भारत आज एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है जहाँ कई गंभीर चुनौतियाँ हमारे सामने खड़ी हैं — बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा व्यवस्था की खामियाँ, स्वास्थ्य सेक्टर की कमजोरी और किसानों की लगातार बढ़ती चिंताएँ। ये मुद्दे केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं। ऐसे में जब किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय नेता द्वारा भारतीय नेतृत्व की अत्यधिक प्रशंसा की जाती है, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या ऐसी तारीफ़ें देश की ज़मीनी हक़ीक़त से मेल खाती हैं?
असली मुद्दे: जो आज भी अनसुलझे हैं
भारत में बेरोज़गारी का स्तर लंबे समय से लोगों को परेशान कर रहा है। युवाओं के पास डिग्री तो है, पर नौकरी का भरोसा नहीं। दूसरी ओर महँगाई आम लोगों की साँसें तक तंग कर रही है — ज़रूरी सामान, सब्ज़ियाँ, दवाइयाँ, सब कुछ महँगा होता जा रहा है।
शिक्षा प्रणाली आज भी पुरानी संरचनाओं में अटकी है, जहाँ आधुनिक स्किल और बदलते समय के मुताबिक सुधार की ज़रूरत है। स्वास्थ्य सेक्टर में बेसिक सुविधाओं की कमी छोटे कस्बों और गाँवों में साफ दिखाई देती है। किसानों की हालत तो वर्षों से देश के हर कोने में चर्चा का विषय रही है — फसल की सही कीमत, कर्ज़, मौसम की मार और सरकारी प्रक्रियाओं की दिक्कतें उनकी ज़िंदगी को लगातार कठिन बना रही हैं।
ये सारी परिस्थितियाँ बताती हैं कि देश में समस्याएँ आज भी बेहद गहरी हैं।
फिर नेताओं की इतनी तारीफ़ क्यों होती है?
जब अंतरराष्ट्रीय नेता किसी देश के प्रधानमंत्री या किसी राष्ट्रीय नेतृत्व की बहुत ज़्यादा तारीफ़ करते हैं, तो ये हमेशा उनकी व्यक्तिगत राय या वास्तविक मूल्यांकन नहीं होता। ये भाषा होती है—डिप्लोमेसी की, कूटनीति की।
दुनिया की राजनीति में नेता एक-दूसरे के बारे में अच्छे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं ताकि:
- रिश्ते मज़बूत रहें
- व्यापार बढ़े
- रक्षा, तेल-गैस और अन्य समझौते आसान हों
- भविष्य में बातचीत का माहौल सकारात्मक बना रहे
इसलिए यह ज़रूरी नहीं है कि कोई विदेशी नेता जो कुछ कह रहा है, वही उसकी असली राय भी हो। कई बार वह बात सिर्फ शिष्टाचार, रणनीति और रिश्तों को सुखद बनाने के लिए कही जाती है।
हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
तारीफ़ें भले ही ऊँचे मंचों से आती हों, लेकिन देश की असली तस्वीर उसके नागरिकों की ज़िंदगी से तय होती है। जब लोगों के सामने रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती जैसी बुनियादी चुनौतियाँ मौजूद हों, तब किसी नेता की ‘बहुत ज़्यादा’ प्रशंसा समाज की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती।
निष्कर्ष
कूटनीति की अपनी जगह है, और देश की आंतरिक समस्याओं की अपनी। विदेशी नेताओं की बातें सुनना अच्छा लगता है, लेकिन देश की असली प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपनी चुनौतियों को कितना गंभीरता से लेते हैं, और उन्हें हल करने के लिए क्या वास्तविक कदम उठाए जाते हैं।
तारीफ़ें क्षणिक हो सकती हैं, लेकिन देश का भविष्य असली समस्याओं के समाधान पर टिकता है।

