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बिहार चुनाव में घूंघट और बुर्के की आड़ में छिड़ी सियासी जंग

बिहार चुनाव: घूंघट और बुर्के की आड़ में छिड़ी सियासी जंग

Hindi News, October 6, 2025October 6, 2025

पटना : बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राज्य का माहौल गर्म होता जा रहा है। इस बार बहस का केंद्र न तो बेरोजगारी है, न ही शिक्षा या स्वास्थ्य। चर्चा का मुद्दा बना है महिलाओं का घूंघट और बुर्का। सवाल उठ रहा है कि आखिर चुनाव के बीच यह मुद्दा क्यों और कैसे छेड़ा गया?

घूंघट और बुर्का पर सवाल

दरअसल, कुछ राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग से यह मांग की है कि मतदान के समय घूंघट या बुर्का में आने वाली महिलाओं की पहचान पूरी तरह सुनिश्चित की जाए। उनका तर्क है कि ढके चेहरे की वजह से कई बार मतदान प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो सकते हैं और फर्जी मतदान की गुंजाइश भी रहती है। इस मुद्दे ने अचानक चुनावी गलियारों में हलचल मचा दी है और इसे लेकर तीखी बयानबाज़ी शुरू हो गई है।

विपक्ष के आरोप

विपक्षी दलों ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है। उनका कहना है कि सत्ता पक्ष चुनावी फायदे के लिए इस बहस को हवा दे रहा है। आरजेडी, कांग्रेस और INDIA गठबंधन के नेताओं का आरोप है कि घूंघट और बुर्का के नाम पर खासकर ग्रामीण और मुस्लिम महिलाओं को टारगेट किया जा रहा है। विपक्ष यह भी कह रहा है कि जब राज्य में बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दे हैं तो उन पर चर्चा करने के बजाय महिलाओं के पहनावे पर राजनीति की जा रही है।

सत्ता पक्ष का पक्ष

दूसरी ओर, सत्ताधारी दल और उनके सहयोगियों का कहना है कि यह मामला किसी समुदाय या धर्म से नहीं जुड़ा है, बल्कि चुनाव की पारदर्शिता और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। उनका मानना है कि यदि मतदाता की पहचान साफ-साफ हो तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मजबूत होगी। उनका तर्क है कि वोट डालना एक संवैधानिक अधिकार है और इसकी पारदर्शिता सुनिश्चित करना चुनाव आयोग और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।

असली मुद्दों से भटकाव

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस जनता का ध्यान बुनियादी सवालों से हटाने का तरीका भी हो सकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों को पीछे छोड़कर राजनीतिक दल ऐसी बहसों को हवा दे रहे हैं जो भावनाओं को ज्यादा भड़काती हैं। चुनाव के दौरान ऐसे सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक अक्सर राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं।

स्पष्ट है कि बिहार विधानसभा चुनाव जंग अब केवल विकास और मुद्दों पर नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता, पहचान और सुरक्षा के सवालों पर भी लड़ी जा रही है। घूंघट और बुर्के का मुद्दा महज पहनावे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक बन गया है कि चुनाव में असली बहस किस ओर जा रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता इस बहस को कितना महत्व देते हैं और क्या वे पारंपरिक मुद्दों को दरकिनार करके इन सांकेतिक बहसों से प्रभावित होते हैं या नहीं।

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