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Kumbhakarna Story: कुंभकरण कितने समय सोता था और कितना खाता था, जानें कुंभकरण की कहानी

Laxmi Nautiyal, March 12, 2024March 12, 2024

Kumbhakarna Story: नमस्कार, दोस्तों आप कुंभकरण नाम से तो भली भाँती परिचित होंगे। पौराणिक कथाओं या रामायण में आपने इनके बारे में सुना ही होगा। और सुना भी क्यों नहीं होगा आखिर ये रामायण के प्रमुख पात्र जो हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुंभकरण 6 महीने तक सोता रहता था और किस कारणवश कुंभकरण इतने लम्बे समय तक सोता रहता था। यदि आप नहीं जानते तो आईये आज हम आपको बताएंगे की आखिर किस वरदान के फलस्वरूप कुंभकरण 6 महीने तक सोता रहता था। साथ ही हम जानेंगे कुंभकरण के बारे में कुछ अनोखी बातें, जो शायद आपको पता न हो और शायद किसी ने बताई भी न हो।

कुंभकरण

पौराणिक कथाओं के अनुसार कुंभकरण ऋषि व्रिश्रवा और राक्षसी कैकसी के पुत्र थे। जिनके सबसे बड़े भाई रावण लंका के राजा थे। विभीषण और शूर्पनखा कुंभकरण के छोटे भाई बहन थे। बचपन से बड़े बड़े कान होने के कारण इनका नाम कुंभकरण पड़ गया। यदि कुंभकरण के नाम का अर्थ जानने की बात करें तो कुंभ का अर्थ होता है घड़ा और करण का अर्थ होता है कान। अर्थात घड़े के समान बड़े कान वाला। इनका शरीर अन्य भाइयों की तुलना में कई अधिक गुना बड़ा था। भीमकाय शरीर वाले कुंभकरण बहुत बलवान थे। बलवान होने के साथ साथ वे अपने भाई रावण और विभीषण के जैसे काफी ज्ञानी भी थे। माना जाता है कि कुंभकरण एक दिन में सामान्य लोगों से कई लाख गुना अधिक भोजन करता था।

क्यों मिला सोते रहने का वरदान

कुंभकरण एक वर्ष में केवल एक दिन ही जगता था। 6 महीने सोता और एक दिन उठकर पुनः 6 माह की लम्बी निद्रा में चला जाता था। कहा जाता है कि वह यह सब एक वरदान के कारण करता था। लेकिन आखिर भला कुंभकरण जैसे राक्षस ने ऐसा वरदान माँगा ही क्यों। तो आईये आपको इस वरदान के पीछे की इस सुन्दर और दिलचश्प कहानी को बताते हैं।

पुरानी कथा के अनुसार- एक बार रावण, कुंभकरण और विभीषण तीनो भाइयों ने घोर तपस्या की। जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्म देव ने उन्हें दर्शन दिए। ब्रह्म देव ने तीनों भाइयों से वरदान मांगने को कहा तो रावण ने अमृत्व प्राप्ति का वर माँगा लेकिन यह वरदान देने से ब्रह्म देवता ने मना कर दिया और कहा कि तुम्हारा जीवन तुम्हारी नाभि में स्थित रहेगा जिससे शत्रु आसानी से तुम्हारा वध नहीं कर पायेगा। वहीं जब बारी विभीषण की आयी तो उन्होंने सम्पूर्ण जीवन में विष्णु भक्ति मांगी।

कुंभकरण ने इन्द्रासन पाने की इच्छा से यह घोर तपस्या की थी जिससे इंद्र देव भी काफी चिंतित थे। इंद्र देव अपनी इस चिंता के निवारण के लिए देवी सरस्वती के पास पहुंचे और उनसे विनती की – कि आप कुंभकरण की मति फेर लीजिये जिससे वह इन्द्रासन न मान ले। इंद्रदेव की व्यथा सुनकर देवी सरस्वती कुंभकरण की जिह्वा (जीभ) पर बैठ गयी और जब ब्रह्म देव ने कुंभकरण से वर मांगने को कहा तब कुंभकरण ने इन्द्रासन की जगह पर निन्द्रासन मांग लिया। इतना कहते ही ब्रह्म देव ने तथास्तु कह दिया। लेकिन रावण और विभीषण ने विनती ब्रह्म देव से विनती करि और कहा कि यदि ये आजीवन सोता रहेगा तो संसार का सुख कब देखेगा। यह सुनकर ब्रह्म देव ने 6 माह बाद एक दिन कुंभकरण को जागने का दे दिया और अगले दिन से 6 महीने तक सोने को कह दिया।

श्री राम के हाथों हुई कुंभकरण की मृत्यु

सोते रहने के वरदान के साथ साथ ब्रह्म देव ने यह चेतावनी भी दी थी। कि यदि कोई समय से पूर्व कुंभकरण को जगायेगा तो वह दिन कुंभकरण का अंतिम दिन होगा। इतना कह कर ब्रह्म देव अंतर्ध्यान हो गए। जब श्री राम और रावण के मध्य घमासान युद्ध हो रहा था तो रावण ने असमय ही कुंभकरण को जगा दिया और युद्ध क्षेत्र में भेज दिया। युद्ध में श्री राम से लड़ाई करते करते कुंभकरण वीर गति को प्राप्त हो गया। और ब्रह्म देव का यह कथन सत्य हो गया।

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