते नियम — इन सबके बीच एक छात्र अपने भविष्य को लेकर क्या सोचे? यह सवाल राजनीतिक नहीं, बुनियादी है।

आगे क्या?

18 जून को राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए देशभर के छात्रों से इस अभियान से जुड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि “छात्रों की गूंज” सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हर उस परिवार की आवाज़ है जिसने अपने बच्चे के सपने के लिए जीवनभर की कमाई लगा दी। यह अभियान आगे बढ़ेगा या नहीं — यह तो वक्त तय करेगा। लेकिन कोटा से उठी इस गूंज ने एक सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया है जिसका जवाब सरकार को देना ही होगा — क्या इस देश में मेहनत का फल मिलता है, या सिर्फ सपने देखने की सज़ा?

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