महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले से एक बेहद गंभीर और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहाँ कर्ज के दबाव में एक किसान को अपनी किडनी तक बेचनी पड़ी। यह घटना न सिर्फ़ किसान की मजबूरी को दिखाती है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में चल रही अवैध साहूकारी और कमजोर व्यवस्था की सच्चाई भी उजागर करती है।
कौन है किसान और क्या करता है
इस मामले में पीड़ित किसान का नाम रोशन सदाशिव कुडे है। उम्र लगभग 36 वर्ष। रोशन चंद्रपुर जिले की नागभीड़ तहसील के एक छोटे से गाँव में रहते हैं। वे खेती और पशुपालन से अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। उनके पास सीमित ज़मीन थी, जिससे होने वाली आमदनी से परिवार मुश्किल से चलता था।
रोशन के परिवार में उनकी पत्नी, बच्चे और बुज़ुर्ग पिता हैं। पिता ने बताया कि परिवार की हालत पिछले कुछ वर्षों से लगातार खराब होती चली गई।
कर्ज कैसे बढ़ता चला गया
रोशन ने कुछ साल पहले खेती और घरेलू ज़रूरतों के लिए निजी साहूकारों से 1 लाख का कर्ज लिया था। शुरुआत में रकम ज़्यादा नहीं थी, लेकिन समय के साथ ब्याज बढ़ता गया। फसल खराब होने, दूध का धंधा घाटे में जाने और आमदनी घटने के कारण रोशन कर्ज चुकाने में असमर्थ हो गए। और ब्याज सहित कर्ज 74 लाख के आस पास बढ़ गया।
कर्ज चुकाने के लिए उन्होंने अपनी ज़मीन, वाहन और घर का सामान तक बेच दिया, लेकिन इसके बावजूद कर्ज खत्म नहीं हुआ। लगातार दबाव और धमकियों के कारण उनकी मानसिक हालत भी बिगड़ती चली गई।
किडनी बेचने का फैसला
आर्थिक तंगी और साहूकारों के दबाव में आकर रोशन ने बेहद कठोर फैसला लिया। उन्हें इलाज के बहाने बाहर ले जाया गया, जहाँ उनकी किडनी निकाल दी गई। इसके बदले उन्हें कुछ पैसे मिले, जिनसे उन्होंने कर्ज का एक हिस्सा चुकाया, लेकिन उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई।
पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई
मामला सामने आने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। अवैध साहूकारी, धमकी और अंग तस्करी से जुड़े पहलुओं की जांच की जा रही है। कई लोगों से पूछताछ की गई है और कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है। प्रशासन का कहना है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।
व्यवस्था पर उठते सवाल
यह मामला बताता है कि आज भी कई किसान कर्ज के ऐसे जाल में फँसे हुए हैं, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखता। जब हालात इतने खराब हो जाएँ कि इंसान को अपना अंग तक बेचना पड़े, तो यह पूरे सिस्टम की विफलता को दर्शाता है।
महाराष्ट्र का यह मामला सिर्फ़ एक किसान की कहानी नहीं है, बल्कि ग्रामीण भारत की उस सच्चाई को सामने लाता है, जहाँ कर्ज, दबाव और लाचारी इंसान को अमानवीय फैसले लेने पर मजबूर कर देती है। जरूरत है कि किसानों को समय पर मदद, सुरक्षित कर्ज व्यवस्था और सख्त कानूनों का भरोसा मिले।

