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महंगाई, GST और सरकार के दावे: क्या सच में आम आदमी को कोई राहत मिलती है?

महंगाई और GST का आम आदमी की जेब पर असर

महंगाई और GST का आम आदमी की जेब पर असर

देश में जब भी महंगाई की बात होती है, सरकार आंकड़े सामने रख देती है। कभी कहा जाता है कि महंगाई काबू में है, कभी GST घटाने-बढ़ाने का ऐलान कर दिया जाता है। लेकिन सवाल वही रहता है — क्या इन फैसलों का असर ज़मीनी स्तर पर आम आदमी को महसूस भी होता है या नहीं?

महंगाई की सच्चाई: आंकड़े बनाम हकीकत

सरकारी रिपोर्ट्स के मुताबिक महंगाई दर कभी घटती है, कभी स्थिर बताई जाती है। लेकिन अगर बाज़ार में जाकर देखा जाए तो सच्चाई कुछ और ही नज़र आती है। रोज़मर्रा की चीज़ें जैसे दाल, सब्ज़ी, दूध, तेल और गैस सिलेंडर अब भी लोगों के बजट को बिगाड़ रहे हैं।
आम आदमी के लिए सवाल यह नहीं है कि महंगाई प्रतिशत कितना है, सवाल यह है कि महीने के आखिर में जेब में क्या बचता है

GST बढ़ा-घटाया जाता है, लेकिन फायदा किसे?

सरकार समय-समय पर GST दरों में बदलाव करती रहती है। कभी किसी चीज़ पर GST घटाया जाता है, तो कभी किसी सेवा पर बढ़ा दिया जाता है। दावा किया जाता है कि इससे आम लोगों को राहत मिलेगी।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि GST घटने का फायदा उपभोक्ता तक अक्सर पहुंचता ही नहीं। दुकानदार और कंपनियां कीमतें उतनी कम नहीं करतीं, जितनी होनी चाहिए। वहीं GST बढ़ते ही चीज़ें तुरंत महंगी हो जाती हैं।

ईंधन और ट्रांसपोर्ट: महंगाई की जड़

पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें लंबे समय से ऊंची बनी हुई हैं। इसका असर हर सेक्टर पर पड़ता है — सब्ज़ी मंडी से लेकर स्कूल बस तक। जब ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, तो हर सामान अपने आप महंगा हो जाता है।
यहां GST नहीं, बल्कि टैक्स स्ट्रक्चर और ईंधन नीति सबसे बड़ा सवाल बन जाती है।

ग्रामीण और शहरी भारत की अलग-अलग परेशानी

ग्रामीण इलाकों में किसान महंगाई से दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ खेती का खर्च बढ़ रहा है, दूसरी तरफ फसल का सही दाम नहीं मिल रहा।
शहरों में नौकरीपेशा लोग किराया, बिजली बिल, स्कूल फीस और मेडिकल खर्च से दबे हुए हैं। आय वही है, लेकिन खर्च कई गुना बढ़ चुका है।

सरकारी दावे और आम आदमी का अनुभव

सरकार कहती है कि नीतियों का असर दिखेगा, हालात सुधरेंगे। लेकिन आम आदमी का अनुभव कहता है कि GST के फैसले हों या महंगाई के आंकड़े — राहत कागज़ों में ज़्यादा और ज़िंदगी में कम दिखाई देती है

असली सवाल अब भी बाकी

आज सच्चाई यह है कि महंगाई और GST पर फैसले होते जरूर हैं, लेकिन उनका फायदा नीचे तक नहीं पहुंच पाता। जब तक आम आदमी की आमदनी नहीं बढ़ेगी और ज़रूरी चीज़ें सस्ती नहीं होंगी, तब तक हर आंकड़ा अधूरा ही रहेगा।

सच्चाई का पर्दाफाश यही है — नीतियां तभी सफल मानी जाएंगी, जब उनका असर आम आदमी की थाली और जेब दोनों में दिखे।

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