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सोशल मीडिया और अकेलापन: भारत के युवाओं पर बढ़ता अदृश्य बोझ

सोशल मीडिया और अकेलापन_ भारत के युवाओं पर बढ़ता अदृश्य बोझ

सोशल मीडिया और अकेलापन_ भारत के युवाओं पर बढ़ता अदृश्य बोझ

आज का समय डिजिटल युग कहलाता है। हर हाथ में स्मार्टफोन है, हर जेब में इंटरनेट। सोशल मीडिया ने लोगों को दुनिया से जोड़ने का दावा किया, लेकिन क्या यह हमें एक-दूसरे से दूर नहीं कर रहा? भारत के युवाओं के बीच यह सवाल अब पहले से ज़्यादा प्रासंगिक हो गया है।

कनेक्शन या दूरी?

सोशल मीडिया का उद्देश्य था लोगों को जोड़ना, लेकिन यह अब “कनेक्शन” की जगह “दूरी” का कारण बन गया है।
आज युवा सैकड़ों लोगों से ऑनलाइन जुड़े हैं, मगर असल ज़िंदगी में बेहद अकेले हैं।
रात को चैट करते हुए मुस्कुराने वाले वही लोग अंदर से उदासी और तनाव का सामना कर रहे हैं।
इस वर्चुअल दुनिया ने युवाओं को “देखने” और “दिखाने” में इतना व्यस्त कर दिया है कि वे खुद से ही दूर होते जा रहे हैं।

युवाओं की मानसिक स्थिति पर असर

भारत में 16 से 30 वर्ष की आयु के युवाओं का एक बड़ा हिस्सा हर दिन 4 से 6 घंटे सोशल मीडिया पर बिताता है।
यह निरंतर तुलना का दौर है – कौन बेहतर दिखता है, किसकी जिंदगी परफेक्ट है, किसकी पोस्ट पर ज्यादा लाइक हैं।
ऐसी निरंतर तुलना युवाओं में आत्म-संदेह, असुरक्षा और अवसाद को बढ़ा रही है।
कई युवा केवल ऑनलाइन प्रशंसा पाने के लिए अपने वास्तविक व्यक्तित्व से समझौता करने लगते हैं।

डिजिटल दिखावे की दुनिया

सोशल मीडिया अब जीवन दिखाने का मंच बन चुका है, न कि जीने का।
लोग केवल अपने जीवन के खुशहाल पल ही साझा करते हैं, जबकि संघर्षों को छिपा लेते हैं।
इससे दूसरों को लगता है कि हर किसी की ज़िंदगी उनसे बेहतर है।
असल में यही सोच युवाओं के भीतर एक गहरा अकेलापन पैदा करती है।
वे अपनी भावनाएँ साझा करने से डरने लगते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि समाज उन्हें कमजोर समझेगा।

समाधान क्या है

अकेलेपन से बाहर निकलने का सबसे अच्छा तरीका है वास्तविक रिश्तों को दोबारा मजबूत करना।
परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करना जरूरी है।
हर कुछ दिनों में सोशल मीडिया से दूरी बनाना, यानी “डिजिटल डिटॉक्स” अपनाना फायदेमंद हो सकता है।
स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता कार्यक्रम भी जरूरी हैं ताकि युवा अपने भीतर हो रहे बदलावों को समझ सकें।

नोट

सोशल मीडिया अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग युवाओं को मानसिक और भावनात्मक रूप से कमजोर बना रहा है।
जरूरत है संतुलन की।
अगर युवा खुद से और अपने आस-पास के लोगों से सच्चे रिश्ते बनाए रखें, तो यह डिजिटल अकेलापन कभी उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं बनेगा।

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