‘द कारवां’ की रिपोर्ट पर वीडियो बनाया, गडकरी ने ठोका 50 करोड़ का मुकदमा — इन्फ्लुएंसर मुकेश मोहन का फोन भी जब्त Hindi News, April 1, 2026April 1, 2026 लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है। पत्रकारिता का काम है सत्ता से जवाब माँगना। लेकिन जब एक इन्फ्लुएंसर एक प्रतिष्ठित पत्रिका की रिपोर्ट के आधार पर वीडियो बनाता है और बदले में उस पर 50 करोड़ का मानहानि नोटिस और FIR थोप दी जाती है — तो यह लोकतंत्र नहीं, डराने की राजनीति है। क्या है पूरा मामला? 1 मार्च 2026 को प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द कारवां’ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के परिवार से जुड़ी कंपनियों का बीफ एक्सपोर्ट व्यवसाय से संबंध होने के गंभीर आरोप लगाए गए। इस रिपोर्ट के आधार पर अंबेडकरवादी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मुकेश मोहन ने एक वीडियो बनाया। नतीजा? मुकेश मोहन पर 50 करोड़ का मानहानि नोटिस, नागपुर साइबर पुलिस में FIR, और उनका फोन जब्त। सबसे बड़ा सवाल रिपोर्ट ‘द कारवां’ ने छापी। उस पर आज तक कोई मुकदमा नहीं, कोई FIR नहीं। लेकिन उसी रिपोर्ट पर वीडियो बनाने वाले एक स्वतंत्र दलित पत्रकार पर पूरी कानूनी मशीनरी झोंक दी गई। यह चयनात्मक न्याय नहीं — यह दबाने की रणनीति है। और विडंबना यह है कि जिन गडकरी ने 50 करोड़ की मानहानि ठोकी है, उनकी घोषित संपत्ति मात्र 28 करोड़ है। अभिव्यक्ति की आज़ादी या सत्ता की सुविधा? मुकेश मोहन पहले भी गडकरी की इथेनॉल नीति पर सवाल उठा चुके हैं — वह वीडियो करोड़ों लोगों तक पहुँचा था। उनका आरोप है कि तभी से उन्हें निशाना बनाने का मौका तलाशा जा रहा था। यह मामला सिर्फ एक इन्फ्लुएंसर का नहीं है। यह उन तमाम छोटे, स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल आवाज़ों का है जो बिना किसी बड़े मीडिया संस्थान की छत्रछाया के सत्ता से सवाल पूछते हैं। जब उन पर सैकड़ों करोड़ के मुकदमे ठोके जाते हैं, तो संदेश साफ होता है — बोलो, लेकिन वही जो सत्ता को पसंद हो। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब एक आम नागरिक, बिना किसी राजनीतिक संरक्षण के, ताकतवर के सामने खड़ा होता है। मुकेश मोहन उस परीक्षा में खड़े हैं। अब सवाल यह है कि हम — नागरिक, मीडिया और न्यायपालिका — किस तरफ खड़े होते हैं। स्कूल हो या अस्पताल — गरीब की जेब हमेशा खाली, मजबूरी हमेशा भारी Information News Article