केके के पॉडकास्ट में हाल ही में लोकप्रिय यूट्यूबर ध्रुव राठी ने एक बेहद तीखी टिप्पणी की, जिसने देशभर में राजनीति की बहस को एक नया मोड़ दिया। जब उनसे पूछा गया कि यदि नरेंद्र मोदी नहीं होते तो कौन, तो उन्होंने व्यंग्य के रूप में कहा, “मोदी से तो एक गधा बेहतर होगा, क्योंकि गधा कुछ नहीं करता।” यह बयान सुनते ही सोशल मीडिया पर तूफान आ गया और लोगों ने इसे अलग-अलग रूपों में साझा किया।
राठी ने क्यों कही यह बात?
पॉडकास्ट में ध्रुव राठी ने सिर्फ इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी से ही चर्चा नहीं शुरू की, बल्कि उन्होंने प्रधानमंत्री की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश में बेरोज़गारी बढ़ रही है, महंगाई आसमान छू रही है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता खतरे में है। उनका कहना था कि असली समस्या यह है कि जनता की आवाज़ को दबाने की कोशिश हो रही है और आलोचना को देशद्रोह बताया जा रहा है।
गधे की तुलना: व्यंग्य या अपमान?
हालाँकि, यह बात एक व्यंग्य थी, लेकिन इसने गधे जैसे मेहनती जीव का अपमान करने जैसा भी रूप ले लिया। गधा हमारे समाज में एक अहम स्थान रखता है—वह ग्रामीण जीवन का हिस्सा है, बोझ उठाने में मदद करता है, और कठिन परिस्थितियों में काम करता है। इसलिए, भले ही यह एक व्यंग्य था, लेकिन इसने गधे की वास्तविक भूमिका को कम करके दिखाने का काम किया, जो उचित नहीं था।
निष्कर्ष: लोकतंत्र और व्यंग्य का संतुलन
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह दिखाया कि कैसे व्यंग्य और आलोचना दोनों ही लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें जिम्मेदार तरीके से इस्तेमाल करना ज़रूरी है। अगर हम व्यंग्य का सहारा लेते हैं, तो भी हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम किसी मेहनती जीव या वर्ग की प्रतिष्ठा को ठेस न पहुँचाएं। ध्रुव राठी की टिप्पणी ने निश्चित ही लोगों को सोचने पर मजबूर किया, लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हर आलोचना का अपना संदर्भ और समाज में एक भूमिका होती है।

