किसी भी देश का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है। भारत में शिक्षा की जिम्मेदारी मुख्य रूप से स्कूलों पर होती है, जहाँ बच्चों की सोच, समझ और व्यक्तित्व का निर्माण होता है। देश में दो तरह के स्कूल प्रमुख हैं—सरकारी और प्राइवेट। दोनों का उद्देश्य शिक्षा देना है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में इनके बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।
सरकारी स्कूल: सुविधाएँ बनाम सच्चाई
सरकारी स्कूलों का मकसद है कि हर बच्चे को मुफ्त और समान शिक्षा मिले, चाहे उसकी आर्थिक स्थिति कैसी भी हो। यहाँ किताबें, यूनिफॉर्म, मिड-डे मील जैसी सुविधाएँ दी जाती हैं। कागज़ों में सब कुछ सही लगता है, लेकिन कई जगहों पर शिक्षकों की कमी, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और पढ़ाई की गुणवत्ता चिंता का विषय बनी हुई है। इसके बावजूद, कई सरकारी स्कूल ऐसे भी हैं जहाँ मेहनती शिक्षक सीमित संसाधनों में अच्छा काम कर रहे हैं।
प्राइवेट स्कूल: चमक-दमक और हकीकत
प्राइवेट स्कूल बेहतर बिल्डिंग, स्मार्ट क्लास, इंग्लिश मीडियम पढ़ाई और अनुशासन के लिए जाने जाते हैं। यही कारण है कि ज़्यादातर माता-पिता अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजना चाहते हैं। लेकिन इसकी एक सच्चाई यह भी है कि इन स्कूलों की फीस लगातार बढ़ती जा रही है। कई बार शिक्षा से ज़्यादा ध्यान ब्रांडिंग और दिखावे पर दिया जाता है, जिससे मध्यम और गरीब वर्ग पर आर्थिक बोझ बढ़ता है।
पढ़ाई की गुणवत्ता का सवाल
अक्सर यह माना जाता है कि प्राइवेट स्कूलों की पढ़ाई सरकारी स्कूलों से बेहतर होती है, लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। पढ़ाई की गुणवत्ता स्कूल से ज़्यादा शिक्षक और छात्र की मेहनत पर निर्भर करती है। कई सरकारी स्कूलों के छात्र कठिन परिस्थितियों के बावजूद अच्छा प्रदर्शन करते हैं, वहीं कुछ प्राइवेट स्कूलों में सिर्फ़ रट्टा लगवाने पर ज़ोर दिया जाता है।
समानता और अवसरों की बात
सरकारी स्कूल समाज में बराबरी लाने का काम करते हैं, क्योंकि यहाँ हर वर्ग के बच्चों को पढ़ने का मौका मिलता है। वहीं प्राइवेट स्कूल आर्थिक आधार पर एक अलग वर्ग तैयार कर देते हैं। इससे शिक्षा में असमानता बढ़ती है, जो समाज के लिए लंबे समय में नुकसानदायक हो सकती है।
निष्कर्ष
सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की सच्चाई यह है कि दोनों में ही कमियाँ और खूबियाँ हैं। ज़रूरत इस बात की है कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारी जाए और प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा को व्यापार न बनाया जाए। जब तक शिक्षा को मुनाफ़े से ऊपर नहीं रखा जाएगा, तब तक सही मायनों में देश का विकास संभव नहीं है।
स्कूलों के बंद होने का सच: क्या यह सिर्फ शिक्षा का नुकसान है या राजनीति का हिस्सा?

