दिल्ली एक बार फिर जहरीली हवा के घेरे में है। हर साल की तरह इस बार भी राजधानी की वायु-गुणवत्ता “बहुत खराब” या “गंभीर” श्रेणी में पहुंच चुकी है। सांस लेना मुश्किल हो गया है, आंखों में जलन, गले में दर्द और सिरदर्द आम बात हो गई है। इसी बढ़ते संकट के खिलाफ दिल्ली के नागरिकों ने इंडिया गेट पर प्रदर्शन किया, ताकि सरकार को याद दिलाया जा सके कि अब “कार्यवाही का समय” आ गया है, सिर्फ बयानबाज़ी का नहीं।
वायु प्रदूषण के हालात
वर्तमान में दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) कई इलाकों में 450 से ऊपर पहुंच गया है, जो ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है। इसका मतलब है कि यह हवा किसी भी व्यक्ति के लिए खतरनाक है, चाहे वह स्वस्थ क्यों न हो। स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति कम हो रही है, बुजुर्ग घरों में कैद हो गए हैं और अस्पतालों में श्वसन संबंधी मरीजों की संख्या बढ़ रही है।
जनता का विरोध और उसकी मांगें
इंडिया गेट पर सैकड़ों लोग, खासकर माता-पिता और पर्यावरण कार्यकर्ता, सड़कों पर उतरे। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि जन-स्वास्थ्य की आपात स्थिति है।
प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें थीं:
- सरकार प्रदूषण नियंत्रण पर ठोस और स्थायी नीति बनाए।
- प्रदूषण के स्रोतों जैसे वाहनों, निर्माण कार्यों और पराली जलाने पर सख्ती से निगरानी रखी जाए।
- हवा की गुणवत्ता और प्रदूषण के आँकड़ों में पारदर्शिता लाई जाए।
सरकारी नीतियाँ और उनकी कमियाँ
दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही इस मुद्दे पर बार-बार योजनाएँ घोषित करती हैं — जैसे ग्रैप (Graded Response Action Plan), ऑड-ईवन स्कीम, और एंटी-स्मॉग टावर, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका असर सीमित दिखाई देता है।
- नीति-निर्माण में समन्वय की कमी: केंद्र और राज्य सरकारें अक्सर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती रहती हैं, जिससे नीति लागू करने में देरी होती है।
- अल्पकालिक समाधान: योजनाएँ ज़्यादातर मौसमी होती हैं — ठंड बढ़ते ही लागू होती हैं और वसंत आने पर खत्म कर दी जाती हैं।
- जनजागरूकता की कमी: नागरिकों को प्रदूषण नियंत्रण में अपनी भूमिका के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं दी जाती।
- डेटा पारदर्शिता का अभाव: कई बार सरकारी रिपोर्टों में वास्तविक प्रदूषण स्तर छिपा लिया जाता है या देर से जारी किया जाता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे को निशाना बनाया है। कांग्रेस ने सरकार पर “जनता की सांस से खिलवाड़” का आरोप लगाया, जबकि बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच डेटा और ज़िम्मेदारी को लेकर बहस छिड़ी रही। लेकिन जनता का कहना है कि उन्हें अब राजनीति नहीं, स्थायी समाधान चाहिए।
दिल्ली के लोगों ने यह साफ संदेश दिया है कि अब वे सिर्फ आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहते हैं। प्रदूषण को खत्म करने के लिए सरकार को नीतियों में समन्वय लाना होगा, दीर्घकालिक योजनाएँ बनानी होंगी और आम नागरिकों को इस अभियान में शामिल करना होगा। वरना हर साल यही कहानी दोहराई जाएगी — और दिल्ली की हवा और जहरीली बनती जाएगी।
दिल्ली की हवा ज़हर से भी ख़तरनाक: सरकारी बोर्ड पर 450 दिखा, लेकिन असली AQI 700 पार

