भारत इस समय एक गंभीर एलपीजी संकट से गुज़र रहा है। पश्चिम एशिया में अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच चल रहे सैन्य संघर्ष के कारण Strait of Hormuz — जो भारत के एलपीजी आयात का मुख्य रास्ता है — प्रभावित हो गया है। भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, और उन आयातों का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा Strait of Hormuz से होकर गुज़रता है। इस रास्ते के बाधित होने से देशभर में आपूर्ति की कमी हो गई और आम जनता को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
भारत कितना एलपीजी खुद बनाता है, कितना बाहर से लाता है?
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 12.8 मिलियन मीट्रिक टन एलपीजी का घरेलू उत्पादन किया, जो कुल खपत 31.3 मिलियन मीट्रिक टन का लगभग 40 प्रतिशत ही था। मासिक आधार पर देखें तो भारत हर महीने करीब 2,700 हज़ार मीट्रिक टन एलपीजी खपत करता है, जबकि घरेलू उत्पादन मात्र 1,036 हज़ार मीट्रिक टन है। यानी बाकी की ज़रूरत पूरी तरह आयात पर निर्भर है। यही निर्भरता अब देश के लिए सबसे बड़ी कमज़ोरी बन गई है।
ब्लैक मार्केट में ₹6,000 तक पहुँचा सिलेंडर — आम आदमी की जेब पर भारी बोझ
सरकार भले ही कहती रहे कि संकट नियंत्रण में है, लेकिन ज़मीनी हकीकत बेहद कड़वी है। ब्लैक मार्केट में घरेलू गैस सिलेंडर ₹2,000 से ₹3,000 तक बिक रहा है, जबकि इसकी सरकारी कीमत ₹950 के आसपास है। वहीं कमर्शियल सिलेंडर ₹6,000 तक पहुँच गया है, जो उसकी असली कीमत ₹1,800 से कई गुना ज़्यादा है।
इस संकट की सबसे बड़ी मार उन लोगों पर पड़ रही है जो अपने होमटाउन से दूर किसी दूसरे शहर में काम करते हैं। ऐसे लाखों लोग — चाहे वो दिल्ली में काम करने वाले बिहार-यूपी के मज़दूर हों या मुंबई में नौकरी करने वाले — अपने शहर के पते पर एलपीजी कनेक्शन रखते हैं। काम वाले शहर में उनके नाम पर कोई कनेक्शन नहीं होता। ऐसे में उनके पास ब्लैक मार्केट के अलावा कोई चारा नहीं बचता।
रोज़गार छोड़कर घर लौट रहे हैं मज़दूर
हालात इतने बिगड़ गए हैं कि कई जगहों पर छोटे कारोबार, ढाबे, रेस्तराँ और घरेलू किचन ठप होने के कगार पर हैं। इस संकट के कारण खाद्य सेवाओं में बाधा, बढ़ती महंगाई और रोज़गार पर असर जैसी गंभीर समस्याएँ सामने आई हैं। शहरों में काम करने वाले वर्कर-लेवल के हज़ारों लोग — जो रोज़ खाना बनाकर खाते थे — अब खाना बनाने में असमर्थ हैं। कैंटीन और मेस बंद हो रही हैं। ऐसे में कई लोगों ने नौकरी छोड़कर अपने होमटाउन लौटना ही बेहतर समझा।
सरकार के कदम: राहत कितनी, सवाल कितने?
8 मार्च 2026 को सरकार ने रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स को निर्देश दिया कि वे प्रोपेन, ब्यूटेन जैसी गैस धाराओं को एलपीजी पूल में मोड़कर उत्पादन अधिकतम करें। इससे घरेलू एलपीजी उत्पादन में करीब 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई। साथ ही, भारत के पास देश में केवल दो भूमिगत एलपीजी भंडारण caverns हैं — एक मंगलुरु में, एक विशाखापत्तनम में — जिनकी कुल क्षमता देश की मात्र दो दिन की खपत जितनी है। यानी रणनीतिक भंडारण लगभग न के बराबर है।
आम आदमी अभी क्या करे?
जब तक संकट खत्म नहीं होता, होमटाउन से दूर रहने वाले लोगों के लिए कुछ व्यावहारिक विकल्प हैं — इंडक्शन कुकटॉप, इलेक्ट्रिक चूल्हा, या सामुदायिक रसोई। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार इलेक्ट्रिक कुकिंग अब एलपीजी से करीब 20 प्रतिशत सस्ती पड़ती है। लेकिन असली समाधान यह है कि सरकार को ऐसे प्रवासी नागरिकों के लिए एक अलग पोर्टेबल एलपीजी नीति बनानी होगी — जो उन्हें उनके रहने वाले शहर में कनेक्शन लेने की आसान सुविधा दे।
यह संकट सिर्फ एलपीजी का नहीं, यह उस व्यवस्था की विफलता का संकट है जो करोड़ों प्रवासी भारतीयों को अभी भी “दूसरे शहर का निवासी” ही मानती है।
स्कूल हो या अस्पताल — गरीब की जेब हमेशा खाली, मजबूरी हमेशा भारी

