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दस साल बाद भी पिछली सरकार जिम्मेदार? महंगाई, बेरोज़गारी और सियासत की सच्चाई

10 साल बाद भी पिछली सरकार जिम्मेदार? सियासत या सच्चाई

एक जागरूक नागरिक, February 19, 2026February 19, 2026

पिछले कुछ समय से एक बात बार-बार सुनाई देती है — “आज जो हालात हैं, उनकी जड़ पिछली सरकार की नीतियों में है।” लेकिन जब किसी सरकार को सत्ता में आए लगभग एक दशक हो चुका हो, तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि क्या अब भी हर समस्या के लिए अतीत को जिम्मेदार ठहराना ठीक है?

संसद का दृश्य: आरोप और जवाब

हाल के सत्रों में Parliament of India में महंगाई और बेरोज़गारी पर तीखी बहस हुई। विपक्ष की ओर से Rahul Gandhi ने कई मौकों पर यह सवाल उठाया कि देश में युवाओं को पर्याप्त रोजगार क्यों नहीं मिल रहा और महंगाई से आम आदमी की कमर टूट रही है। उन्होंने संसद और सार्वजनिक रैलियों में यह भी कहा कि सरकार बड़े उद्योगपतियों के मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देती है, जबकि आम लोगों की समस्याएँ बढ़ रही हैं।

जवाब में प्रधानमंत्री Narendra Modi और वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने अलग-अलग मंचों पर यह तर्क दिया है कि भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक चुनौतियों के बावजूद दुनिया की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है। वित्त मंत्री ने संसद में यह भी कहा था कि महंगाई एक वैश्विक समस्या है और भारत ने कई देशों की तुलना में बेहतर स्थिति बनाए रखी है।

सत्तापक्ष का कहना है कि पिछली सरकारों के समय बैंकिंग सेक्टर में जो एनपीए (खराब कर्ज) की समस्या थी, उसे सुधारने में समय लगा। वहीं विपक्ष का तर्क है कि अब एक दशक से अधिक समय हो चुका है, इसलिए वर्तमान हालात की जिम्मेदारी मौजूदा नेतृत्व को लेनी चाहिए।

ज़मीन की हकीकत क्या कहती है?

दिल्ली के एक छोटे व्यापारी से बात करें तो वह कहता है कि “हमको फर्क नहीं पड़ता किसकी गलती है, हमें तो आज का खर्च देखना है।” यही बात एक बेरोज़गार युवक भी कहता है — “दस साल में अगर बदलाव नहीं आया तो फिर कब आएगा?”

महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतें, और रोज़गार जैसे मुद्दे सीधे आम आदमी की जिंदगी से जुड़े हैं। सरकार यह भी कहती है कि वैश्विक परिस्थितियाँ और महामारी जैसे कारणों का असर पड़ा है। यह बात सही भी है कि वैश्विक आर्थिक संकट का असर हर देश पर पड़ता है। लेकिन जनता यह भी देखती है कि समाधान के लिए ठोस कदम कितनी तेजी से उठाए जा रहे हैं।

जिम्मेदारी किसकी?

राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन शासन चलाना मुश्किल काम है। अगर पिछली सरकार की नीतियों में कमियां थीं, तो उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी मौजूदा नेतृत्व की होती है। दस साल किसी भी सरकार के लिए पर्याप्त समय माना जाता है, जिसमें वह अपनी दिशा और नीतियों का असर दिखा सके।

आर्थिक नीतियों का प्रभाव लंबा चलता है, यह सच है। लेकिन यह भी सच है कि हर सरकार को अपनी उपलब्धियों और असफलताओं दोनों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लोकतंत्र में जनता सवाल पूछती है और जवाब चाहती है।

सियासत से आगे की जरूरत

आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम केवल अतीत की बहस में उलझे रहेंगे, या भविष्य की ठोस योजना पर ध्यान देंगे? जनता को राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा जरूरी है स्थिरता, रोजगार और महंगाई से राहत।

अंत में बात साफ है — इतिहास को जानना जरूरी है, लेकिन वर्तमान की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अगर सरकारें केवल पुराने दौर का हवाला देती रहें और ठोस परिणाम न दिखें, तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि वह जवाब मांगता है — और जवाब ठोस काम के रूप में चाहता है, सिर्फ शब्दों में नहीं।

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