Why Do We Really Celebrate Diwali: हर साल दिवाली से हफ़्ता भर पहले घर में वही सब शुरू हो जाता है। सफ़ाई, पुताई, बाज़ार की भीड़, मिठाई के डिब्बे, और बच्चों का वही पुराना सवाल कि दिवाली मनाते क्यों हैं। जवाब भी हर बार लगभग एक ही मिलता है कि राम चौदह साल बाद अयोध्या लौटे थे, इसलिए दीये जले।
मैं भी बरसों यही जवाब मानती रही। फिर एक दिन ध्यान गया कि जो त्योहार हमारे यहाँ राम के नाम से जुड़ा है, वही दक्षिण में किसी और घटना की याद में मनता है, बंगाल में किसी और देवी की पूजा के साथ, गुजरात में नए साल की तरह, और जैन और सिख परिवारों में बिल्कुल अलग वजह से। अगर वजह एक ही थी, तो इतनी वजहें आईं कहाँ से?
यह लेख उसी सवाल का पीछा करता है। किसी की आस्था को छोटा दिखाना इसका मक़सद नहीं है। कहानियाँ अपनी जगह हैं, और जो लोग उन्हें मानते हैं उनके लिए उनका मतलब असली है। मैं बस यह देखना चाहती हूँ कि इतिहासकारों और पुराने लिखित रिकॉर्ड के हिसाब से इस त्योहार की जड़ें ज़मीन पर कहाँ मिलती हैं, यानी खेत, मौसम, बाज़ार और आम लोगों की ज़िंदगी में।
एक रात, कई कहानियाँ
कार्तिक की अमावस की रात देश भर में दीये जलते हैं, पर उनके पीछे की कहानी हर इलाके में बदल जाती है।
उत्तर भारत के बड़े हिस्से में इसे राम की अयोध्या वापसी से जोड़ा जाता है। दक्षिण में बात नरकासुर के वध की होती है, और वहाँ दिन की शुरुआत सुबह-सुबह तेल से नहाने से होती है। बंगाल और ओडिशा के कई हिस्सों में इसी रात काली की पूजा होती है। गुजरात और राजस्थान के व्यापारी परिवारों के लिए यह लक्ष्मी पूजन और नई बही खोलने की रात है, और गुजरात में अगले दिन से नया साल शुरू हो जाता है। जैन परंपरा में यह महावीर के निर्वाण का दिन है। सिख परंपरा में इसी समय बंदी छोड़ दिवस मनाया जाता है, जिसमें गुरु हरगोबिंद साहिब की ग्वालियर के किले से रिहाई को याद किया जाता है।
अलग-अलग परंपराएँ, अलग देवता, अलग घटनाएँ, पर दिन एक और हर घर में दीया एक। अगर त्योहार किसी एक घटना से शुरू हुआ होता, तो बाकी लोग उसे अपनी कहानी से क्यों जोड़ते? ज़्यादातर इतिहासकारों की समझ यह है कि त्योहार पहले से मौजूद था और बाद में हर समुदाय ने उसमें अपनी याद और अपना नायक जोड़ लिया। जो दिन पहले से सबके लिए ख़ास हो, उस पर नई कहानी टाँकना आसान होता है।
सब कुछ खेत से शुरू हुआ
तो वह पहले से मौजूद चीज़ क्या थी? दिवाली की तारीख़ देखिए। अक्टूबर का आख़िर या नवंबर की शुरुआत। बारिश विदा हो चुकी होती है, हवा में हल्की ठंड उतरने लगती है, और धान जैसी खरीफ़ की फ़सल कटकर घर आ रही होती है। उसी समय खेत अगली फ़सल की तैयारी माँगते हैं, जैसे उत्तर भारत में गेहूँ की बुवाई। किसान के साल में यह ऐसा मोड़ है जहाँ पिछली मेहनत का नतीजा हाथ में होता है और अगला काम अभी शुरू होना बाकी है। खलिहान भरा हो तो जश्न मनाने के लिए किसी कहानी की ज़रूरत नहीं पड़ती।
पी. के. गोडे ने 1945 में भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट की पत्रिका में एक शोध-पत्र छापा था, जिसमें उन्होंने दिवाली के पुराने लिखित ब्यौरे जाँचे। उनके निष्कर्षों में दिवाली एक मौसमी, फ़सल से जुड़ा त्योहार बैठती है, जो धान की कटाई ख़त्म होने और अगली फ़सल के लिए खेतों में खाद डालने के दौर में मनाया जाता था। वे 1916 में छपी एक किताब का हवाला भी देते हैं, जो इसे आश्विन के आख़िर और कार्तिक के पहले चार दिनों का ऐसा मौसमी उत्सव बताती है, जब ठंड दस्तक देती है।
इसके निशान आज की रस्मों में साफ़ दिखते हैं। दिवाली के पाँच दिनों में चौथे दिन कई जगह अन्नकूट होता है, जिसका मतलब ही है अन्न का पहाड़। सैकड़ों तरह के पकवान बनते हैं, पहले चढ़ाए जाते हैं और फिर पूरा समुदाय मिल-बाँटकर खाता है। गोवर्धन पूजा में गोबर का इस्तेमाल होता है, और कई विद्वान इसे कटाई के बाद की रस्मों और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति से जोड़कर देखते हैं। पूरा ढाँचा किसान की ज़िंदगी का है: अन्न, पशु, खाद, मिट्टी।
बारिश के बाद घर की बारी
खेतों के साथ घरों का भी हिसाब होता है। बरसात में महीनों तक दीवारें सीलती हैं, कोनों में फफूँद लगती है, छतें टपकती हैं और सामान नम हो जाता है। बारिश जाने के बाद ही घर को खोलकर साफ़ करने का मौक़ा मिलता है। चूने की पुताई, मरम्मत, पुराने सामान की छँटाई, यही सब दिवाली की तैयारी में आज भी होता है, बस अब हम उसे रस्म कहकर निभाते हैं।
फिर वह रात है। अमावस की रात सबसे अँधेरी होती है, और तेल का दीया उस ज़माने में रोशनी का सबसे सस्ता और आसान ज़रिया था। साल की सबसे काली रात में पूरे गाँव के घरों की मुंडेरों पर दीये रख देना सुंदर भी लगता है और काम का भी। पटाखे इस तस्वीर में बहुत बाद में आए। इतिहासकारों के मुताबिक बारूद भारत में कुछ सदियों पहले ही पहुँचा, जबकि दीये का चलन उससे कहीं पुराना है। इसलिए जो दिवाली हम आज शोर और धुएँ के साथ जानते हैं, वह उसका सबसे नया रूप है।
बही-खाते वाली दिवाली
खेती वाले समाज में फ़सल कटने का मतलब सिर्फ़ अनाज नहीं, पैसा भी था। अनाज बिकता है तो उधार चुकता है, नए सौदे होते हैं, नया हिसाब शुरू होता है। इसीलिए इसी मौसम में व्यापार का साल भी करवट लेता है। नेशनल जियोग्राफ़िक जैसे स्रोत भी बताते हैं कि आज भी भारत में कई कारोबारी दिवाली को वित्तीय नए साल का पहला दिन मानते हैं।
चोपड़ा पूजन में नई बही के पहले पन्ने पर शुभ-लाभ लिखा जाता है और पुराना हिसाब निपटाया जाता है। धनतेरस पर बर्तन और सोना ख़रीदना बाज़ार का सबसे बड़ा दिन बन चुका है। गुजरात में अगले दिन नया साल मनता है, और लोग नमक जैसी रोज़मर्रा की बुनियादी चीज़ें ख़रीदकर साल की शुरुआत करते हैं, जिन्हें वहाँ ज़िंदगी की अच्छी चीज़ें कहा जाता है। कई जगह इसी के आसपास विश्वकर्मा पूजा होती है, जब कारीगर और मज़दूर अपने औज़ारों को पूजते हैं, और इसे काम के नए साल की शुरुआत माना जाता है।
लक्ष्मी की पूजा को इसी संदर्भ में देखिए तो बात और साफ़ हो जाती है। इस त्योहार में समृद्धि की कामना केंद्र में है, चाहे वह अनाज की समृद्धि हो या तिजोरी की।
पाँच दिनों का ढाँचा
दिवाली एक दिन का नहीं, पाँच दिनों का सिलसिला है, और इन दिनों को एक के बाद एक रखकर देखें तो यह एक परिवार के साल भर के कैलेंडर जैसा पढ़ा जा सकता है। पहले दिन धनतेरस पर ख़रीदारी होती है, यानी बाज़ार और बचत। दूसरे दिन नरक चतुर्दशी पर सुबह जल्दी नहाने और सफ़ाई का रिवाज़ है। तीसरे दिन अमावस की रात पूजा, दीये और हिसाब-किताब। चौथे दिन कहीं अन्नकूट और गोवर्धन पूजा, कहीं नया साल, कहीं औज़ारों की पूजा, यानी अनाज और काम की नई शुरुआत। पाँचवें दिन भाई दूज, जब भाई-बहन मिलते हैं, यानी रिश्ते।
ख़रीदारी, सफ़ाई, रोशनी, फ़सल और काम, और परिवार, ज़िंदगी की लगभग सारी ज़रूरी चीज़ें इन पाँच दिनों में निपट जाती हैं। हर दिन की अपनी कथा भी है, पर रस्मों की बनावट ज़िंदगी की इन्हीं ज़रूरतों से मेल खाती है।
पुराने पन्नों में दिवाली
क्या यह सब सिर्फ़ अंदाज़ा है? पूरी तरह नहीं, क्योंकि पुराने लेखकों ने इस त्योहार को देखकर लिखा है।
सातवीं सदी के राजा हर्ष ने अपने नाटक नागानंद में इसे दीपप्रतिपदोत्सव कहा है, जिसमें दीये जलाए जाते थे और नवविवाहित जोड़ों को तोहफ़े दिए जाते थे। नौवीं-दसवीं सदी के लेखक राजशेखर ने काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका लिखा है और बताया है कि घरों की पुताई होती थी और तेल के दीयों से सजावट। ग्यारहवीं सदी की शुरुआत में फ़ारसी विद्वान अल-बिरूनी ने भारत के बारे में लिखते हुए कार्तिक की अमावस के इस त्योहार का ज़िक्र किया है। और 1903 में छपे शब्दकोश हॉब्सन-जॉब्सन में ‘देवाली’ शब्द की पड़ताल करते हुए 1613 तक के विदेशी यात्रियों के विवरण खँगाले गए हैं। वहाँ इसे शरद ऋतु का त्योहार बताया गया है, जो अलग-अलग देवताओं के नाम पर मनाया जाता है, जैसे लक्ष्मी, भवानी और कृष्ण के हाथों नरकासुर का वध।
इन ब्यौरों में एक बात ध्यान खींचती है। उनमें रस्मों और उत्सव का ज़िक्र ज़्यादा है, यानी दीये, पुताई, तोहफ़े और मेल-जोल, और किसी एक घटना पर ज़ोर कम। इससे अंदाज़ा लगता है कि रस्में पहले आईं, और उनकी व्याख्या में कहानियाँ अलग-अलग जगह अलग-अलग तरह से जुड़ती गईं।
कहानियाँ कब और क्यों जुड़ीं
लोक-संस्कृति के एक जानकार के हवाले से कहा जाता है कि किसी त्योहार के इर्द-गिर्द जितनी ज़्यादा लोककथाएँ जुड़ती जाती हैं, उतना ही वह त्योहार समाज में गहरा बैठा और विकसित हुआ होता है। यह दिवाली पर ख़ूब फिट बैठता है। इतने सारे इलाकों, धर्मों और पेशों के लोगों ने इसे अपनाया कि हर किसी ने उसमें अपनी बात रख दी।
इसमें कुछ ग़लत नहीं है। ज़मीन से उठी चीज़ में आसमान की कहानी जोड़ना इंसान की बहुत पुरानी आदत है, और कहानियाँ बेकार नहीं होतीं। वे बच्चों को बताती हैं कि अँधेरे पर रोशनी भारी पड़ती है, कि घर लौटना अच्छा लगता है, कि बुराई का अंत होता है। ये बातें इसलिए बची हैं क्योंकि इंसान को इनकी ज़रूरत है, इसलिए नहीं कि किसी ने इन्हें इतिहास की किताब में सिद्ध किया।
राम की वापसी की कथा उत्तर भारत के करोड़ों लोगों के लिए इस त्योहार का भावनात्मक केंद्र है, और उस भावना की इज़्ज़त की जानी चाहिए। इतिहास की नज़र से इन कथाओं को ठोस सबूत से साबित करना मुश्किल है, यह भी सच है। पर आस्था को सबूत की ज़रूरत नहीं पड़ती, और इतिहास आस्था की जगह नहीं ले सकता। दोनों अपने-अपने सवाल का जवाब देते हैं। आस्था बताती है कि हम क्या महसूस करते हैं, और इतिहास बताता है कि हम यहाँ तक पहुँचे कैसे।
तो फिर दिवाली आख़िर मनाते क्यों हैं
सबसे ईमानदार जवाब शायद यह है कि कई कारण एक साथ काम करते हैं, और उनमें सबसे पुराने कारण सबसे ज़मीनी हैं।
मौसम बदलता है और बारिश जाती है। फ़सल घर आती है और अगली की तैयारी होती है। घर की सफ़ाई और मरम्मत का वक़्त मिलता है। कारोबार का नया हिसाब खुलता है। अमावस की सबसे अँधेरी रात में दीये जलाकर पूरा मोहल्ला रोशन होता है। और इन सबके बीच रिश्तेदारों के यहाँ मिठाई जाती है, तोहफ़े बँटते हैं, भाई बहन के घर पहुँचता है, और साल में एक बार सबके पास मिलने की वजह बनती है। इन सारी चीज़ों पर बाद में हर इलाके, हर धर्म और हर समुदाय ने अपनी कहानी चढ़ाई, और इसीलिए एक ही त्योहार की इतनी वजहें सुनने को मिलती हैं।
इस सब को जानकर मेरे लिए दिवाली छोटी नहीं हुई, बल्कि थोड़ी बड़ी लगने लगी। यह किसी एक घटना की सालगिरह भर नहीं रही, बल्कि सदियों से चल रही उस आदत जैसी लगी जिसमें इंसान मेहनत के बाद रुककर रोशनी करता है और अपनों के साथ बैठता है।
अगली बार कोई बच्चा पूछे कि दिवाली क्यों मनाते हैं, तो एक कहानी सुना दीजिए, कोई भी जो आपके घर में चलती हो। फिर उसे यह भी बता दीजिए कि सबसे पुरानी वजह खेत और मौसम की है, और यह कि सवाल पूछना त्योहार से दूर जाना नहीं है, उसे थोड़ा और समझना है।
अक्सर पूछे जानें वाले सवाल (FAQ)
पुरानी वजह फ़सल और मौसम है: बारिश जाती है और फ़सल घर आती है। बाद में अलग-अलग इलाकों और धर्मों ने अपनी कहानियाँ जोड़ीं, जैसे राम की वापसी और नरकासुर का वध।
दिवाली 2026 में रविवार, 8 नवंबर को है। लक्ष्मी पूजा शाम को होती है और मुहूर्त शहर के हिसाब से बदलता है।
धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दिवाली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज। यानी खरीदारी, सफ़ाई, पूजा-हिसाब, अन्न-काम और रिश्ते।
अमावस की सबसे अँधेरी रात में तेल का दीया रोशनी का सबसे आसान साधन था। बाद में यह अँधेरे पर रोशनी का प्रतीक बन गया।
नहीं। जैन इसे महावीर के निर्वाण के रूप में और सिख बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाते हैं।

