आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में लोग तनाव, चिंता और थकान से जूझ रहे हैं। ऐसे में जापान की एक अनोखी परंपरा दुनिया का ध्यान खींच रही है — “फॉरेस्ट बाथिंग”, जिसे जापानी भाषा में “Shinrin-Yoku (शिनरिन-योखु)” कहा जाता है। इसका मतलब है “जंगल की गोद में स्नान करना”, यानी पेड़ों के बीच समय बिताना और प्रकृति को महसूस करना।
क्या है फॉरेस्ट बाथिंग?
फॉरेस्ट बाथिंग कोई योग या ध्यान की तकनीक नहीं है, बल्कि यह प्रकृति से जुड़ने का एक तरीका है।
इसमें लोग जंगल या किसी हरे-भरे इलाके में जाकर कुछ समय चुपचाप बिताते हैं — बिना मोबाइल, बिना किसी शोर के।
वे वहां पेड़ों की खुशबू, हवा की आवाज़, पक्षियों की चहचहाहट और मिट्टी की महक को महसूस करते हैं।
यह एक तरह का नेचर मेडिटेशन है जो मन और शरीर दोनों को शांत करता है।
इसकी शुरुआत कैसे हुई?
फॉरेस्ट बाथिंग की शुरुआत 1980 के दशक में जापान में हुई थी।
तब जापानी सरकार ने देखा कि लोग मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
इसलिए उन्होंने “Shinrin-Yoku” को राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम का हिस्सा बनाया।
आज यह तकनीक न सिर्फ जापान में, बल्कि अमेरिका, यूरोप और भारत जैसे देशों में भी लोकप्रिय हो रही है।
वैज्ञानिक दृष्टि से इसके फायदे
कई शोधों में पाया गया है कि फॉरेस्ट बाथिंग से:
- तनाव और चिंता कम होती है
- ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन सामान्य रहती है
- इम्यून सिस्टम मजबूत होता है
- नींद और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है
जंगलों में मौजूद पेड़ों से निकलने वाले “फाइटोनसाइड्स (Phytoncides)” नामक प्राकृतिक तत्व हमारे शरीर को शांति और ऊर्जा देते हैं।
लोग इसे क्यों अपना रहे हैं
शहरों में बढ़ते प्रदूषण और डिजिटल लाइफ से दूर जाने के लिए लोग अब फॉरेस्ट बाथिंग को एक नई थेरेपी मानते हैं।
यह न तो महँगा है, न ही इसके लिए किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है।
बस थोड़ी देर पेड़ों के बीच बैठिए, और अपने मन को रीसेट कीजिए।
भारत में भी बढ़ रही है जागरूकता
अब भारत में भी लोग “नेचर वॉक” और “इको टूरिज्म” के ज़रिए फॉरेस्ट बाथिंग जैसी प्रैक्टिस अपना रहे हैं।
उत्तराखंड, हिमाचल और केरल जैसे राज्यों में इस कॉन्सेप्ट पर आधारित टूरिज्म तेजी से बढ़ रहा है।
प्रकृति से जुड़ने की नई राह
फॉरेस्ट बाथिंग मानव और प्रकृति के बीच का रिश्ता फिर से जोड़ने का एक सुंदर तरीका है।
जब भी लगे कि मन भारी है या दिमाग थका हुआ है — कुछ देर पेड़ों के बीच जाएं, गहरी सांस लें और प्रकृति को महसूस करें।
यही असली मानसिक सुकून और जीवन की सच्ची ऊर्जा है।

