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सोनम वांगचुक आज़ाद — 170 दिन बाद जेल से बाहर, लेकिन सवाल अभी भी कैद हैं

सोनम वांगचुक आज़ाद — 170 दिन बाद जेल से बाहर, लेकिन सवाल अभी भी कैद हैं

एक जागरूक नागरिक, March 17, 2026March 17, 2026

NSA लगाया, फिर हटाया — क्या यही है लोकतंत्र की परिभाषा?

लद्दाख के जाने-माने जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक 14 मार्च 2026 को जोधपुर सेंट्रल जेल से रिहा हो गए। करीब 170 दिन की कैद के बाद उन्हें आज़ादी मिली — वो भी तब, जब सुप्रीम कोर्ट में उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो की habeas corpus याचिका पर अगली सुनवाई 17 मार्च को होने वाली थी।

क्या था मामला?

24 सितंबर 2025 को लेह में एक प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़की, जिसमें 4 लोगों की मौत हुई और 150 से अधिक लोग घायल हुए। सरकार ने वांगचुक पर इस हिंसा को भड़काने का आरोप लगाया और 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लेह से सीधे जोधपुर जेल भेजा गया — बिना किसी मुकदमे के, बिना किसी ट्रायल के।

अब सरकार का रुख़ अचानक क्यों बदला?

यही सबसे बड़ा सवाल है। जिस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बार-बार यह दलील दी कि वांगचुक की गिरफ्तारी पूरी तरह उचित है और उन्हें रिहा नहीं किया जा सकता — उसी सरकार ने सुनवाई से महज तीन दिन पहले NSA वापस ले लिया। गृह मंत्रालय ने कहा कि यह फैसला “लद्दाख में शांति, स्थिरता और संवाद” के लिए लिया गया है।

लेकिन जनता पूछ रही है — अगर शांति और संवाद ही मकसद था, तो 170 दिन किसलिए?

NSA — एक कानून जो सवालों के घेरे में है

NSA के तहत किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमे के 12 महीने तक जेल में रखा जा सकता है। इस कानून में न FIR की ज़रूरत, न ज़मानत का अधिकार। वांगचुक के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट में यह भी कहा था कि उनके भाषणों में ऐसे शब्द जोड़े गए जो उन्होंने कभी बोले ही नहीं।

तो क्या यह कानून अब एक राजनीतिक हथियार बन चुका है — जब चाहो लगाओ, जब चाहो हटाओ?

वांगचुक की मांगें आज भी वही हैं

रिहाई के बाद वांगचुक ने कहा कि वे लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल कराने और पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे — लेकिन अब शांतिपूर्ण संवाद के रास्ते से।

सोनम वांगचुक की रिहाई एक राहत की खबर ज़रूर है, लेकिन इसे जीत मानना जल्दबाजी होगी। असली सवाल यह है कि जब एक आवाज़ उठाने वाले को महीनों जेल में रखा जा सकता है और फिर बिना किसी जवाबदेही के रिहा भी किया जा सकता है — तो इस देश में असहमति की क्या क़ीमत है?

लद्दाख के लोग जवाब मांग रहे हैं। और यह सवाल सिर्फ लद्दाख का नहीं, पूरे भारत का है।

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