सितंबर 2025 में खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) 1.54% पर पहुँची
भारत में खुदरा मुद्रास्फीति 2025 में घटकर सिर्फ 1.54% रह गई है, जो पिछले आठ वर्षों में सबसे निचला स्तर है।
यह आँकड़ा पहली नज़र में आम जनता के लिए राहत की खबर लगता है, लेकिन अर्थशास्त्रियों के अनुसार इसके पीछे कुछ ऐसे संकेत भी हैं, जो आने वाले समय में चिंता का कारण बन सकते हैं।
महँगाई घटने के मुख्य कारण
- खाद्य वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता – इस वर्ष अच्छी फसल और पर्याप्त आपूर्ति के कारण खाद्य दरें नियंत्रण में रहीं।
- ईंधन दरों पर नियंत्रण – सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर टैक्स स्थिर रखने से परिवहन लागत में कमी आई।
- वैश्विक बाजारों में नरमी – कच्चे तेल और धातुओं की अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम होने से घरेलू कीमतों पर दबाव घटा।
- मांग में कमी – उपभोक्ता खर्च में कमी आने से उत्पादों की मांग कम हुई, जिससे कीमतें नीचे आईं।
RBI की मौद्रिक नीति पर संभावित असर
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अब ब्याज दरों में कटौती पर विचार कर सकता है, ताकि बाज़ार में मांग को फिर से बढ़ावा दिया जा सके।
हालाँकि, विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि बहुत कम महँगाई यह संकेत भी हो सकती है कि अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो रही है।
यदि उपभोग (Consumption) घटता है, तो उत्पादन, निवेश और रोज़गार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
आम जनता पर प्रभाव
- घरेलू राहत: दाल, तेल और सब्जियों जैसी जरूरी वस्तुओं के दाम स्थिर रहने से आम घरों के खर्चों में राहत।
- लोन सस्ता होने की उम्मीद: अगर RBI ब्याज दर घटाता है, तो गृह ऋण और वाहन ऋण की EMI कम हो सकती है।
- रोज़गार पर दबाव: मांग घटने से उद्योगों में उत्पादन में कटौती हो सकती है, जिससे नई नौकरियों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
वैश्विक स्थिति की तुलना
दुनिया के कई बड़े देशों — जैसे अमेरिका और यूरोप — में अभी भी महँगाई दर 3 से 4 प्रतिशत के बीच बनी हुई है।
इसके मुकाबले भारत का 1.54% स्तर यह दर्शाता है कि भारत ने कीमतों पर नियंत्रण और आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन में अच्छा काम किया है।
लेकिन अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह आर्थिक सुस्ती का संकेत भी बन सकती है।
क्या यह राहत स्थायी है?
त्योहारी सीज़न में मांग बढ़ने की संभावना के कारण आने वाले महीनों में कीमतों में हल्की बढ़ोतरी संभव है।
सरकार और RBI दोनों की कोशिश यही रहेगी कि महँगाई दर 2% से 4% के सुरक्षित दायरे में बनी रहे।
बहुत कम महँगाई भी उतनी ही हानिकारक होती है जितनी ज़्यादा महँगाई, क्योंकि यह उत्पादन और निवेश दोनों को प्रभावित करती है।
नोट
कम महँगाई दर का मतलब हमेशा सुखद नहीं होता।
यह उपभोक्ता मांग और आर्थिक गति में गिरावट का संकेत भी दे सकता है।
इसलिए आवश्यक है कि सरकार मूल्य स्थिरता के साथ-साथ रोज़गार सृजन और औद्योगिक उत्पादन पर समान ध्यान दे, ताकि राहत की यह स्थिति टिकाऊ और संतुलित बन सके।
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